(इनसाईट स्टोरी)
कौन बनता है खबर? कौन होता ख़बरों के केंद्र में? क्या बिकती हैं खबरें? घोटाले बनाए भी जातें हैं? ख़बरों का सच, ख़बरों का झूठ, इनसाईट स्टोरी के आईने में. आप बताएं कहाँ क्या हो रहा है? कैरियर, स्वास्थ्य, विज्ञान, फिल्म ....... और बहुत कुछ आपके लिए.
गुरुवार, 9 अक्टूबर 2014
मिड डे मील: रसोइये को निवाला नहीं
(इनसाईट स्टोरी)
रविवार, 17 अगस्त 2014
मांझी डुबो ना दें मोदी की नैया
एक ओर दिल्ली में लालकिले की प्राचीर से प्रधानमंत्री महिलाओं के साथ हो रहे दुर्व्यवहार के लिए माता-पिता को दोष दे रहें हैं कि माँ-बाप अपने लडकों पर बंधन नहीं लगाते हैं, लोग तालियाँ बजाते हैं. मोदी खुश हैं कि लोग तालियाँ बजा रहें हैं लेकिन बिहार के मुख्यमंत्री का भी एक लड़का प्रवीण मांझी है जिस पर एक महिला कांस्टेबल के शोषण का आरोप लगा तो उनका कहना है की उनका लड़का क्या अपनी गर्ल फ्रेंड के साथ घूम भी नहीं सकता है जबकि पार्कों में आमतौर पर ऐसे जोड़े दिखते हैं. गौरतलब है की बोध गया के एक होटल में कर्मचारियों द्वारा होटल का बिल जमा ना करवाने पर मांझी के बेटे और उनके आई साथ महिला कांस्टेबल को भी कमरे में बंद कर दिया था. जिसके बाद इस मामले ने तूल पकड़ी थी लेकिन बाद में होटल वाले को कुछ पैसा दे मामले को रफा-दफा करने का प्रयास किया गया. इसके बाद राज्य भाजपा के द्वारा भी मोर्चा खोला गया तो जीतन मांझी का महादलित का रोना शुरू हो गया की एक महादलित को मुख्यमंत्री बना देख कुछ नेताओं को बुरा लग रहा है, इसी कारण वे उनके खिलाफ प्रचार कर रहें हैं.अब सवाल मोदी जी से क्या जीतन मांझी आपके उन तथाकथित बापों में शामिल नहीं जिनका जिक्र लाल किले से किया गया था. क्योंकि आप ना इस विषय पर कुछ बोले हैं और ना ही कोई एक्शन आप की ओर से दिख रहा है. क्या लालकिले से किया प्रलाप एक दिखावा मात्र था वैसे इस प्रकार के भ्रम में आप देश की जनता को डालते आयें हैं. लेकिन लगता है ऐसे मांझी आप की नैया डुबो ही देंगें. इसलिए ज़रा सोचिये लालकिले की प्राचीर से बोलने की एक मर्यादा होती है या होनी चाहिए... खैर अब आप से क्या कहना... आप तो वहीं बोलेंगें जो बोलने को कहा जाएगा... बिना देखे 1 घंटे के जिस प्रलाप पर आपकी तारीफ़ हो रही है उसकी धज्जियां तो 24 घंटे में ही मांझी जैसों ने उड़ा दी.
सोमवार, 28 जुलाई 2014
सजा सेक्स का बाजार: क्यों ना हों बलात्कार
आज बलात्कार का विषय प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया या फिर सोशल मीडिया सबमें सबसे ज्यादा पढ़ा और देखे जाने वाला विषय है. जब भी कहीं बलात्कार की घटना घटती है तो चारों ओर हो-हल्ला मचता है. विशेषकर सोशल मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया तो बलात्कार को सबसे ज्यादा टीआरपी का विषय मानता है. बलात्कार क्यों होते है? इस बारे में भी तमाम बातें बनती हैं. कोई इसे ड्रेस तो कोई इसे मोबाइल या फिर चाउमीन से जोड़ कर तक बयान देता है. बलात्कार को लेकर बने कानूनों पर भी काफी चर्चा होती है. निर्भया काण्ड के बाद बने नये कानूनों के बाद ये माना जा रहा था कि बलात्कार की घटनाओं में काफी कमी होगी. लेकिन हुआ इसका उल्टा इस प्रकार के अपराधों की संख्या में तेजी से इजाफा हुआ है. इसका क्या मतलब निकाला जाय? अभी उत्तर प्रदेश में लगातार हो रहे बलात्कारों के लिए अखिलेश सरकार की काफी आलोचना हो रही है. मुलायम सिंह के बयान बच्चों से गलती हो जाती है या फिर इतने बड़े राज्य में बलात्कार को रोक पाना आसान नहीं है पर भी तमाम आलोचनाएँ होती हैं. इससे पहले दिल्ली में भी बलात्कार की कई घटनाएँ एक के बाद एक लगातार सामने आयी थी. इस पर शीला सरकार और मनमोहन सरकार की काफी किरकिरी भी हुयी थी.
आकड़ों के उलझाव से दूर हम एक विशेष विशलेष्ण प्रस्तुत कर रहें हैं.
जब हमने बलात्कार के कारणों को ढूढना शुरू किया तो कई नये पहलू सामने आये, जिसमें सामाजिक, आर्थिक, नैतिक के साथ सेक्स के लिए तैयार बाजार का बड़ा हाथ दिखा. बलात्कार विषय पर जब भी बहस हुयी ज्यादातर संवेदनाओं के दायरे में ही हुयी है. इस विशेष रपट में हम बलात्कार के लिए जिम्मेदार कुछ कमर्शियल बिन्दुओं पर चर्चा करेंगें. आइये पहले सेक्स के लिए तैयार बाजार पर नजर डालें जो अंततः बलात्कार जैसी वीभस्तता पर जाकर खत्म होता है. सेक्स विषय पर आज समाज बहस जरूर करता है लेकिन सेक्स के इस बाजार के बारे में बात करने में उसकी नैतिकता को चोट पहुचती है. आज सरकारी योजनाओं के साथ मीडिया और बाजार खुले सेक्स की ओर समाज को धकेलने का काम कर रही है. सेक्स के लिए जरूरी या बचने के उपायों का खूब प्रचार किया जाता है. एक बड़ा बाजार जिस पर आम आदमी की नजर भी नहीं पड़ती है एक पानवाडी से लेकर बड़े से बड़े माल तक में सजा दिखता है. क्या ये सब भी बलात्कार के लिए जिम्मेदार हैं? इस विषय पर कोई बहस आज तक नहीं दिखी. देश में गर्भ निरोधकों का एक बड़ा बाजार है. जिसमें अनवांटेड 72, आई-पिल्स, कांडोम खुले आम बिकते हैं. इनके कई पन्नों के विज्ञापन रोज समाचार पत्र और पत्रिकाओं में छपते हैं. टीवी में इनके विज्ञापन काफी आम हैं. जिसमें इनसे मिलने वाली चरम अनुभूतियों के साथ लाभ भी गिनाएं जाते हैं. अब बात करते हैं इनके ग्राहकों की, इसमें तमाम वे लोग हैं जिन्हें इनकी आवश्यकता नहीं है. टीनएजर के साथ अविवाहितों का बड़ा वर्ग भी इसका खुल कर प्रयोग कर रहा है. अविवाहित जोड़ें इनका प्रयोग क्यों कर रहें