अमेरिका में किये गये एक शोध के अनुसार एक पुरुष के पिता बनने के बाद उसमें यौन उत्तेजना और आक्रामकता बढ़ाने वाले हार्मोन टेस्टोस्टेरोन में कमी आने लगती है. पाँच साल तक चले शोध में ये नतीजे सामने आए हैं. नॉर्थवेस्ट युनिवर्सिटी टीम के शोधकर्ताओं का कहना है कि पिता बनने के बाद पुरुष पारिवारिक हो जाते है, साथ ही उनका मानसिक भटकाव भी ख़त्म हो जाता है. टेस्टोस्टेरोन ही वो हार्मोन है जो न सिर्फ़ पुरूषों में काम भावना बढ़ाता है और उन्हें सहवास के लायक भी बनाता है. नेशनल ऐकेडमी ऑफ साइंस ने इस शोध के लिए 624 युवा पुरुषों पर परीक्षण किये. इन पर पिता बनने से पहले और पिता बनने के बाद दोनों ही स्थितियों का विश्लेषण किया गया. इसमें पता चला कि जैसे ही ये पिता बने इनके टेस्टोस्टेरोन हार्मोन के स्तर में गिरावट आ गई. इनमें भी विशेष रूप से उन पुरुषों में इस हार्मोन का स्तर ज़्यादा कम पाया गया जिनके पास एक महीने से कम उम्र का या नवजात शिशु था. सोसोइटी फॉर एन्डोक्रॉनोलॉजी के प्रोफ़ेसर एशले ग्रॉसमैन का कहना है कि इस शोध से पुरुषों के यौन व्यवहार और पिता होने के नाते शिशु की देखभाल के व्यवहार में अंतर पता चलता है. पहले में अधिक और दूसरे में कम टेस्टोस्टेरोन हार्मोन की ज़रूरत पड़ती है. फिलीपीन्स में मुख्य शोधकर्ता क्रिस्टोफर कुज़वा कहते हैं कि पितृत्व भाव और नवजात शिशु मनोवैज्ञानिक, शारीरिक और भावनात्मक लगाव की मांग करता है और इसी के चलते पुरुष का शरीर इन माँगों के अनुरूप ख़ुद को ढाल लेता है. शोधकर्ताओं का ये भी मानना है कि टेस्टोस्टेरोन का कम स्तर संभवत: पुरूषों की गंभीर बीमारियों के ख़तरे से भी रक्षा करता है. इसीलिए शादीशुदा पुरुष व पिता की सेहत हमउम्र युवकों की अपेक्षा बेहतर होती है.
कौन बनता है खबर? कौन होता ख़बरों के केंद्र में? क्या बिकती हैं खबरें? घोटाले बनाए भी जातें हैं? ख़बरों का सच, ख़बरों का झूठ, इनसाईट स्टोरी के आईने में. आप बताएं कहाँ क्या हो रहा है? कैरियर, स्वास्थ्य, विज्ञान, फिल्म ....... और बहुत कुछ आपके लिए.
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बुधवार, 14 सितंबर 2011
मंगलवार, 13 सितंबर 2011
पीठ के दर्द का होगा इलाज
वैज्ञानिकों ने अब उस जीन की पहचान कर ली है जिसके कारण निरंतर पीठ में दर्द महसूस होता है. उनका कहना है कि अब पीठ दर्द से निजात पाने के लिए दवाएँ बनाई जा सकती हैं, जो लगातार होने वाले पीठ-दर्द का समाधान कर सकती हैं. 'साइंस' में छपे केंब्रिज विश्वविद्यालय के शोध के मुताबिक शोधकर्ताओं ने चूहों में दर्द के प्रति संवेदनशील नसों से एचसीएन-2 जीन को निकाल दिया गया. शोधकर्ताओं के अनुसार इससे ये संभावना पैदा हो गई है कि ऐसी नई दवाओं को विकसित किया जाए जो एचसीएन-2 जीन में बनने वाली प्रोटीन को बंद कर दे क्योंकि उसी से निरंतर उठने वाला दर्द नियंत्रित होता है. ये तो पहले से पता था कि एचसीएन-2 जीन से दर्द के प्रति संवेदनशील नसों के अंत में दर्द उठता है. लेकिन अब तक ये नहीं पता था कि एचसीएन-2 का दर्द नियंत्रित करने में क्या भूमिका है. इस शोध के लिए वैज्ञानिकों ने चूहों में दर्द के प्रति संवेदनशील नसों से एचसीएन-2 जीन को हटाया. फिर उन्होंने उन नसों की कोशिकाओं में बिजली के झटके दिए ताकि ये पता चल सके कि एचसीएन-2 हटाने से क्या बदलाव आए हैं. इसके बाद उन जीन संशोधित चूहों का अध्ययन किया और ये देखा कि बजली की झटका लगने से चूहे कितनी गति से पीछे हटते हैं. इससे उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि एचसीएन-2 जीन निकाल देने से नसों के ज़रिए होने वाला दर्द ख़त्म हो जाता है.लेकिन ये भी पाया गया कि इस जीन को निकालने से आम तीखे दर्द पर कोई असर नहीं होता - यानी वो दर्द जो आपको ग़लती से जीभ काटने पर होता है, उस पर कोई असर नहीं होता.इस अध्ययन का नेतृत्व करने वाले प्रोफ़ेसर पीटर मैक्कनौटन का कहना है, "जो लोग नसों के कारण दर्द से पीड़ित होते हैं, उन्हें दवाओं के अभाव के कारण कोई राहत नहीं मिलती है. हमारे अध्ययन से ये पता चला है कि यदि दवाओं के इस्तेमाल से एचसीएन-2 जीन को ब्लॉक किया जाए यानी रोका जाए तो दर्द निवारण संभव है. "उनका ये भी कहना था कि रोचक बात यह है कि एचसीएन-2 को ब्लॉक करने से नसों का दर्द ख़त्म होता है लेकिन आम दर्द का एहसास ख़त्म नहीं होता जिससे किसी भी दुर्घटना होने के स्थिति में व्यक्ति को उसका एहसास हो जाता है.