हैं? इन उत्पादों को उन्हें क्यों बेचा जा रहा है. क्या इनके उपयोगकर्ताओं का कृत्य बलात्कार की श्रेणी में नहीं आता है? आज बाजार में सेक्स पावर को बढाने के साथ गर्भधारण करने से बचने के तमाम तरीके मौजूद हैं और आसानी से उपलब्ध भी हैं और इन्हें काफी लुभावने विज्ञापनों के साथ बेचा जा रहा है. किसी भी मीडिया की बात कर लें सब जगह इनकी चर्चे आम हैं. विशेषकर इन्टरनेट और मोबाइल की दस्तक ने इसे आम आदमी से जोड़ने में बड़ी मदद की है. पोर्न साइट्स खुलेआम उपलब्ध हैं जहां पर सेक्स खुला बिक रहा है. एक फोन पर मेल या फीमेल एस्कॉर्ट हाजिर, हर छोटे-बड़े शहर में एक बड़ी कम्युनिटी इससे जुडी है. मल्टीमीडिया फोन पर अश्लील क्लिप और फुल लेंथ फ़िल्में कोई भी कहीं भी डाऊनलोड करवा सकता है. ये फ़िल्में 10 रूपये की सीडी या डीवीडी से लेकर 500 रूपये की सदस्यता लेकर भी डाउनलोड करवाई जा सकती हैं. और देश में ही पिछले साल करीब 500 करोड़ का बिजनेस सिर्फ महानगरों में किया गया है वह भी पूर्णतया अवैध तरीके से. कई साइट्स तो खुल्मखुला सेक्स स्टोरी परोस रही हैं जो एक आम मन को विचलित करने के लिए काफी हैं. तमाम भारतीय भाषाओं में इन साइट्स पर उत्तेजक कहानियां उपलब्ध हैं. अन्तर्वासना डॉट कॉम जैसी तमाम साइट्स इन उत्तेजक कहानियों को भारतीय नामों के साथ जोड़कर प्रकाशित करती हैं. रेड ट्यूब डॉट कॉम जैसी साइट्स बिलकुल फ्री में सेक्स फिल्मों को डाउनलोड करने की सुविधा दे रहीं हैं. ये सब जनता और सरकारों के सामने है. लेकिन कोई कुछ नहीं बोलता और फेसबुक और ट्विटर पर बलात्कार या महिलाओं के अधिकारों की बात करने वाले एक्टिविस्ट और संस्थान भी कुछ नहीं बोलते. इस वैश्विक बाजार पर ना ही न्यायपालिका को कुछ गलत नजर आता है और ना ही कार्यपालिका को. आम जनता भी बलात्कार और छेड़खानी घटनाओं पर तो भड़कती है लेकिन इन विषयों के साथ काफी खामोश नजर आती है. तो क्या ये मान लिया जाय की सभी की मौन सहमति इस बाजार के साथ है? जी हाँ कुछ ऐसा ही हम बलात्कारियों की सेक्स भावना भड़काने वाले इन कारणों के साथ अपनी सहमति जताकर कर रहे हैं. अभी एक विश्लेष्ण में सामने आया है की देश में वियाग्रा के 66 सबस्टीट्यूट उपलब्ध हैं जिन की कीमत प्रति गोली Sxx (100 Mg) (Roselabs Healthcare Pvt. Ltd.) 5.73 रूपये से लेकर Viagra (100 Mg) 621.85 रूपये (Pfizer) तक है जो बिना डाक्टरी प्रिस्क्रिप्शन के किसी के लिए भी आसानी से उपलब्ध हैं. कई आनलाइन साइट्स आपको 15% तक छूट के साथ इसकी होम डिलीवरी भी बिना प्रिस्क्रिप्शन के कर देती हैं.
अब आप बताये जब सारा बाजार तैयार है और सभी को सुलभ भी है तो फिर सेक्स भावनाएं भड़कती हैं और उनकी परिणिति बलात्कार के रूप में होती है तो उसे कौन रोक पायेगा. दिल्ली की सबसे बड़ी एसी मार्केट में सेक्स टॉयज बेचने वाले आपको सीधे ऑफर करते हुए मिलते हैं. किसी को उनसे कोई परेशानी नहीं होती है. इस बाजार के साथ उत्तेजना और वह्शीयत के इस इस सच को स्वीकार करना होगा और इससे निपटना भी होगा तभी रेप और रेपिस्ट को रोका जा सकेगा.
(आशुतोष पाण्डेय)
अब आप बताये जब सारा बाजार तैयार है और सभी को सुलभ भी है तो फिर सेक्स भावनाएं भड़कती हैं और उनकी परिणिति बलात्कार के रूप में होती है तो उसे कौन रोक पायेगा. दिल्ली की सबसे बड़ी एसी मार्केट में सेक्स टॉयज बेचने वाले आपको सीधे ऑफर करते हुए मिलते हैं. किसी को उनसे कोई परेशानी नहीं होती है. इस बाजार के साथ उत्तेजना और वह्शीयत के इस इस सच को स्वीकार करना होगा और इससे निपटना भी होगा तभी रेप और रेपिस्ट को रोका जा सकेगा.
(आशुतोष पाण्डेय)
मंगलवार, 1 जुलाई 2014
अगर यशवंत सिन्हा खुद मुख्यमंत्री बने तो
रांची 1 जुलाय 2014, झारखंड में विधान सभा चुनाव में अगर भाजपा जीती तो मुख्यमंत्री कौन बनेगा इस सवाल के जवाब में भाजपा के वरिष्ठ नेता यशवंत सिन्हा अपना आपा खो बैठे. उनका जवाब इतना अशोभनीय था की भाजपा के नेताओं के पास सफाई देने के लिए भी शब्द नहीं बचे हैं. यशवंत सिन्हा रांची स्थित झारखंड चेंबर ऑफ कॉमर्स में प्रदेश के बजट पर एक प्रोग्राम को संबोधित कर रहे थे. हाल ही में पूर्व विदेश मंत्री सुर्खियों में थे जब उन्होंने झारखंड में बिजली को लेकर आंदोलन शुरू किया था. इस सिलसिले में वह हजारीबाग में 15 दिनों तक जेल में भी रहे.
जेल में जब बीजेपी से सीनियर नेता लालकृष्ण आडवाणी उनसे मिलने गये थे तो उन्होंने ने कहा था कि यशवंत सिन्हा झारखंड में नेतृत्व संभालने के लिए बेहद सक्षम नेता हैं. केंद्र की राजनीति से मोदी सरकार से बाहर होने के बाद सिन्हा झारखंड में फिलहाल खुद को सक्रिय रख रहे हैं. सिन्हा के आपत्तिजनक बयान के बाद झारखंड की राजनीति में एक नया बवाल खड़ा हो गया है. राजनीतिक पार्टियों ने तीखी आलोचना की है. बीजेपी के ज्यादातर नेताओं ने इस अशोभनीय कथन पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया. झारखंड के प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सुखदेव भगत ने कहा कि इतने सम्मानित और अनुभवी नेता से ऐसी आपत्तिजनक और असंसदीय भाषा की उम्मीद नहीं थी. इससे पहले भी भाजपा के नेता अपनी पार्टी पर ही खीस निकालते रहें हैं.
यदि कभी सिन्हा खुद मुख्यमंत्री बनते हैं तो क्या खुद को उस अशोभनीय शब्द से ही संबोधित करेंगें? जहां भाजपा के नेता एक ओर आदर्शों का ढोंग खुले आम करते हैं वहीं इन नेताओं की इन भद्दी टिप्पणियों पर चुप्पी साधे बैठे रहते हैं.