(इनसाईट स्टोरी मेडिकल टीम)
शनिवार, 27 अगस्त 2011
हीरे जैसा ग्रह
इस ब्रह्मांड में ना जाने कितने कितने रहस्य छिपे हैं, रोज नए-नए रहस्यों से पर्दा उठने के साथ ब्रह्मांड की गुत्थियां और उलझती जा रहीं हैं. अभी वैज्ञानिकों ने हीरे से बने एक ग्रह को खोज निकाला है. आकशगंगा में हमारे सौर मंडल से थोड़ा ही दूर एक चमकता ग्रह मिला है जिसके बारे में वैज्ञानिक ये मान रहें है कि ये कार्बन के अणुओं के काफी पास आ जाने के कारण भारी दवाब से हीरे में बदल गया है, जहां इसका आकार तो जुपिटर से छोटा बताया जा रहा है, लेकिन द्रव्यमान उससे कही ज्यादा होने की संभावना है. अभी इस ग्रह का नामकरण नहीं किया गया है.
वैज्ञानिक इस पर आक्सीजन और कार्बन गैसों के अस्तित्व को मान रहें हैं, लेकिन हाइड्रोजन जैसे हल्के अणुओं का पाया जाना संदिग्ध माना जा रहा है, पृथ्वी से चार हजार प्रकाश वर्ष की दूरी पर स्थित है. इसकी उत्पत्ति एक तारे से मानी जा रही है, जो टूट कर नष्ट हो गया और ये ग्रह अस्तित्व में आया होगा. काफी दवाब के कारण ही कार्बोन परमाणु हीरे के रूप में संघनित हो गये होंगे, इसी कारण इसका घनत्व अभी तक पाए गए सभी सौर मंडल के ग्रहों और ब्रह्मांडीय पिंडों से ज्यादा है. साइंस नाम के अंतर्राष्ट्रीय जर्नल में ये जानकारिया दी गयी हैं जिसे २५ अगस्त २०११ को आनलाइन प्रकाशित किया गया है.
(इनसाईट स्टोरी टीम)
पढिये विज्ञान के और सच और अजूबे: उलटा चलने वाला एक ग्रह
बुधवार, 24 अगस्त 2011
दूर की बीबी, लम्बे बच्चे
लम्बे बच्चे चाहिए तो शादी कहीं दूर से करें अभी पोलैंड के वैज्ञानिकों ने एक शोध के बाद ये निष्कर्ष निकाला है कि अगर पति पत्नी एक ही शहर या क्षेत्र के रहने वाले होंगे तो उनके बच्चों के नाटे होने की संभावना ज्यादा होगी, 2675 लड़कों और 2603 लड़कियों पर शोध करने के बाद ये वैज्ञानिक इस नतीजे पर पहुचें हैं. इसका कारण एक क्षेत्र विशेष के लोगों में पायी जाने वाली जेनेटिक समानता है. जिसके कारण बच्चों में भी माँ और पिता के प्रभावी लक्षण दिखतें हैं. इसमें इन लडके लड़कियों से उनके माता पिता के आर्थिक स्तर के बारे में भी पूछा गया था, इसमें पाया गया जिन लोगों की परवरिश अच्छी तरह हुयी थी उनके बच्चे ज्यादा स्वस्थ और लम्बे हैं. इसके अतिरिक्त समाज और भौगोलिक परिस्थितियों को भी संतान में पाए जाने वाले गुणों के लिए जिम्मेदार माना जा सकता है.
(आशुतोष पाण्डेय)
साथ ही पढ़ें:
मंगलवार, 23 अगस्त 2011
माँ का पोषण बच्चे का जीवन
शिशु का जन्म के समय का वजन उसके भावी स्वास्थ्य और रोग प्रतिरोधी क्षमता को निर्धारित करता है, ये मानना है प्रोफ़ेसर डेविड बार्कर का. उनके अनुसार गर्भ में पल रहे शिशु का पोषण माँ के रोजमर्रा के भोजन से नहीं बल्कि माँ के शरीर में संचित भोजन से होता है और बच्चे का स्वास्थ्य माँ के जीवन भर हुए पोषण पर निर्भर करता है. शिशु का शरीर माँ के द्वारा लिए गये भोजन के प्रति भी निश्चित प्रतिक्रिया करता है और उससे प्रभावित भी होता है. जन्म के समय शिशु का वजन गर्भावस्था और उससे पूर्व माँ को मिले पोषण पर निर्भर करता है.
भारत के कई गावों में जहां लोग काफी सक्रिय थे और खानपान में पूर्ण शाकाहारी थे भी मधुमेह से ग्रसित पाए गए हैं, ये बात चौकाने वाली थी, लेकिन प्रोफ़ेसर बार्कर के शोध ने इस गुत्थी को काफी हद तक सुलझाने में मदद की है. दरअसल इन गाँव में माँओं को मिलने वाला पोषण काफी निचले दर्जे का होता है और यही कई रोगों और कम प्रतिरोधी क्षमताओं से किसी इंसान को जीवन भर जूझने के लिए मजबूर करता है.
(इनसाईट स्टोरी टीम )
भारत के कई गावों में जहां लोग काफी सक्रिय थे और खानपान में पूर्ण शाकाहारी थे भी मधुमेह से ग्रसित पाए गए हैं, ये बात चौकाने वाली थी, लेकिन प्रोफ़ेसर बार्कर के शोध ने इस गुत्थी को काफी हद तक सुलझाने में मदद की है. दरअसल इन गाँव में माँओं को मिलने वाला पोषण काफी निचले दर्जे का होता है और यही कई रोगों और कम प्रतिरोधी क्षमताओं से किसी इंसान को जीवन भर जूझने के लिए मजबूर करता है.
(इनसाईट स्टोरी टीम )
सोमवार, 22 अगस्त 2011
सेक्स एक बड़ी फंतासी है
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| सेक्स फंतासी या हकीकत |
सेक्स फंतासी या हकीकत.