मंगलवार, 1 अप्रैल 2014
वाड्रा के मोदी गान के बाद मोदी ने उन्हें देश का दामाद कहा
अब राबर्ट वाड्रा ने नरेंद्र मोदी का गुणगान किया है कल रात एक बिजनेस सेमीनार में उन्होंने कहा की नरेंद्र मोदी ही भारतीय व्यापार को ऊँचाइयों पर पहुचा सकते हैं, उन्होंने गुजरात माडल की तारीफ़ करते हुए कहा की जिस तरह गुजरात का विकास हुआ है उसी तर्ज पर पूरे देश को विकास के रास्ते पर अग्रसर करने की आवश्यकता है. इसके तुरंत बाद मोदी ने भी कहा "राबर्ट इस देश के दामाद हैं" हम उनकी सोच की तारीफ़ करते हैं. दिल्ली में हुए इस सेमीनार के बाद आयोजकों और मीडिया को इस बारे में तूल ना देने का आग्रह किया है. दस जनपथ या कांग्रेस के किसी वरिष्ठ नेता ने इस पर किसी टिप्पणी से इनकार कर दिया है, लेकिन भाजपा आज इस बारे में एक प्रेस कांफ्रेस करने का मूड बना रही है.(महामूर्ख मीडिया प्रतिनिधि)
की प्रस्तुति
शनिवार, 29 मार्च 2014
मसूद गिरफ्तार, राहुल नहीं जायेंगे सहारनपुर
उत्तर प्रदेश में सहारनपुर संसदीय सीट से कांग्रेस के उम्मीदवार इमरान मसूद की शनिवार तड़के हुई गिरफ्तारी के बाद पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गांधी की सहारनपुर रैली रद्द कर दी गई है. राहुल की शनिवार को सहारनपुर, गाजियाबाद और मुरादाबाद में जनसभाएं होनी थी, लेकिन मसूद की गिरफ्तारी के बाद उनकी सहारनपुर रैली स्थगित कर दी गई है. राहुल की बाकी दोनों रैलियां तय समय पर ही होंगी. अपने इस भाषण में मसूद ने नरेंद्र मोदी की बोटी-बोटी अलग कर देने की बात कही थी. इस मामले में उनके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज हुई थी और इस बयान के लिए मसूद के खिलाफ कार्रवाई की मांग हो रही थी. पुलिस ने बताया कि मसूद को आज सुबह गिरफ्तार किया गया. मसूद सहारनपुर से कांग्रेस के लोकसभा चुनाव के प्रत्याशी हैं. पार्टी ने उनकी टिप्पणी से यह कहते हुए दूरी बना ली थी कि वह हिंसा को अस्वीकार करती है, चाहे वह शाब्दिक हो या कुछ और. वहीं, भाजपा ने इस टिप्पणी को भड़काउ करार देते हुए विवाद में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को घसीट लिया था. इसके बाद राहुल की सहारनपुर रैली को रद्द कर दिया है. मसूद की उम्मीदवारी को लेकर पार्टी में काफी विवाद चल रहा है. वैसे मसूद ने खुद कांग्रेस पार्टी को इससे अलग करते हुए कहा है की ये भाषण उन्होंने तब दिया था जब वे कांग्रेस में शामिल नहीं थे. इस भाषण के वीडियो फुटेज में मसूद मोदी की बोटी-बोटी करने की बात कह रहें हैं.
(इनसाईट स्टोरी)
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मंगलवार, 25 मार्च 2014
तहलका कार्टूनिस्ट तन्मय को माया कामथ अवार्ड-2013
इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ कार्टूनिंग के द्वारा माया कामथ मेमोरियल अवार्ड-२०१३ की घोषणा कर दी गयी है. राजनैतिक कार्टून की क्षेणी में प्रथम पुरूस्कार के लिए तहलका दिल्ली के सीनियर कार्टूनिस्ट तन्मय त्यागी को चुना गया है. इस अवार्ड के लिए 95 एंट्री में से प्रथम रू० 25000 का पुरूस्कार वर्तमान राजनैतिक घटनाचक्र पर बनाये गये एक चप्पल कार्टून के लिए तन्मय त्यागी को दिया जाएगा. इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ कार्टूनिंग के द्वारा जारी नोट में बताया गया है कि ये अवार्ड 100 वीं कार्टून प्रदर्शनी में जून 2014 में प्रदान किये जायेंगें. उनके अलावा मनोज चोपड़ा पंजाब केसरी (जम्मू-तवी ) को दूसरा और आलोक निरंतर (सकल टाइम्स) को तीसरा स्थान मिला है. सर्वश्रेष्ठ फॉरेन कार्टूनिस्ट का अवार्ड बुल्गारिया के वलेंतिन को दिया गया है.Follow Tanmay On Facebook
गुरुवार, 13 फ़रवरी 2014
प्यार और सेक्स क्या जरूरत नहीं है
कल कुछ लोग प्यार करेंगें! प्यार का इजहार करेंगें! और कुछ इन प्यार करने वालों की खिलाफत. पहली बार एक व्यापक आन्दोलन भी शुरू होगा प्यार करने वालों के लिए.. लव धर्मा नाम से एक संस्था पहली बार प्रेम और सेक्स की सर्वमान्यता पर एक आन्दोलन करने जा रही है. इस देश में प्रेम को खाप की नजरों से ही देखा जाता है लेकिन आज इस बदलते समय में तो हमको बदलना ही होगा. प्यार को परिभाषित या कहें तो स्वीकार्य बनाना ही होगा. हर इंसान के अन्दर प्रेम और सेक्स की प्रवृति होती है और ये ही कारण है की हम एक व्यापक सृष्टि को देखतें हैं. इस सच के बाद भी प्यार और सेक्स को लेकर कहीं ना कहीं एक विरोध दिखता है. आज प्यार एक कुंठा के रूप में जन्म ले रहा है, आप देख सकते हैं की दिल्ली के तमाम पार्कों में अश्लीलता की हद से भी ज्यादा काफी कुछ दिखता है. समाज की मान्यता ना मिलने के कारण ये सब काफी संक्रमित स्थिति में दिख रहा है. समाज, स्कूल, कालेज जहां इस प्यार की शुरूआत होती है वहीं इस प्यार पर पाबंदियां हैं. बजाय पाबंदी के इसे प्रोत्साहित किया जाय, प्यार करना जुर्म ना हो... प्यार के इजहार में आनर किलिंग की धमकी ना हो तो ये प्यार सही दिशा में जाएगा. प्यार के अलावा सेक्स को तो और भी गंदी मानसिकता के साथ देखा जाता है, लेकिन जो सेक्स समस्त सृष्टि का कारक है उसे लेकर इतना हल्ला क्यों? कुछ या कहें
ज्यादातर लोग जो कभी ना कभी सेक्स की क्रियाओं में लिप्त रहतें हैं उन्हें दूसरों की लिप्तता पर बैचेनी क्यों होती है. इस प्रश्न पर एक महानुभाव का सवाल था पार्कों में जो हो रहा है, दिख रहा है क्या वह सब ठीक है? उनका ये सवाल काफी अटपटा था... मैंने कहा की क्या आप इन बच्चों को घर में प्यार करने का मौक़ा देंगें तो वे उबल गये और काफी खरी-खोटी सुना निकल गये. ऐसे ही एक कृष्ण भक्त मिले जो कृष्ण की रास लीला के दीवाने थे एक दिन अपनी बिटिया को किसी लडके के साथ काफी पीते देख लिया तो आपा खो बैठे पहले बिटिया की ठुकाई और फिर लडके के घर जा उसे देख लेने की धमकी देकर आये. जब हमने उनके बारे में जाना तो पता चला की 20 साल पहले उन्होंने खुद लव मैरिज की थी. जो चीज 20 साल पहले ठीक थी आज गलत हो गयी कैसे?
कभी भी आ सकता है केजरीवाल का इस्तीफा
अभी दे सकते हैं केजरीवाल इस्तीफा! विधान सभा के सत्र में 13 फरवरी को जनलोकपाल को लाने की घोषणा के बाद अंत में केजरीवाल ने अपनी आदत के मुताबिक़ फिर इस बात से पलट कर अपना आदर्श कायम रखा है और फिर विधानसभा में सोमनाथ भारती के इस्तीफे की मांग को लेकर भाजपा और कांग्रेस विधायकों ने काफी बबाल काटा है. सोमनाथ पर चूड़ियाँ और लिपस्टिक फेंक विरोध जताया जा रहा है. विश्वस्त सूत्रों के अनुसार केजरीवाल इस बात का फायदा उठा अपना इस्तीफा विधान सभा में ही पेश कर सकते हैं. ऐसा कर वो एक सन्देश देने में कामयाब हो सकते हैं की आज संसद और फिर विधान सभा में जो घटा उसके बाद वे इस सिस्टम से अलग होना ही पसंद करेंगे. तेलंगाना की मांग को लेकर संसद में चाकू तक निकाले जा चुके हैं. ये चाकू कैसे अन्दर पहुचें ये भी एक बड़ा प्रश्न है. क्या वास्तव में हमारी संसद में सुरक्षा की कोई व्यवस्था नहीं है ये तमाम सवाल हैं जो अब उठने चाहिए. विधान सभा से बाहर कई थिंक टैंकर इस भूमिका को तैयार करने में लगें हैं.
बुधवार, 12 फ़रवरी 2014
वेलेंटाइन प्रेम सन्देश भेजें अपने अजीज को
अपने वेलेंटाइन मेसेज भेजें अपने ख़ास को... इस वेलेंटाइन पर कुछ ख़ास मेसेज भेजें जिन्हें पढने वाला सदा याद रखे.