सेक्स को लेकर हमारे समाज में कई भ्रांतियां हैं, जहां एक और सेक्स को आवश्यकता माना जाता है वहीं दूसरी ओर इसे हवस से जोड़ कर देखा जाता है. इसी कारण देश में बलात्कार और यौन दुरूपयोग के मामले तेजी से बढ़ रहें हैं. टीनएजर्स में सेक्स को लेकर बढती उत्कंठा का परिणाम ही है कि युवाओं के बीच विवाह पूर्व शारीरिक संबंधों में तेजी से इजाफा हो रहा है. लिव इन रिलेशनसिप को भी सामाजिक मान्यता मिलती दिख रही है. अभी हमने १५० युवाओं से जब लिव रिलेशनसिप के बारे में पूछा था तो ७२ फीसदी से ज्यादा इसे बुराई नहीं मानते हैं. फिर भी सेक्स को लेकर समाज में खुला ध्रुवीकरण दिखता है? समाज का एक बड़ा वर्ग आज भी सेक्स या शारीरिक संबंधों की बातों पर त्योरियां चढा लेता है. ऐसा क्यों इसका जवाब किसी के पास नहीं है? जहां ओशो जैसे विचारक सम्भोग से समाधि की बात कर रहें हैं वहीं कुछ लोग सेक्स को मनोविज्ञान से जोड़कर देखतें हैं, शरीर और दिल के साथ इसे दिमागी कसरत के साथ भी जोड़ कर देखा जाता है. आज भी हमारे समाज में सेक्स एक बड़ी फंतासी है.(इनसाईट स्टोरी रिसर्च टीम)
यूँ न खाएं एस्प्रिन

स्कॉटलैंड में किए गए एक शोध से संकेत मिले हैं कि मधुमेह से पीड़ित लोगों को दिल के दौरे से बचने के लिए नियमित रूप से ऐस्प्रिन का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। ब्रिटिश मेडिकल जर्नल की रिपोर्ट के मुताबिक 1300 ऐसे वयस्कों ने ऐस्प्रिन का नियमित रूप से सेवन किया जिनमें हृदय रोग के कोई लक्षण नहीं थे। उन्हें इससे कोई फ़ायदा नहीं हुआ। यह अनुसंधान उन विभिन्न दिशा-निर्देशों के विपरीत हैं जिनमें दिल के दौरों से बचने के लिए ऐस्प्रिन के इस्तेमाल पर ज़ोर दिया जाता है। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है स्वास्थ्य संबंधित ख़तरे झेल रहे कई अन्य ऐसे मरीज़ हैं जिन्हें इसकी ज़रूरत हो सकती है। नवीनतम अध्ययन के मुताबिक जिन लोगों को दिल का दौर पड़ चुका हो या फिर जो हृदय रोग से ग्रस्त हों, उनमें ऐस्प्रिन के इस्तेमाल से भविष्य में होने वाले ख़तरों में लगभग 25 प्रतिशत कटौती होती है।
लेकिन 40 साल से ज़्यादा उम्र वाले मधुमेह से पीड़ित लोगों पर हुए ताज़ा शोध में सात साल की अवधि में ऐस्प्रिन के सेवन करने वाले और उसका सेवन न करने वाले लोगों में दिल के दौरे के संबंध में कोई फ़र्क नहीं पड़ा। अध्ययन दल की प्रमुख प्रोफ़ेसर जिल बेल्च का कहना है कि पेट में रक्त स्त्राव की शिकायत के साथ अस्पताल पहुँचने वाले अधिकतर लोग ऐस्प्रिन सेवन के शिकार होते हैं। उन्होंने कहा, ''शुरूआती स्तर पर बचाव के लिए इसके इस्तेमाल पर हमें दोबारा विचार करने की ज़रूरत है।"
इंपीरियल कॉलेज लंदन के एक विशेषज्ञ पीटर सेवर का मानना है कि यह अध्ययन 'बेहद महत्वपूर्ण' है.
लेकिन 40 साल से ज़्यादा उम्र वाले मधुमेह से पीड़ित लोगों पर हुए ताज़ा शोध में सात साल की अवधि में ऐस्प्रिन के सेवन करने वाले और उसका सेवन न करने वाले लोगों में दिल के दौरे के संबंध में कोई फ़र्क नहीं पड़ा। अध्ययन दल की प्रमुख प्रोफ़ेसर जिल बेल्च का कहना है कि पेट में रक्त स्त्राव की शिकायत के साथ अस्पताल पहुँचने वाले अधिकतर लोग ऐस्प्रिन सेवन के शिकार होते हैं। उन्होंने कहा, ''शुरूआती स्तर पर बचाव के लिए इसके इस्तेमाल पर हमें दोबारा विचार करने की ज़रूरत है।"
इंपीरियल कॉलेज लंदन के एक विशेषज्ञ पीटर सेवर का मानना है कि यह अध्ययन 'बेहद महत्वपूर्ण' है.
उन्होंने कहा, ''हज़ारों लोग दुकानों से ऐस्प्रिन ख़रीदते हैं। मैं उन मरीज़ों से हमेशा कहता हूँ कि ऐसा न करें। '' इस सब के बावजूद रॉयल कॉलेज के प्रोफ़ेसर स्टीव फील्ड का कहना है यह अध्ययन मौजूदा-दिशा निर्देशों को बदलने के लिए महत्वपूर्ण है। इनसाईट स्टोरी की टीम ने जब मधुमेह के मरीजों से बात की तो उन्होंने इस प्रकार की किसी जानकारी से इनकार किया। इनसाईट स्टोरी ने ५५० मधुमेह रोगियों से बात की जो नियमित योग करतें हैं और एक शोध रिपोर्ट दिनांक २० जुलाय को पेश की. शोध के अनुसार मधुमेह की रोकथाम योग के द्वारा सम्भव है। मधुमेह के साथ आने वाली तमाम बिमारियों का इलाज भी योग के माध्यम से हो सकता है। ३६ फीसदी लोगों का मानना है कि प्रतिदिन आधे से एक घंटा तक योग करने वाले व्यक्ति को इंसुलिन की कम मात्रा या बिलकुल जरूरत नहीं होती है. लगातार तीन महीने तक आधे घंटा नियमित योग करने वाले लोगों में ६०% का मानना है की वे लोग कई बिमारियों से निजात पा चुके हैं।
(आशुतोष पाण्डेय)
रविवार, 21 अगस्त 2011
आरएसएस इस गांधी को भी बर्बाद कर देगा
जनलोकपाल को लेकर अनशन में बैठे अन्ना हजारे ने आज प्रधानमंत्री पर आरोप लगाया कि वो घूसखोरों के दवाब में हैं, इसलिए जनलोकपाल विधेयक लाने में डर रहें हैं, अन्ना की ये टिप्पणी काफी आश्चर्यचकित करने वाली है, शायद अपने पीछे आये जन सैलाब को अन्ना अपना राजशाही का तमगा समझ रहें हैं, इसलिए कुछ भी बोल रहें हैं. प्रधानमंत्री के ऊपर लगातार अशोभनीय टिप्पणी कर अन्ना नेताओं वाला खेल ही खेल रहें हैं. इस देश में जो चाहे प्रधानमत्री बन जाए ये नहीं होता है, यहाँ जनता अपनी सरकार चुनती है. क्या अन्ना के साथ जुड़े सभी लोग दूध के धुले हैं, जो पार्टियाँ या दल आज अन्ना की जय कर रहें हैं क्या वो सब पवित्र हैं? क्या अन्ना इस देश की संसद से भी ऊपर हो गए हैं. न संसद की गरिमा कि चिंता, न न्यायपालिका की स्वतंत्रता की चिंता पता नहीं अन्ना सद्दाम बनना चाह रहें हैं या फिर हिटलर, कि इस देश को सिर्फ लोकपाल चलाएगा. अन्ना को अनशन करना है करें लेकिन जनता को गुमराह ना करें, जैसे रामदेव ने कालेधन को लेकर हल्ला किया और जब खुद काले धन को विदेश भेजने के आरोप लगे तो फिर योग शिविर शुरू कर दिए. किरन बेदी ने कहा है अन्ना अनशन नहीं अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल करेंगे. मतलब जब तक मन आये बैठे फिर उठ लिए. इस आड़ में ये लोग देश को कमजोर कर रहें हैं, सारा देश और सरकार इसमें उलझेगी और विदेशी ताकतें इसका फायदा उठाएंगी. अगर ऐसे हालातों को रोकने के लिए सिर्फ आपातकाल ही अंतिम चारा बचता है तो सरकार क्या करे? लेकिन लोकतंत्र में जो भी हो उसकी सीमाओं में हो उसके उल्लंघन पर सजा हो. सरकार क्यूं तब्बजो दे रही है अन्ना और रामदेव को समझ नहीं आ रहा है, लोकसभा भंग करे और चुनाव करवा ले. सारा सच सामने आ जाएगा. जब इंदिरा ने आपातकाल लगाया था तो क्या कहा जा रहा था कि अब इंदिरा सिर्फ जेल में रहेगी, लेकिन फिर इंदिरा सत्ता में आयीं और लोकतंत्र के इतिहास में दुनिया की सबसे चर्चित और ताकतवर प्रधानमंत्रियों में गिनी जाती हैं. इसलिए अन्ना ब्लैकमेलिंग छोड़ जनता की अदालत में आयें और अन्ना टीम को चुनाव में खड़ा कर दें दो ढोल की पोल खुल जायेगी, आज आर एस एस के संरक्षण में बैठे अन्ना की टीम चुनाव के मैदान में आयेगी तो आरएसएस इस गांधी को भी बर्बाद कर देगा.
(आशुतोष पाण्डेय)
शुक्रवार, 22 जुलाई 2011
सभ्य समाज का सच
हल्द्वानी एक सेक्स रैकेट के खुलासे ने सभ्य समाज का नग्न रूप प्रस्तुत किया है. पिछले कुछ सालों में हल्द्वानी की फिजा इस कदर बिगड़ी है की ये अपराध नगरी के रूप में जाने जानी लगी है. भू माफियाओं और रेत माफियाओं के लिए मशहूर हल्द्वानी अब अंडरवर्ल्ड के कार्यवाही और काल गर्ल सप्लाई केन्द्रों के रूप में विकसित हो रही है. ये एक नया शगल नहीं है, दरअसल ये सिलसिला कई सालों से चल रहा है, कालगर्ल सप्लाई का और आश्चर्यजनक रूप से इसमें पत्रकारों और पुलिस की भूमिका भी इस कृत्य को और शर्मनाक बनाती है. हल्द्वानी के मुखानी कालोनी में पकडे गए सेक्स रैकेट जिसमें हल्द्वानी के अतिरिक्त दिल्ली और रामनगर की लडकियां भी शामिल हैं इस कड़ी का एक नया शगूफा है, पिछले कुछ सालों से हल्द्वानी में सेक्स रैकेट खूब पनप रहा है, इसमें अधिकतर मध्यवर्गीय परिवारों से सबंधित महिलायें हैं, बाकायदा दलालों के जरिये सुनियोजित नेटवर्क के जरिये इस धंधे को किया जा रहा है, इस बार पकड़ी गयी स्कैंडल सरगना बसन्ती बिष्ट पहले भी अपनी बेटी के साथ जेल जा चुकी है, शानदार एसी और सभी सुविधाओं से लैस हल्द्वानी की पाश कालोनी में रहने वाली बसन्ती ने आरोप लगाया है की एक स्थानीय पत्रकार और पुलिस अधिकारी को वो बाकायदा पैसा देती रहीं हैं... हल्द्वानी के पत्रकारों पर ऐसे आरोप पहले भी कई बार लग चुके हैं, लेकिन कभी कोई नाम सार्वजनिक नहीं किया जाता है, आम आदमी की पोल खोलने वाले मीडिया का रूख ही ऐसा हो तो क्या किया जाय? असल में मीडिया भी इस बारे में ईमानदारी से काम नहीं कर रहा है. जहां सेक्स रैकेट की संचालिका का नाम तो सार्वजनिक कर दिया लेकिन पकड़ी गयी लड़कियों का नाम सार्वजनिक नहीं किया जाता है और नहीं इससे जुड़े ग्राहकों का नाम पता किसी को मालूम पड़ता है और लचर क़ानून के चलते जल्द ही सब आजाद हो जाते हैं. वैसे तो छोटी छोटी बातों पर सड़कों में आने वाली जनता भी इनका मूक समर्थन करती दिखती हैं. तभी तो कई बार पकडे जाने के बाद भी इनका काम बदस्तूर जारी रहता है और सच तो यह है की इन्हें एक पहचान मिल जाती है.