अपने मैसेज #love2014 लिखकर हिन्दी या अंगरेजी में भेंजें... इसके साथ आप पिक्चर भी भेज सकते हैं लेकिन केवल JPEG Format में... हम आपके मैसेज आपके अजीज तक पहुचायेंगें...
मैसेज में अपना नाम इमेल के साथ मोबाइल न. भी शेयर कर सकते हैं.
साथ ही जिसे मैसेज भेजना हो उसका नाम भी लिखें...
मैसेज editor.insight@hotmail.com पर भेजें... आपके मैसेज तुरंत लाइव किये जायेंगे.
गुरुवार, 23 जनवरी 2014
मैं ज़िंदा हूँ क्योंकि ये मेरे साथ हैं
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| धर्मेन्द्र: एक जीवंत प्रेरणा |
(क्या आप को भी ऐसे शिक्षक चाहिए?कल एक केन्द्रीय विद्यालय से रिटायर्ड प्रधानाचार्य मिले, उनकी एक अजीब अनुनय थी पाण्डेय जी मैंने आज तक कोई भ्रष्टाचार नहीं किया बड़े ईमानदारी से नौकरी की अब आपसे एक विनती है कहीं अपने सम्बन्धों का प्रयोग कर मेरे बेटे को जिसने केन्द्रीय विद्यालय पी जी टी (इतिहास) का पेपर दिया है पास करवा दो... जितना भी लेना देना पड़े कोई बात नहीं.
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| एस जी नाथन: खूबसूरत जिन्दगी |
दूसरे मित्र का उल्लेख भी उनके नाम के साथ करूंगा. एस जी नाथन एक आम लेकिन ख़ास शख्शियत का आदमी जिसके लिए जिन्दगी में मूल्यों का विशेष मूल्य है. जब भी जो किया उस ईश की कृपा मान कर किया और जीवन के हर पल को खूबसूरत बना दिया. इसके साथ एक बड़ा नाम जिसका उल्लेख में कर रहा हूँ एक योगी का है जिसे कर्मयोगी कहूं या फिर एक इंसान (क्योंकि आज करोड़ों की भीड़ में सब मिलते हैं सिवा इंसान के) धर्मेन्द्र कुमार सिंह इस चेहरे पर जो शांत और निश्चल मुस्कान खिली होती है वो जो कहती है वह वास्तव में सम्मोहित करने वाली है. यूपी के कानपुर में साह्वेस के नाम से एक प्राकृतिक आन्दोलन जिसमें अनन्य भक्ति के साथ कई लोगों को जीवन प्रेरणा देकर उन्हें इंसान बना देना ये एक छोटा काम नहीं है. इन सब लोगों से घिरा क्या महसूस करता हूँ क्या कहूं? जब सबसे पहले वाले प्रधानाचार्य मिलते हैं तो लगता है धन ही जीवन है और जब नाथन या धर्मेन्द्र से मुखातिब होता हूँ तो लगता है एक जीवन सुधार दूंगा तो तमाम सम्पत्ति मिल जायेगी. सच कहूं तो उन प्रधानाचार्य के चेहरे पर चिंता चिता बन सुलग रही थी लेकिन ये दो लोग खुल कर मुस्कराते हैं इनके हाथ खुले होते हैं और ऊपर वाला भी इन पर नियामत लुटाता है. बस कोशिश करें की हम भी इन दो जैसे हाथों को फैला सारे जहां को समा लें...
मेरे दोस्त धर्मेन्द्र और नाथन को... शब्द खत्म हो जाते हैं सिर्फ दुआएं निकलती हैं.
गुरुवार, 9 जनवरी 2014
नमो-नमो कहीं केजरी की भेंट ना चढ़ जाय
अजी बस हर ओर एक ही हल्ला है केजरीवाल और "आम आदमी पार्टी". पिछले एक साल से देश में प्रधानमंत्री पद के लिए भाजपा मोदी को आगे कर रही थी और सारा देश नमो-नमो का जाप कर रहा था. लेकिन दिल्ली में केजरीवाल क्या आये? सब कुछ बदलने लगा. मोदी का ग्राफ भाजपा के साथ नीचे आने लगा है कई बीजेपी के नेता जो कि गुजरात से सम्बंधित हैं अब "आप" का जाप कर रहें हैं. मोदी तो प्रधानमंत्री के रूप में पहली पसंद जरूर हैं लेकिन सांसद के लिए वोट का सवाल है तो आप काफी आगे है. जब वोट आप को पड़े तो फिर भाजपा के नमो की प्रसिद्धि का क्या फायदा होगा? शहरों में केजरीवाल जिस तरीके से पकड़ बना रहें है उससे तो ये साफ़ दिख रहा है एक बार फिर आम आदमी के साथ केजरीवाल देश की राजनीति की दिशा को अपने साथ मोड़ने के लिए तैयार हैं. आज आई.बी.एन. 7 से इस्तीफा दे आशुतोष भी आम आदमी पार्टी में शामिल होने की बात कर रहें हैं. ना सिर्फ शहरों में बल्कि गावों और कस्बों में भी केजरीवाल का जादू सर चढ़ बोल रहा है. ना सिर्फ युवाओं में बल्कि सभी आयु वर्ग में केजरीवाल के चाहने वाले हैं. देश भर में आम आदमी पार्टी की लगातार बढ़ती पॉप्युलैरटी से न सिर्फ बीजेपी, बल्कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) भी डरा हुआ है. आरएसएस ने दिल्ली में आप की कामयाबी को बीजेपी के लिए बड़ा संकट बताया है. संघ ने कहा है कि राज्यों में हाल ही में हुए विधानसभा चुनावों में जीत से बीजेपी को ज्यादा खुश होने की जरूरत नहीं है. पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में बीजेपी ने राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में सरकार बनाने में कामयाबी हासिल की, वहीं दिल्ली में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभर कर सामने आने के बावजूद आम आदमी पार्टी ने बीजेपी को सरकार बनाने से रोक दिया. असल में आरएसएस की ये चिंता जायज भी है क्योंकि इस समय एक मौक़ा है जब भाजपा केंद्र में सरकार बना सकती है और अभी ये ना हो पाया तो भाजपा को लंबा इन्तजार करना पड़ सकता है.
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केजरी सर-सर-कार ये कैसी सरकार है?
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दिल्ली को काफी ना-नुकर के बाद एक आधी अधूरी सरकार तो मिल गयी लेकिन लगता है ये एक अपरिपक्व सरकार है, जिसका कोई एक केंद्र न हो ये बहुकेन्द्रित सरकार है. ये सरकार किसी नियम या कायदे से बंधी नहीं दिख रही है. तीन फैसलों के अलावा इस सरकार के पास बताने को क्या है? ये तो खुद इन्हें ही नहीं पता होगा. बिजली और पानी के लिए तो सब्सिडी की सीढ़ी चढ़ केजरीवाल ने धमाल कर दिया. भ्रष्टाचार के लिए बनी हैल्प लाइन पर शिकायत नहीं सुनी जायेगी बल्कि स्टिंग आपरेशन करने सिखाये जायेंगें. इसके अलावा पार्टी के बड़े नेता कश्मीर के बारे में एक दुखद रवैया रखते हैं. इसे सरकार ना कह सिर्फ एक दवाब समूह का शासन कहा जाय तो अच्छा होगा. क्योंकि इसके राज में जो भी हो रहा है वह सिर्फ आम आदमी पार्टी के पोर्टल पर दिख रहा है. दिल्ली सरकार के पोर्टल पर कोई भी जानकारियां उपलब्ध नहीं हैं, इसका सीधा मतलब क्या है इस सरकार को अपने ही सरकारी तन्त्र से परहेज है. सत्ता में आने के बाद भी सरकार शब्द से कट कर क्या साबित करना चाहते है "आप" के लोग. कार्यशैली देखिये जीते-हारे सारे विधायक, मंत्री, वालियेंटर सब कुल मिला कर अफसरों की क्लास लेने में उलझे हैं. कहीं किसी को कुछ करने का मौक़ा ही नहीं दे रहें हैं. ऐसे में दिल्ली का क्या होगा ये सवाल काफी बड़ा है. इसके अलावा लोकसभा की 300 से ज्यादा सीटों पर अपने उम्मीदवार उतार कर केंद्र में भी सत्ता सुख का आभास लेना अब इसका अगला टार्गेट है. एलीट क्लास की एक बड़ी भीड़ आजकल इस पार्टी के इर्द-गिर्द दिख रही है. बड़े-बड़े कार्पोरेट घरानों को बाय-बाय कर ये लोग पार्टी से जुड़ रहें हैं. कुछ टिकट के जुगाड़ में तो कुछ किसी और जुगाड़ में. ये देश भी बड़ा अजीब है, कभी किसी को अर्श पर ले आता है तो किसी को फर्श पर. अभी आप का समय चल रहा है. लेकिन कहीं जनता का ये मोह अन्तोत्गत्वा जनता को महंगा साबित ना हो. आने वाले लोकसभा चुनावों में "आप" अपना वजूद जाहिर करेगी ये तो तय है और दिल्ली के तख्त की लड़ाई को मजेदार भी बनायेगी. कहीं ऐसा ना कि अभी तक बिखरे तमाम दल एक छतरी के नीचे आ जाएँ और दक्षिण और वामपंथ जैसे शब्दों की खाई भी पट जाए. वैसे केजरीवाल खुद और अपनी पार्टी को आम जनता के साथ जोड़ कर दिखा रहें हैं लेकिन इस देश में जहां एक धर्म और एक जाति के अन्दर ही ना जाने कितने विभाजन हैं वहां ये नारे कितने काम आयेंगें पता नहीं. स्वराज की बात यहाँ कौन नहीं करता... और कौन इसको स्थापित करने के लिए कोशिश करता है ये सवाल भारतीय राजनिती में काफी बड़े हो जाते हैं.