(इनसाईट स्टोरी रोमिंग संवाददाता)
सोमवार, 20 जून 2011
इक्कीस वीं सदी का अंध विश्वास
२१वीं सदी और अंधविश्वास एक और माडर्न होने का दावा वहीं दूसरी ओर अंधविश्वासों की गिरफ्त. हम कहाँ हैं ये सवाल एक यक्ष प्रश्न है, आज हम ऐसे ही एक अंधविश्वास से आपको दो चार करवा रहें हैं, उत्तराखंड में एक देव पूजन की विधि है "जागर" यह जागरण का ही एक रूप है जिसमें देवी देवताओं का आवाह्न किया जाता था, किसी भी शुभ अवसर पर इष्ट देव या ग्राम देव को पूजने की एक प्रथा थी, इसका उल्लेख कहीं न कहीं वैदिक साहित्य और अन्य अभिलेखों में मिलता है. लम्बे समय तक इसका स्वरुप इसी प्रकार का बना रहा लेकिन समय के साथ इसके रूप में परिवर्तन किया हुआ और इसे कई अंधविश्वासों के साथ जोड़ दिया गया, पूजा के साथ बलि और अन्य तमाम विधानों को जोड़ कर इसे पेट भरने और लोगों को भरमाने का जरिया बना दिया गया, आप आज उत्तराखंड के गाँव या कस्बों में ये खुले आम देख सकतें हैं की किस प्रकार कुछ लोग लोगों को भ्रमित कर अपना उल्लू सीधा कर रहें हैं. ये लोग चावल देख भूत काल की ५ पीढी से पहले की ऐसी घटनाएँ बताते हैं, जिन के बारे में इस पीढी को कुछ भी पता नही होता है, अधिकतर ये घटना किसी स्त्री के साथ हुए अन्याय से जुडी होती हैं. पांच पीढी या उससे पहले की घटनाओ को इतने सही तरीके के साथ प्रस्तुत किया जाता है की आम आदमी इस पर अनायास ही विश्वास कर लेता है, इसके बाद एक सिलसिला शुरू होता है पूजा पाठ और बलि का, इसमें "अहंकार पूजन", "रोष पूजन", "मृत आत्माओं का अवतार", "उनकी तृप्ति", मृत और अतृप्त आत्माओं की मंदिर बना स्थापना तक करवा दी जाती है. अक्सर देखा गया है की कोई परिवार एक बार इस में फंस जाय तो उसका निकलना मुश्किल ही होता है और आगे फंसता ही जाता है. एक बार पूजा करवाने के बाद फिर कह दिया जाता है की पूजा में गड़बड़ हो गयी है, इन गड़बड़ियों की बानगी देखिये जैसे पूजा में काले मुर्गे की जगह सफ़ेद मुर्गा इस्तेमाल होना था, या फिर किसी के मन में कोई खोट था, या फिर पूजा जहां देनी थी, वहाँ नहीं दी गयी. लेकिन समाज इस जंजाल में इतनी बुरी तरह फंसा है की वो कोई सवाल पूछता ही नहीं है, जब पूजा करवाई जा रही थी तो आपके कहे अनुसार किया था तो गलत कैसे हो गया? अब ज़रा आपको इन पूजाओं के सभी चरणों के बारे में बताएं सबसे पहले किसी चावल देखने वाले (जिसे पुछार या पुछयार कहतें हैं) के पास चावल लेकर जाना होता है, इसके बाद चावल देखकर उक्त व्यक्ति कोई भूत काल की कहानी सुनाता है जैसे आपकी पांच या सात पीढी पहले की कोई स्त्री की आत्मा भटक रही है जिसके साथ आपके पूर्वजों ने अन्याय किया था .इस पर विश्वास करना आसान भी हो जाता है क्योंकि कुछ समय पहले तक यहाँ बहु-विवाह प्रथा के स्पष्ट प्रमाण मिलते हैं. इसके बाद ये पुछ्यार करार रखने को कहते हैं और बताते हैं की ६ महीनों में इसकी पूजा करवानी होगी, छः माह के भीतर जागर लगानी होती है इस जागर में एक नाचने वाले और एक हुडका (उत्तराखंड का एक डमरू जैसा वाद्य) बजाने वाला (डंगरिया) आकर जागर लगाता है, इस प्रकार नाचने वाले व्यक्ति के शरीर में देवता का अवतार होता है और वो बताता है की किसी स्त्री के साथ जमीन, जायजाद, नपुंसकता, अंतिम संस्कार ना करने या फिर दूसरी शादी करने के कारण जो अन्याय हुआ है उसी की बद दुआ के कारण उक्त स्त्री प्रेत रूप में भटक रही है यदि इसका इलाज नहीं किया गया तो परिवार के ऊपर विनाश का पहाड़ टूट जाएगा. फिर परिवार के लोग इसका निवारण पूछते हैं तो सभी को एक ही निवारण बताया जाता है जैसे, वो हरिद्वार जाकर इसका क्रिया कर्म करें फिर घर लौट कर जागर लगायें, और पूजा में इस आत्मा की तृप्ति के लिए बकरे की बलि देने को कहा जाता है, इसके बाद एक साल के अन्दर अन्य कई पूजा करवाने को कहा जाता है, एक बार की इस पूजा का खर्च लगभग १० से ५० हजार तक आ जाता है. इतना सब करने के बाद कहा जाता है पिछली पूजा में कोई विधान गलत करवा दिया गया था, फिर से पूजा करवानी पड़ेगी. इस प्रकार ये अंत हीन सिलसिला चलता ही रहता है. इस प्रकार कई परिवार बर्बाद हो गए हैं, और कुछ लोगों का धंधा चल निकला है और सभ्यता और आधुनिकता का दावा करने वाला नवयुवा भी इसकी गिरफ्त में है, असल में उसे अनिष्ट की आशंका से इतना डरा दिया जाता है की वो अपना सब कुछ लुटाने को तैयार हो जाता है, जब हमने लोगों से उनके विचार जानना चाहे तो जो जवाब मिले वो लाजवाब थे, हमारा सवाल था की कैसे मान लेतें हैं कि ये सब सच है जवाब सुनिए कई चावल देखने वालों ने एक ही बात बतायी की किसी महिला के साथ हमारे पूर्वजों ने