बुधवार, 25 दिसंबर 2013
केजरीवाल आयेंगें कांग्रेसी जेल जायेंगें?
इस समय दिल्ली में सबसे ज्यादा बैचेन कोई है तो वो हैं कांग्रेसी नेता, जिनके कई मामले ऐसे हैं जिनकी जांच केजरीवाल करा सकते हैं. इसमें कामनवेल्थ घोटाला, शीला सरकार के मंत्रियों के द्वारा पद के दुरूपयोग का मामला और विधायक निधि के साथ कई योजनाओं की जांच की जा सकती है. इसी कारण कांग्रेस का एक बड़ा धड़ा कांग्रेस के आप को समर्थन का विरोध कर रहा लेकिन कांग्रेस पर इस समय डैमेज कंट्रोल का दवाब ज्यादा है, इस लिए कुछ नेताओं की बलि भी कांग्रेस देने को तैयार है. 2010 में कॉमनवेल्थ गेम्स के दौरान निर्माण कार्यों में की गई भारी गड़बड़ी की खबरें देश ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बनी थी. सुरेश कलमाड़ी तो इस मामले में जेल भी जा चुके हैं. आम आदमी पार्टी इस घोटाले को जोर-शोर से उठाती रही है. अगर आम आदमी पार्टी की सरकार कॉमनवेल्थ गेम्स घोटाले की जांच शुरू करवाती है, तो शीला सरकार के कई मंत्री इसके फंदे में आ सकते हैं. इसके अलावा कई अन्य फाइलें भी खोली जा सकती हैं, कांग्रेस ही नहीं बीजेपी के विधायकों की भी जांच करवाई जा सकती है. इसकी ओर केजरीवाल एक 2 मिनट का विडियो जारी कर इशारा भी कर चुके हैं. इन मामलों में कई मामले तो केंद्र सरकार से भी जुड़े हैं और अगर कोई जांच करवाई जाती है और करवाई ही जायेगी तो गाज केंद्र सरकार पर भी गिर सकती है और कुछ मामलों में तो पीएमओ सीधे लपेटे में आ सकता है. लोकसभा चुनाव से पहले यदि कोई नया मामला खुलता है और उसमें कोई कांग्रेसी नेता लपेटे में आता है तो कांग्रेस के लिए जवाबदेही मुश्किल हो सकती है. यही बैचेनी कांग्रेस को खाए जा रही है जिस तरीके से दिल्ली के कांग्रेस नेताओं को बलि का बकरा बनाया जा रहा है उनमें गुस्सा जायज है और इसका परिणाम भी जल्द सामने आ सकता है. बस केजरीवाल अपनी टीम को अनुशासित रख लें जो काम कल बिन्नी ने किया उसकी पुनरावृति ना हो तो शायद केजरीवाल स्वराज के पहले अध्याय को सच कर सकें.
केजरीवाल का लोकपाल : केजरीवाल कहीं ना हो जायें फेल
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| मैं क्या करूं ये कानून ही ऐसा था, कांग्रेस ने छिपा कर रखा था. |
A.K-47 के जनक ने ली दुनिया से विदा
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| मिखाइल कलाशनिकोफ़ |
क्या होगा केजरीवाल का: शपथ लेगें या फिर कोई नया ड्रामा
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| अरविन्दर सिंह लवली |
दिल्ली प्रदेश कांग्रेस के नेताओं में आप के बगावत के ड्रामे के बाद बड़ी फूट दिख रही है, पार्टी का एक बड़ा धड़ा आम आदमी पार्टी को समर्थन का विरोध कर रहा है और कल रात दिल्ली प्रदेश कार्यालय में कार्यकर्ताओं ने काफी बड़ा हंगामा किया है, इन हंगामा करने वालों को सांसद संदीप दीक्षित का समर्थक बताया जा रहा है. आप को समर्थन पर शीला दीक्षित ने भी कड़ा रूख अख्तियार किया है, जब तक आप हमारे हिसाब से चलेगी तभी तक समर्थन जारी रहेगा. लेकिन प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष अरविंदर लवली का कहना है यदि सरकार सही ढंग से काम करेगी तो पांच साल तक हमारा समर्थन जारी रहेगा. जब हमने कांग्रेसी कार्यकर्ताओं से बात की तो सबने कहा की आप को समर्थन दे कांग्रेस अपने पैर पर कुल्हाड़ी मार रही है. यही बात कुछ भाजपा समर्थकों ने भी कही कि केजरीवाल की आस्था लोकतंत्र जैसे शब्दों में नहीं है उन्हें तानाशाही का शौक है और जब तक मुख्यमंत्री हैं बस वे इसी शौक को पूरा करेंगें. लेकिन वर्तमान में बड़ा सवाल है कि क्या केजरीवाल शपथ के लिए मंच तक पहुचेंगे भी या नहीं क्योंकि एक ओर पार्टी के करीब चार विधायक नाराज हैं जिसमें एक तो खुल कर बगावत का बिगुल बजा चुके हैं और दूसरी ओर कांग्रेस में चल रहे अंदरूनी कलह के चलते अंतिम समय में कांग्रेस का ऊंट किस करवट बैठेगा पता नहीं चल रहा है. वैसे विश्वस्त सूत्रों की मानें तो सोनिया और राहुल पार्टी को निर्देश दे चुके हैं की आप की सरकार बनने दें. आज और कल ये दो दिन काफी महत्वपूर्ण हैं और दिल्ली ही नहीं देश की सियासी राजनीति का भविष्य भी यही तय करेंगें.और ख़ास
आप की हंडिया फोड़ दी बिन्नी ने:आप में बगावत
मंगलवार, 24 दिसंबर 2013
आप की हंडिया फोड़ दी बिन्नी ने:आप में बगावत
राजनीति कोई भी करे उसमें स्वार्थ ना हो ऐसा हो सकता है? यही हाल हो रहा है नई बन रही केजरीवाल सरकार का. 6 मंत्रियों के नाम का खुलासा क्या हुआ, लक्ष्मी नगर से पार्टी के विधायक विनोद बिन्नी ने मंत्री पद ना मिलने के कारण बगावत कर बुधवार को कोई बड़ा खुलासा करने की बात कह दी. ऐसा ही गुस्सा तीन और विधायकों में भी है और हो सकता है आप की ये हंडिया चूल्हे पर चढ़ने से पहले ही टूट जाय. खैर 26 को दिल्ली के मुख्य सेवक शपथ लेंगें देखना है तब तक क्या होता है? 102 साल के अमिताभ बच्चन
जी हाँ आप जल्द ही 102 साल के अमिताभ से रूबरू होंगें... लेकिन 71 साल के अमिताभ अब 102 के कैसे हो गये? अजी ये अमिताभ हैं बच्चे से लेकर बूढ़े तक हर रोल को क्या बखूबी निभाते हैं और इस बार 102 साल के एक वृद्ध का किरदार अदा कर रहें है फिल्म "102 नॉट आउट" में. उनके 75 साल के बेटे की भूमिका में मिलेंगें परेश रावल. फिल्म का निर्देशन ओ एम जी के निर्देशक उमेश शुक्ला कर रहें हैं.
नितीश की हत्या मोदी के हाथ?
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| गिरिराज सिंह |
अब मोदी के हाथों के हाथों होगी नितीश की हत्या ये बयान देकर बिहार भाजपा के एक नेता गिरिराज सिंह बुरी तरह फंस गये हैं. बिहार के वैशाली जिले में एक जनसभा में तैश में आकर मोदी के हाथ नितीश की हत्या का बयान देने के बाद फंसे गिरिराज अब कई बहाने बना रहे हैं. ये वही गिरिराज हैं जो पहले भी नितीश को ईर्ष्यालु औरत कह चुके हैं. जनता दल (यू) के नेताओं ने इस पर कड़ी टिपण्णी की है.सोमवार, 23 दिसंबर 2013
आप के साथ दिल्ली की जनता भी ईमानदार हो जायेगी
आप रिश्वत ना भी मांगें तो भी ऑफर की जाती है, यदि रिश्वत लेकर कोई काम करने से मना कर दे तो उसके खिलाफ जनता की भृकुटी भी तन जाती है, कई ईमानदार अधिकारियों को रोज इन समस्याओं से दो चार होना ही पड़ता है, पोस्टिंग के लिए रिश्वत, तबादले के लिए रिश्वत और तो और 100 रूपये के बिल को पास कराने के लिए भी रिश्वत देनी पड़ती है. "लोग खुद आकर रिश्वत ऑफर करते हैं, ले लो तो ठीक भगा दो तो आन्दोलन. अब बताएं क्या ठीक है"? दिल्ली सरकार के एक अफसर ने ये बात काफी खेद के साथ कही जब उनसे पूछा गया की आम आदमी पार्टी की सरकार बनने के बाद भ्रष्टाचार पर कितनी रोक लगेगी, उनका कहना था एक सरकारी स्कूल में जहां मुफ्त शिक्षा मिलती है हम में से कितने लोग वहां बच्चों को भेज रहे हैं, भारी डोनेशन लेने वाले स्कूल अच्छे माने जाते हैं, क्योंकि ज्यादा बड़ा डोनेशन स्टेट्स सिम्बल बन गया है. जिस स्कूल में बिना डोनेशन एडमिशन मिल जाए उसमें कौन अपने बच्चे भेजना पसंद करता है, उसे तो दोयम दर्जे का स्कूल कहा जाता है. क्या आप लोगों को इस मानसिकता से बाहर निकाल लेंगें? घर बैठे काम कराने की परिपाटी ने ही दलाल संस्कृति को जन्म दिया है. यदि नियमानुसार ड्राइविंग लाइसेंस बनने लगें तो दिल्ली में आधे लोग ही लाइसेंस प्राप्त कर पायें. आप खुद देखिये कितने लोग ऐसे हैं जो समाचार पत्रों का प्रकाशन सही नियमों के अनुसार कर रहें है. देश में बी पी एल की लिस्ट उठा लो कितने ऐसे लोग हैं जो करोड़पति हैं और बीपीएल की सुविधा ले रहें हैं. सब झूठ में चल रहा है उनके खिलाफ कोई कार्रवाई करना भी एक अपराध है. तमाम दवाब ग्रुप हल्ला शुरू कर देते हैं. वास्तव में इन महानुभाव की ये बात काबिलेगौर है. जिस देश में बहुतायत लोग रेडलाईट को तोड़ चालान कटवाने के बजाय ले दे कर या धौंसबाजी से बचने का रास्ता निकालते हैं. सरकार रहने को मकान दे दे तो सामने की सड़क को अपने बाप की जायजाद मानते हैं, उनसे क्या ईमानदारी की उम्मीद की जा सकती है. अब देखना है "आप" का भ्रष्टाचार विरोध इन्हें कितना सुधार सकता है या फिर आप भी इन्हीं के रंग में रंग जाती है. देखते रहिये ये देश है जिसके कई रंग हैं कई रूप.
रविवार, 22 दिसंबर 2013
आप और साँप की सरकार
| आप के साथ सांप की सरकार: फोटो सौजन्य इनसाईट स्टोरी |
अभी दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार नहीं बनी है लेकिन भाजपा के बड़े नेताओं ने उन पर तंज कसने आरम्भ कर दिए हैं, जन्तर मंतर में भाजपा के द्वारा प्रायोजित एक अनशन के मौके पर प्रदेश भाजपा अध्यक्ष विजय गोयल ने आप और कांग्रेस के गठबंधन पर कहा देखिये आप और सांप की सरकार, उन्होंने कहा कि एक ओर आप के नेता कांग्रेस को दो मुँहा साप कहते हैं लेकिन उन्हीं के साथ सरकार बना रहें हैं. आम आदमी पार्टी की सफलता का असर विजय गोयल के तेवरों पर काफी दिखा इस बार उनका वार सीधा आप पर था.
पढ़िए: क्या मैं सरकार बना लूं?
इसी मंच से भाजपा के मुख्यमंत्री प्रत्याशी हर्षवर्धन भी आप को चुनौती देते दिखे कि जनता से किये वादे तो पूरे कर दिखाओ. इससे पहले कांग्रेस के नवनिर्वाचित प्रदेश अध्यक्ष अरविन्दर सिंह लवली भी आप के वादों पर यही कह चुके हैं. इस पर आप समर्थकों का कहना है की अगले 6 माह में दिल्ली से भाजपा और कांग्रेस का पत्ता साफ़ हो जाएगा. वैसे उनकी ये टिप्पणी उनके अति उत्साह का प्रतीक लगे लेकिन दिल्ली में मोदी की कई रैलियों के बाद भी भाजपा बहुमत नहीं जुटा पाई, इस सच से मुँह नहीं मोड़ा जा सकता है और इसके चलते ही कांग्रेस को दिल्ली में एतिहासिक हार का सामना करना पड़ा. जिस गति से आप ने अपना जनाधार अर्जित किया है अगर इस गति से ही आगे गई तो आगामी लोकसभा चुनावों में भी एक चुनौती कांग्रेस और भाजपा समेत सभी दलों के लिए पैदा कर सकती है. विशेषकर बड़े शहरों में आप अपने झंडे गाड़ सकती है. दिल्ली और आस-पास के इलाकों में भी आप एक बड़े विकल्प के रूप में खडी दिख रही है.
(आशुतोष पाण्डेय)पढ़िए: क्या मैं सरकार बना लूं?
इसी मंच से भाजपा के मुख्यमंत्री प्रत्याशी हर्षवर्धन भी आप को चुनौती देते दिखे कि जनता से किये वादे तो पूरे कर दिखाओ. इससे पहले कांग्रेस के नवनिर्वाचित प्रदेश अध्यक्ष अरविन्दर सिंह लवली भी आप के वादों पर यही कह चुके हैं. इस पर आप समर्थकों का कहना है की अगले 6 माह में दिल्ली से भाजपा और कांग्रेस का पत्ता साफ़ हो जाएगा. वैसे उनकी ये टिप्पणी उनके अति उत्साह का प्रतीक लगे लेकिन दिल्ली में मोदी की कई रैलियों के बाद भी भाजपा बहुमत नहीं जुटा पाई, इस सच से मुँह नहीं मोड़ा जा सकता है और इसके चलते ही कांग्रेस को दिल्ली में एतिहासिक हार का सामना करना पड़ा. जिस गति से आप ने अपना जनाधार अर्जित किया है अगर इस गति से ही आगे गई तो आगामी लोकसभा चुनावों में भी एक चुनौती कांग्रेस और भाजपा समेत सभी दलों के लिए पैदा कर सकती है. विशेषकर बड़े शहरों में आप अपने झंडे गाड़ सकती है. दिल्ली और आस-पास के इलाकों में भी आप एक बड़े विकल्प के रूप में खडी दिख रही है.
शनिवार, 21 दिसंबर 2013
क्या मैं सरकार बना लूं?