अन्याय किया था (वास्तव में सभी चावल देखने वाले एक ही बात बताते हैं, आप खुद इनके पास जाकर देख लें). दूसरा सवाल था कि ये पूजा गलत कैसे हुयी और उक्त आत्मा तृप्त क्यों नहीं हुयी? इसका भी उत्तर करीब करीब सामान मिला पूजा के किसी विधान को नही किया गया, या जैसा करना था वैसा नहीं हुआ. अब क्या करेंगे? इसका जवाब मिलता है फिर पूजा करनी है पिछली बार से इस बार बड़ी होगी. बलि की बात पर भी वो लोग अडिग दिखते हैं. लेकिन जब ये पूछा जाता है कि किसी की जान लेकर कैसे आप अपना भला कर लेंगें इस का कोई जवाब किसी के पास नहीं होता है. अब क्या इस समाज को सभ्य कहा जा सकता है. हम आत्मा या उसके अस्तित्व पर कोई बहस नहीं छेड़ना चाहतें हैं. आज वैज्ञानिक भी इसके स्वरुप को मान रहें हैं और सापेक्षिता के सिदधांत को देखें तो इनका अस्तित्व नकारा नहीं जा सकता है, दुनिया की पुरातन संस्कृति से लेकर आज का विज्ञान भी इसे जब स्वीकार कर रहा है तो इसके लिए कसौटी क्या हो ये सवाल अहम् हैं और दूसरा सवाल इस प्रकार लोगों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ का है. अभी एक आत्मा की शांति के लिए ना जाने कितने जीवों की बलि दी जायेगी. क्या ये हो सकता है की एक जान लेकर कोई आत्मा शांत हो जाय? ये प्रश्न हम अपने सभी समाज के लिए छोड़ रहें हैं.
(आशुतोष पाण्डेय और इनसाईट स्टोरी टीम )
शनिवार, 11 जून 2011
एक नया विवाद और कांग्रेस
रामदेव से ट्रस्ट का हिसाब किताब मागने वाली कांग्रेस अब खुद एक विवाद में फंस गयी है, ताजा ख़बरों के मुताबिक़ प्रधानमंत्री की चंडीगढ़ की संपत्ति की कीमत आधी से भी कम आंकी गयी है, आज जब प्रधानमंत्री की सम्पत्ति का ब्योरा सार्वजनिक किया गया तो उस पर ये नया विवाद खडा हो गया और प्रधानमंत्री कार्यालय ने इस पर सफाई भी पेश कर डाली की ये चार साल पुरानी कीमत बताई गयी है, लेकिन ये बात हजम नहीं हो रही है की जिस ब्योरे को आज जारी किया गया है उसमें चार साल पुरानी कीमत बताने का औचित्य क्या है? मनमोहन सिंह के पास चंडीगढ़ में एक घर है, जिसकी कीमत को लेकर ये नया विवाद खड़ा हुआ है, वैसे ही भ्रष्टाचार के मुद्दे पर बदनाम इस सरकार की मुसीबत बढ़ने को ये काफी है, अब चाहे प्रधानमंत्री कार्यालय कोई भी सफाई दे लेकिन जवाबदेही तो सरकार और खुद प्रधानमत्री की भी बंटी है, क्योंकि ये मामला खुद उनकी अपनी संपत्ति को लेकर है. देखना ये है की अब सरकार और प्रधानमंत्री का क्या रूख होता है?(आशुतोष पाण्डेय)
बी.पी.एल पेंशन के लिए उम्र ६५ से ६० की
नई दिल्ली. सरकार ने गरीबी रेखा के नीचे (बीपीएल) रह रहे बुजुर्गो के लिए पेंशन की आयु सीमा 65 वर्ष से घटाकर 60 वर्ष कर दी है। इससे बीपीएल श्रेणी के 60 से 64 वर्ष की आयु वाले 72.32 लाख लोग लाभान्वित होंगे। ‘इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वृद्ध पेंशन योजना’ के तहत लाभान्वितों की आयु सीमा कम करने का यह निर्णय केंद्रीय कैबिनेट ने लिया है। इसके अलावा प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में हुई बैठक में 80 वर्ष और उससे अधिक आयु वाले वृद्धों को प्राप्त होने वाली पेंशन की दर में भी बढ़ोतरी करने को मंजूरी दी गई है। अब 80 वर्ष या उससे अधिक आयु वाले बुजुर्गो को 500 रुपए प्रतिमाह दिए जाएंगे। पहले तक यह दर 200 रुपए मासिक थी। इस फैसले से इस आयुवर्ग वाले 26.49 लाख लोग लाभान्वित होंगे। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट की बैठक में यह निर्णय किया गया। सूचना एवं प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी ने बताया कि यह परिवर्तन इस साल 1 अप्रैल से लागू होंगे। 2,770 करोड़ अतिरिक्त खर्च : बीपीएल श्रेणी के 169 लाख लोग 65 वर्ष से अधिक आयु के हैं जिन्हें पेंशन का लाभ मिल रहा है। 60 से 64 वर्ष तक की आयु वाले लोगों को वृद्धावस्था पेंशन योजना के तहत प्रतिमाह 200 रुपए पेंशन देने से सरकार पर 1,736 करोड़ रुपए का बोझ आएगा। 80 वर्ष से अधिक आयु वालों को 500 रुपए पेंशन से सरकारी खजाने से 953 करोड़ खर्च होंगे। इस तरह संशोधित योजना से सरकार पर 2,770 करोड़ रुपए का अतिरिक्त भार पड़ेगा।
(इनसाईट स्टोरी के लिए, सुषमा पाण्डेय)
रामदेव विवाद: कांग्रेस दोफाड़