मंगलवार, 3 दिसंबर 2013
मोदी के चोचलें नहीं चल रहें है दिल्ली में
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दिल्ली विधान सभा चुनाव 70 सीटों पर होने हैं. इन 70 सीटों पर इस बार रोचक मुकाबला होना है. लगभग 1.15 करोड़ मतदाताओं के साथ शीला, हर्षवर्धन और केजरीवाल का भविष्य दांव पर लगा है. इस बार भाजपा मोदी कार्ड खेल रही है और इसी कार्ड के साथ चुनावों में है और कांग्रेस के पास इस बार मुद्दों के नाम पर कुछ भी नहीं है उनके खिलाफ सिर्फ सवाल ही खड़े दिख रहें हैं. विकास और रफ्तार के तमाम दावों के साथ भी कांग्रेस भ्रष्टाचार और महंगाई के मुद्दों पर घिरी दिख रही थी, लेकिन मोदी के जासूसी प्रकरण और आम आदमी पार्टी के खिलाफ सरकार मीडिया डाट काम के स्टिंग के बाद कांग्रेस की पतली हालत में थोड़ा सुधार हुआ है. 2008 में मिली 43 सीटों के मुकाबले इस बार कितनी सीटें मिलेंगी कहा नहीं जा सकता है. मुख्यमंत्री शीला दीक्षित अपनी चौथी पारी को लेकर खुद विश्वास नहीं कर पा रहीं हैं. लेकिन भाजपा भी इस बार विजय गोयल को दांव पर तो लगा चुकी है लेकिन हर्षवर्धन के साथ खेला उसका दांव कोई खास कमाल कर सके ये लगता नहीं हैं. "आप" के अरविन्द केजरीवाल भी मुख्यमंत्री की दौड़ में बेतहाशा भाग रहें हैं. केजरीवाल ने राजनिती के मैदान में गजब फील्डिंग सजाई है. अब देखना ये है क्या रन आउट कर कुर्सी कैच कर पाते हैं या नहीं? खुद नयी दिल्ली सीट से शीला दीक्षित के लिए चुनौती पैदा करने वाले भाजपा के विजेंद्र गुप्ता के भी सिरदर्द बन गये हैं, लेकिन इस सीट पर उनके लिए जीतना आसान नहीं है. अभी आप और केजरीवाल को काफी कुछ सीखना बाकी है, सिर्फ आदर्शों की हंडिया से दाल नहीं गलती है. आप जो एक समय एक निर्णायक दौर में था और करीब 20 सीटों में प्रभावित करने की स्थिति में था चुनाव आने तक वे एक से दो सीटों पर सिमटा दिख रहा हैं. मोदी के चोचलें यहाँ पर नहीं चल रहे हैं और विजय जौली के ड्रामा के बाद तो भाजपा की भत पीट रही है. पिछले चुनावों में 23 सीटों पर अटकी भाजपा इस बार 7-8 सीटों पर फायदा उठा सकता है. भाजपा इस बार अगर 30 का आकड़ा छू ले तो भी कांग्रेस कम से कम 30 सीटें लेने की स्थिति में दिख रही है. दो सीटों पर बसपा और एक पर लोकदल को जीत मिलती है तो भी 36 का जादुई आकड़ा जुटा लेना भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए काफी कठिन लगता है. 2 से 3 सीटें भी अगर आप को मिलती है तो भी वे किंग मेकर की भूमिका में दिखेंगे. अभी तक तो आप किसी भी पार्टी का समर्थन ना करने की बात कर रही है लेकिन खुद शीला दीक्षित गाहे-बगाहे आप के साथ के साथ गठजोड़ की संभावना व्यक्त कर चुकी हैं और दूसरी ओर आप समर्थक प्रधानमंत्री पद के लिए मोदी को ज्यादा लोकप्रिय उम्मीदवार मान रहें हैं इसका सीधा अर्थ ये है की आने वाले कल में केजरीवाल समर्थकों की दुहाई दे भाजपा का पल्ला थाम सकते हैं. इसमें अन्ना और रामदेव काफी अहम रोल निभा सकते हैं. 4 दिसम्बर को दिल्ली के भविष्य की इबारत ईवीएम में कैद हो जायेगी लेकिन परिमाणों के लिए 9 दिसम्बर का इन्तजार करना ही पड़ेगा.
(आशुतोष पाण्डेय)

शुक्रवार, 30 अगस्त 2013
दिल्ली विधान सभा चुनाव: फेल का खेल
दिल्ली विधान सभा चुनावों की उल्टी गिनती के साथ राजनीतिक उठापटक जोर पकड़ने लगी है. समीकरण उलझते ही जा रहें हैं. कांग्रेस और भाजपा की इस लड़ाई में इस बार आम आदमी पार्टी का भी एक पेंच है. कांग्रेस की शीला सरकार का विकास कार्ड, केंद्र की नाकामी और अर्थव्यवस्था का वर्तमान स्तर ये सब मिला कर ही दिल्ली में कांग्रेस का भविष्य तय होगा. पिछले 15 सालों में शीला का सियासी समीकरण हर वक्त फिट बैठा है और अंतर्कलह को भी दबाने में वह सफल रहीं हैं. 15 सालों के शासन में उनके दिल्ली को प्रोगेसिव बनाने की कोशिश को नकारा भी नहीं जा सकता, लेकिन सियासत यूं नहीं चलती है. इसके कई रूप और रंग होते हैं और कई मूड भी. अब बात भाजपा की आज दिल्ली में भाजपा अपनों के बीच की लड़ाई में है, विजय गोयल भाजपा को एक साथ लेकर चल पड़ें ये लगता नहीं है. दिल्ली भाजपा का एक बड़ा धड़ा तो मोदी के खिलाफ तक खड़ा दिखता है. कांग्रेस से ज्यादा अंदरूनी उठापटक भाजपा में है, अभी तक भाजपा ये तक नहीं बता पायी की उनका मुख्यमंत्री कौन होगा? किसकी अगुवाई में दिल्ली भाजपा मैदान में होगी ये भी जनता को मालूम नहीं है जबकि कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के पास घोषित मुख्यमंत्री के उम्मीदवार हैं. भाजपा ने मंदिर मुद्दा उठा कर अपने लिए सिरदर्द पैदा कर लिया क्योंकि भाजपा के वोट का एक बड़ा वर्ग उनकी इस नौटंकी से नाराज है और टूट रहा है.
अब कुछ बातें कहाँ कमजोर दिखती है कांग्रेस:-
१. केंद्र में सरकार की नाकामी दिल्ली में कांग्रेस को काफी भारी पड़ सकती है.
२. ताबड़तोड़ महंगाई और भ्रष्टाचार कांग्रेसी चूलें हिलाने के लिए काफी है.
३. शीला सरकार की मीडिया मुग़ल के प्रति सदाशयता भी उन्हें भारी पड़ने वाली है जहां बड़े समाचार पत्रों और चैनलों के प्रति उन्होंने सदाशयता बरती है लेकिन छोटे और मझोले समाचारपत्रों के पर कतर भी अपने लिए मुसीबत मोल ले ली है. क्योंकि ये छोटे समाचार पत्र राष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित करने की कुव्वत ना भी रखें तो क्षेत्रीय समीकरणों को प्रभावित करने की कुव्वत जरूर रखते हैं और इस बार ये कमर कस कर शीला सरकार को कई मुद्दों पर घेर सकते हैं.
४. युवा और छात्रों का एक बड़ा वर्ग जो अभी वोटर बना है के बीच कांग्रेसी काम्बिंग कहीं नहीं दिख रही है NSUI दिल्ली विश्विद्यालय के चुनावों के लिए तो वोट मांग रहा है लेकिन दिल्ली की कांग्रेस की उपलब्धियों और नीतियों को आगे नहीं ला पा रहा है. इसके विपरीत भाजपा के आई टी सेल की कसरत का परिणाम है की युवाओं में मोदी का जादू चढ़ रहा है. केजरीवाल टीम भी इस लड़ाई में कांग्रेस और भाजपा से दिल्ली में आगे दिख रही है और ये दोनों पार्टियों पर भारी पड़ने वाला है.
पिछले दो दिनों में खुद शीला दीक्षित 10 सीटिंग विधायकों को उनकी हालात पतली होने की चेतावनी दे चुकी हैं. अब देखना में दिल्ली के इस रण में सेनापतियों की जंग में कौन जीतेगा. वैसे ये खेल जीत से ज्यादा "फेल का खेल" है.
अब कुछ बातें कहाँ कमजोर दिखती है कांग्रेस:-
१. केंद्र में सरकार की नाकामी दिल्ली में कांग्रेस को काफी भारी पड़ सकती है.
२. ताबड़तोड़ महंगाई और भ्रष्टाचार कांग्रेसी चूलें हिलाने के लिए काफी है.
३. शीला सरकार की मीडिया मुग़ल के प्रति सदाशयता भी उन्हें भारी पड़ने वाली है जहां बड़े समाचार पत्रों और चैनलों के प्रति उन्होंने सदाशयता बरती है लेकिन छोटे और मझोले समाचारपत्रों के पर कतर भी अपने लिए मुसीबत मोल ले ली है. क्योंकि ये छोटे समाचार पत्र राष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित करने की कुव्वत ना भी रखें तो क्षेत्रीय समीकरणों को प्रभावित करने की कुव्वत जरूर रखते हैं और इस बार ये कमर कस कर शीला सरकार को कई मुद्दों पर घेर सकते हैं.
४. युवा और छात्रों का एक बड़ा वर्ग जो अभी वोटर बना है के बीच कांग्रेसी काम्बिंग कहीं नहीं दिख रही है NSUI दिल्ली विश्विद्यालय के चुनावों के लिए तो वोट मांग रहा है लेकिन दिल्ली की कांग्रेस की उपलब्धियों और नीतियों को आगे नहीं ला पा रहा है. इसके विपरीत भाजपा के आई टी सेल की कसरत का परिणाम है की युवाओं में मोदी का जादू चढ़ रहा है. केजरीवाल टीम भी इस लड़ाई में कांग्रेस और भाजपा से दिल्ली में आगे दिख रही है और ये दोनों पार्टियों पर भारी पड़ने वाला है.
पिछले दो दिनों में खुद शीला दीक्षित 10 सीटिंग विधायकों को उनकी हालात पतली होने की चेतावनी दे चुकी हैं. अब देखना में दिल्ली के इस रण में सेनापतियों की जंग में कौन जीतेगा. वैसे ये खेल जीत से ज्यादा "फेल का खेल" है.
रविवार, 16 जून 2013
ये मोदी-मोदी चिल्लायेंगे गठबंधन तोड़ के
तमाम उठापठकों के बाद जदयू और भाजपा का गठबंधन टूट ही गया और इस प्रकार एनडीए गठबंधन महत्वहीन ही हो गया. मोदी के नाम को आगे कर देने के बाद से ही देश की राजनीति में कई नये समीकरण दिखने लगें हैं. पहले आडवानी की नाराजगी फिर नीतीश कुमार का 17 साल पुराना गठबंधन तोड़ने का फैसला. ममता बनर्जी का तीसरे मोर्चे की तैयारी करना. इन सब के बीच भारतीय राजनीति किसी बड़े उलटफेर का इन्तजार कर रही है. पहले बात मोदी को लेकर हो जाये, मोदी को बीजेपी के धड़े द्वारा विशेष हवा दी जा रही है. पिछले कुछ सालों में बीजेपी के सभी चुनावी मुद्दे पिट चुके हैं उसकी हिंदुत्व की छवि तार-तार हुयी है. ऐसे में भाजपा के पास मोदी ही तुरूप का ऐसा पत्ता है जिस पर दाँव खेला जा सकता है और भाजपा इसी दाँव को लगा भी रही है लेकिन एक राजनैतिक समीक्षक की हैसियत से देखें तो गुजरात के बाहर मोदी का जादू नहीं चल रहा है. लगभग सात दशकों के लोकतांत्रिक इतिहास में देश की सत्ता किसी कट्टरपंथी को नहीं सौपीं गयी है. यही कारण भी है की देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था फली-फूली है. मोदी को गुजरात के परिपेक्ष्य में देखें तो एक विकास पुरूष से ज्यादा उनकी छवि कट्टरपंथी के रूप में दिखी है.
अपने विरोधियों को ठिकाने लगाने से लेकर जनता के बीच में इस सन्देश को पहुचाने में भी मोदी सफल रहें हैं की मोदी गुजरात की जरूरत हैं अगर मोदी नहीं रहेंगे तो गुजरात में हिन्दू बेमौत मारा जाएगा. लेकिन अपने सियासी फायदे के लिए बजरंगी और कोदनानी को फांसी की सिफारिश करने से भी मोदी को गुरेज नहीं दिखता है, भाड़ में जाए हिन्दू वाली तर्ज में हिन्दू नेताओं को फांसी की मांग करने वाले मोदी को कुछ लोग हिन्दू धर्म के लिए मसीहा के रूप में स्थापित करने की कोशिश में हैं. आडवानी को जिस तरह मोदी ने चित्त किया उससे ये सन्देश ही गया की जो मोदी पूजा नहीं करेगा उसे या तो चुप कर दिया जाएगा या फिर ठिकाने लगाने से भी गुरेज नहीं किया जाएगा. भाजपा मोदी को लेकर जितनी उत्साहित दिख रही है, उसका कोई कारण नहीं दिखता है. कुछ लोगों के सोचने से कोई प्रधानमंत्री नहीं बन जाता है और भाजपा के समर्थक तो मोदी को प्रधानमंत्री बना चुके हैं उन्हें इतना सब्र नहीं की चुनावों का इन्तजार करें. वैसे भाजपा और उसके समर्थक कब किस के तारों को आसमान से जमीनों-जद कर दें कहना मुश्किल हैं. ये वह ही लोग हैं जो कभी आधी रोटी खायेंगें मंदिर वहीं बनायेंगें का नारा देते थे लेकिन सत्ता के बाद एक बार उस और झांका तक नहीं हाँ अटल जी ने पाकिस्तानी पार्टी खूब उडाई और पाकिस्तान ने कारगिल से मार की. अब देखना ये है की मोदी कब तक प्रधानमंत्री बने रहते हैं, चुनाव के बाद तो जनता का फैसला ही मानना पडेगा तब तक मोदी हमारे प्रधानमंत्री.
अपने विरोधियों को ठिकाने लगाने से लेकर जनता के बीच में इस सन्देश को पहुचाने में भी मोदी सफल रहें हैं की मोदी गुजरात की जरूरत हैं अगर मोदी नहीं रहेंगे तो गुजरात में हिन्दू बेमौत मारा जाएगा. लेकिन अपने सियासी फायदे के लिए बजरंगी और कोदनानी को फांसी की सिफारिश करने से भी मोदी को गुरेज नहीं दिखता है, भाड़ में जाए हिन्दू वाली तर्ज में हिन्दू नेताओं को फांसी की मांग करने वाले मोदी को कुछ लोग हिन्दू धर्म के लिए मसीहा के रूप में स्थापित करने की कोशिश में हैं. आडवानी को जिस तरह मोदी ने चित्त किया उससे ये सन्देश ही गया की जो मोदी पूजा नहीं करेगा उसे या तो चुप कर दिया जाएगा या फिर ठिकाने लगाने से भी गुरेज नहीं किया जाएगा. भाजपा मोदी को लेकर जितनी उत्साहित दिख रही है, उसका कोई कारण नहीं दिखता है. कुछ लोगों के सोचने से कोई प्रधानमंत्री नहीं बन जाता है और भाजपा के समर्थक तो मोदी को प्रधानमंत्री बना चुके हैं उन्हें इतना सब्र नहीं की चुनावों का इन्तजार करें. वैसे भाजपा और उसके समर्थक कब किस के तारों को आसमान से जमीनों-जद कर दें कहना मुश्किल हैं. ये वह ही लोग हैं जो कभी आधी रोटी खायेंगें मंदिर वहीं बनायेंगें का नारा देते थे लेकिन सत्ता के बाद एक बार उस और झांका तक नहीं हाँ अटल जी ने पाकिस्तानी पार्टी खूब उडाई और पाकिस्तान ने कारगिल से मार की. अब देखना ये है की मोदी कब तक प्रधानमंत्री बने रहते हैं, चुनाव के बाद तो जनता का फैसला ही मानना पडेगा तब तक मोदी हमारे प्रधानमंत्री.
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