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बाबा रामदेव के मुद्दे पर कांग्रेस और सरकार के बीच पहले दिन से ही दोफाड़ की स्थिति बनी हुई है। कांग्रेस के मुखपत्र ‘कांग्रेस संदेश’ के ताजे अंक में सरकार के उन चार मंत्रियों की तीखी आलोचना छपी है, जो बाबा रामदेव से मिलने एयरपोर्ट गए थे। इस पत्रिका को वितरण केन्द्रों से ही वापस मगा लिया गया है. संदेश के संपादकीय में चार मंत्रियों के हवाई अड्डे पर जाने के सवाल पर प्रश्नचिंह लगाया गया है. संपादकीय में कहा गया कि हालांकि यह सरकार की जिम्मेदारी है कि वह सिविल सोसायटी की मांगों पर सहानुभूति से विचार करे लेकिन चुनी हुई सरकार की पूरी मर्यादा रखी जाना चाहिए और सरकार के अधिकारों का हनन नहीं होना चाहिए। पत्रिका के संपादक अनिल शास्त्री हैं। जैसे ही यह मामला वरिष्ठ नेताओं की जानकारी में आया, इसका वितरण रोक दिया गया है। नेताओं ने संपादक अनिल शास्त्री के साथ बैठक भी की, लेकिन उसमें कोई निर्णय नहीं लिया जा सका। अनिल शास्त्री भारत के पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय लालबहादुर शास्त्री के बेटे हैं। हालांकि बाबा रामदेव के मुद्दे पर पार्टी नेता दिग्विजय सिंह शुरु से ही रामदेव विरोधी लाइन पर चल रहे हैं, लेकिन सरकार ने उन्हें अनशन न करने से मनाने की पूरी कोशिश की। चार मंत्री एयरपोर्ट पर गए और उनसे बातचीत की। हाल ही में दिग्विजय सिंह ने फिर एयरपोर्ट गए सभी मंत्रियों पर अंगुली उठाई थी. यह संभवतः पहली बार है कि करीब एक दशक से प्रकाशित हो रही इस पत्रिका में छपे लेख या संपादकीय के कारण विवाद हुआ है. माना जा रहा है कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को न तो मंत्रियों के एयरपोर्ट पर जाकर बाबा रामदेव से मिलने की जानकारी थी और न ही रामलीला मैदान पर हुई पुलिसिया कार्रवाई पर उन्हें विश्वास में लिया गया। वे इस मुद्दे पर मंत्रियों के साथ हुई बैठक में अपनी नाराजगी व्यक्त कर चुकी हैं।
(इनसाईट स्टोरी नई दिल्ली)
शनिवार, 4 जून 2011
एक नया शगूफा है रामदेव का अनशन
भ्रष्टाचार, भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचार .... ये इस देश की नियति बन गया लगता है... सब इसकी अंगीठी पर अपने हाथ सेक रहें हैं, कोई लोकपाल की मांग करता है तो दूसरा ये पूछ लेता है की क्या गारंटी है की लोकपाल ईमानदार ही होगा? कोई काले धन को लेकर आंदोलित है. ख़ास बात है की ये सब जनता का साथ मांग रहें हैं. अन्ना हजारे के अनशन के बाद लोकपाल पर एक समिति का गठन तो कर दिया गया लेकिन गठन के समय से ही ये एक विवाद का कारण बन गयी थी, पहले भूषण परिवार को लेकर फिर प्रधानमंत्री और उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों को इस के प्रभाव से बाहर रखने के कारण खासा विवाद है, सरकार और अन्ना के समर्थकों के बीच एक मल्ल युद्ध जारी है, ६ जून को इसका जिन्न बाहर आने वाला है, खैर आज का बड़ा मुद्दा किसी समय योग गुरु रहे रामदेव बाबा का आज ४ जून से शुरू होने वाला अनशन है, रामदेव की मांगें तो बहुत हैं लेकिन सबसे बड़ी मांग में शामिल है, विदेशी बैंकों में रखा काला धन की वापसी. सरकार के मंत्री तो बाकायदा एयर पोर्ट पर भी रामदेव की वन्दना कर चुकें हैं, पर रामदेव हैं की मान ही नहीं रहें हैं, अब एक करोड़ लोगों के साथ अनशन में बैठने की चेतावनी दें, उन्होंने सरकार की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं. अब एक नया मोड़ देखें कल केन्द्रीय मंत्रियों के साथ हुयी एक बैठक का हवाला देते हुए रामदेव ने कहा था "काफी मुद्दों पर सहमति हो गयी है है, सरकार काले धन को राष्ट्रीय संपत्ति घोषित करने पर राजी तो हो गयी है, लेकिन ऐसा कोई विधेयक लाने के लिए कोई समय सीमा तय नहीं है". रामदेव जी ये क्या आपका ये बयान आपके समझ में आया, सरकार क्या करेगी क्या नहीं ये तो बाद में पता चलेगा लेकिन एक सवाल ये काला धन कहाँ है, कितना है, इस पर भी आप के पास सिवाय कयास के कुछ नहीं है, और क्या ये इतना आसान होगा, जिन देशों के बैंकों में ये पैसा है क्या वो इसे आसानी से वापस कर देंगे? और क्या अन्तर्राष्ट्रीय कानूनों में ये प्राविधान हैं? क्या दुनिया भर के पैसों को जमा करने वाले इसकी जानकारियाँ देकर अपनी साख गिरायेंगें ऐसा तो लगता नहीं हैं. हाँ सरकार इसके लिए प्रयास भर जरुर कर सकती है और करने भी चाहिए. दरअसल अगर सच कहा जाए, आम आदमी भी इस मुहिम में मात्र साथ भर देने को जुड़ा है. इस देश में कितने लोग हैं जो अपना असल टैक्स जमा करतें हैं, कितने हैं जो सरकारी सुविधाओं की धज्जियां नहीं उडातें हैं, कितने प्रतिशत लोग हैं जो अपराधियों को वोट नहीं देतें है, आज अगर ख़ास लोगों पर शिकंजा कसेगा तो उनका कानूनी पलटवार आम जनता पर ही होगा... फिर तो सब भ्रष्टाचारियों को सजा मिले जो ख़ास है आम हैं, जो संसद के चुने नुमायंदे हैं या फर्जी बी पी एल कार्ड बनवाने वाले तथाकथित गरीबी की रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाले लोग, मान लिया राजनेता अनैतिक हैं, तो जनता उन्हें वोट क्यों दे रही है? तमिलनाडु में जयललिता के दामन पर तमाम दाग रहें हैं, पश्चिमी बंगाल में ममता की ताजपोशी जो की अब तक की दुनिया की सबसे भ्रष्ट सरकार का हिस्सा है,को बहुमत क्या है? क्या रामदेव या अन्ना जनता की इस मंशा को नहीं जानतें हैं, इतने बड़े आन्दोलन खड़े करने की कुव्वत रखने वाले ये समाजसेवी (इस शब्द का इस्तेमाल करना चाहिए या नहीं? ) इतने मासूम तो नहीं हैं? पहले उन एक करोड़ की गारंटी दो बाबा जो आपके साथ अनशन में बैठे हैं, की वे सब ईमानदार हैं. अब भी कुछ बुद्धिजीवी अपनी फोटो खिचवाने जरुर जायेंगें, फिर अखबारों की कटिंग, टी वी बाइट्स सब का रिकार्ड रखेंगें. कुछ अन्ना के साथ चमके, कुछ बाबा के साथ भी चमक जायेंगें.... कुछ तो दो तीन दिन पहले से ही सुपर रिन की चमकार से सराबोर हैं, लेकिन ये मुआ भ्रष्टाचार बढ़ता ही जाएगा जब तक इस देश का आम आदमी ना सुधर जाए और वो ना सुधरने वाला. अगर वास्तव में इस देश से भ्रष्टाचार मिटाना है तो एक क़ानून बने की है व्यक्ति प्रतिदिन देश के लिए एक घंटे से तीन घंटा अनिवार्य शारिरीक, मानसिक योगदान करे इसमें आम से लेकर प्रधानमंत्री तक को शामिल किया जाय, हर व्यक्ति को आर्मी में सेवा करना अनिवार्य कर दिया जाय कितने समाज सेवी इसके लिए तैयार हैं? ये सवाल है उन लोगों से जो देश को अनशन, धरनों, जलूसों से अस्थिर कर रहें हैं. इतनी देर देश के विकास के लिए काम करो फिर देखो ६ माह में इस देश की तस्वीर और तकदीर दोनों बदल जायेगी.
(आशुतोष पाण्डेय)
शुक्रवार, 27 मई 2011
वो घिनौना चेहरा आपका ही ना हो:फर्जी प्रमाणपत्रों का सच
जहां इस देश के नेता घोटालों में व्यस्त हैं, वहीं आम आदमी भी कहीं पीछे नहीं है, टैक्स की चोरी से लेकर फर्जी प्रमाणपत्रों के जरिये सरकारी नौकरी पा लेने का खुला खेल भी देश में चल रहा है, अभी एक ताजा मामला उत्तराखंड के नैनीताल जिले का सामने आया है, यहाँ एक अध्यापक ने फर्जी प्रमाणपत्रों के जरिये पांच साल सरकारी नौकरी कर ली, अब किसी व्यक्ति के द्वारा सूचना के अधिकार अधिनियम के अंतर्गत सूचना मागने पर ये सच सामने आया है की उसकी एम. ए. और बी. एड. की मार्कशीट ही फर्जी थी जिसका कोई रिकार्ड सम्बंधित विश्वविद्यालय के पास था ही नहीं, ये तो वह मामला है जो पकड़ में आ गया, ऐसे हजारों मामले हर साल होतें हैं जिसमें एक संगठित माफिया काफी सधे तरीके से काम करता है, बाकायदा एजेंटों और आफिस बनाकर काम करने वाले इन माफियाओं के तार विभिन्न बोर्डों के अधिकारियों से लेकर राजनेताओं और पुलिस तक से जुड़ें रहतें हैं, ये माफिया भी दो तरह के हैं एक वो जो पूरे कायदे -कानूनों के अनुसार काम करतें हैं इनकी प्रवेश से लेकर परीक्षाफल आने तक की सारी जिम्मेवारी होती है, इनके पास नक़ल कराने और दुसरे छात्र को बिठा परीक्षा दिलाने तक की व्यस्था होती है. ये हाल किसी एक शहर या बोर्ड का नहीं है, सारे देश इस प्रकार के माफिया खुले आम अपनी बिसात बिछाए घूम रहें हैं, १० वीं से लेकर बी. एड तक कोई भी डिग्री या कोर्स हो ये करवा देतें हैं, इसके लिए ग्राहकों की कोई कमी भी नहीं होती है, दुसरे प्रकार का माफिया वो है जो फर्जी मार्कशीट खुद तैयार करता है और बेचता है इनके द्वारा दिए गए सभी प्रमाण पात्र नकली होतें हैं, फिर भी हजारों लोग हर साल इनकी सेवा लेतें हैं. इस प्रकार के माफिया बोर्ड के लोगो और मुहर की नक़ल कर फर्जी दस्तावेज तैयार करने में माहिर होतें हैं. समय समय पर इन लोगों की गिरफ्तारियां भी होती हैं लेकिन किसी पुख्ता क़ानून के ना होते ये जल्द ही बरी हो जातें या जमानत पर आ जातें हैं, सवाल ये नहीं है की ये इतना बड़ा फर्जीवाड़ा करते कैसे हैं असल सवाल तो ये है की आखिर इन्हें काम करवाने वाले मिलते कहाँ से हैं, अभी कुछ दिन पूर्व एक एयर लाइंस के पायलट के पास फर्जी लाइसेंस मिला था. इसके अतिरिक्त फर्जी डोमिसाइल, बी पी एल कार्ड बनाने और बनवाने वालों की कमी नहीं हैं, हर साल फर्जी डोमिसाइल के चलते सैकड़ों छात्रों का प्रवेश निरस्त हो जाता है. फर्जी डाक्टर, फर्जी इंजीनियर से लेकर फर्जी नेता सभी पाए जातें हैं इस दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में. आगे हम आपको सुनायेंगें कुछ दास्तान जिसके चलते आप देखेंगे इस दुनिया का घिनौना चेहरा, लेकिन ध्यान रहे कहीं हमारी अगली मुहिम आपकी दास्तान ना कह रही हो. वो घिनौना चेहरा आपका ही ना हो.
पड़ताल: (इनसाईट स्टोरी टीम)
आलेख: आशुतोष पाण्डेय
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