अमेरिका में किये गये एक शोध के अनुसार एक पुरुष के पिता बनने के बाद उसमें यौन उत्तेजना और आक्रामकता बढ़ाने वाले हार्मोन टेस्टोस्टेरोन में कमी आने लगती है. पाँच साल तक चले शोध में ये नतीजे सामने आए हैं. नॉर्थवेस्ट युनिवर्सिटी टीम के शोधकर्ताओं का कहना है कि पिता बनने के बाद पुरुष पारिवारिक हो जाते है, साथ ही उनका मानसिक भटकाव भी ख़त्म हो जाता है. टेस्टोस्टेरोन ही वो हार्मोन है जो न सिर्फ़ पुरूषों में काम भावना बढ़ाता है और उन्हें सहवास के लायक भी बनाता है. नेशनल ऐकेडमी ऑफ साइंस ने इस शोध के लिए 624 युवा पुरुषों पर परीक्षण किये. इन पर पिता बनने से पहले और पिता बनने के बाद दोनों ही स्थितियों का विश्लेषण किया गया. इसमें पता चला कि जैसे ही ये पिता बने इनके टेस्टोस्टेरोन हार्मोन के स्तर में गिरावट आ गई. इनमें भी विशेष रूप से उन पुरुषों में इस हार्मोन का स्तर ज़्यादा कम पाया गया जिनके पास एक महीने से कम उम्र का या नवजात शिशु था. सोसोइटी फॉर एन्डोक्रॉनोलॉजी के प्रोफ़ेसर एशले ग्रॉसमैन का कहना है कि इस शोध से पुरुषों के यौन व्यवहार और पिता होने के नाते शिशु की देखभाल के व्यवहार में अंतर पता चलता है. पहले में अधिक और दूसरे में कम टेस्टोस्टेरोन हार्मोन की ज़रूरत पड़ती है. फिलीपीन्स में मुख्य शोधकर्ता क्रिस्टोफर कुज़वा कहते हैं कि पितृत्व भाव और नवजात शिशु मनोवैज्ञानिक, शारीरिक और भावनात्मक लगाव की मांग करता है और इसी के चलते पुरुष का शरीर इन माँगों के अनुरूप ख़ुद को ढाल लेता है. शोधकर्ताओं का ये भी मानना है कि टेस्टोस्टेरोन का कम स्तर संभवत: पुरूषों की गंभीर बीमारियों के ख़तरे से भी रक्षा करता है. इसीलिए शादीशुदा पुरुष व पिता की सेहत हमउम्र युवकों की अपेक्षा बेहतर होती है.
कौन बनता है खबर? कौन होता ख़बरों के केंद्र में? क्या बिकती हैं खबरें? घोटाले बनाए भी जातें हैं? ख़बरों का सच, ख़बरों का झूठ, इनसाईट स्टोरी के आईने में. आप बताएं कहाँ क्या हो रहा है? कैरियर, स्वास्थ्य, विज्ञान, फिल्म ....... और बहुत कुछ आपके लिए.
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बुधवार, 14 सितंबर 2011
मंगलवार, 13 सितंबर 2011
पीठ के दर्द का होगा इलाज
वैज्ञानिकों ने अब उस जीन की पहचान कर ली है जिसके कारण निरंतर पीठ में दर्द महसूस होता है. उनका कहना है कि अब पीठ दर्द से निजात पाने के लिए दवाएँ बनाई जा सकती हैं, जो लगातार होने वाले पीठ-दर्द का समाधान कर सकती हैं. 'साइंस' में छपे केंब्रिज विश्वविद्यालय के शोध के मुताबिक शोधकर्ताओं ने चूहों में दर्द के प्रति संवेदनशील नसों से एचसीएन-2 जीन को निकाल दिया गया. शोधकर्ताओं के अनुसार इससे ये संभावना पैदा हो गई है कि ऐसी नई दवाओं को विकसित किया जाए जो एचसीएन-2 जीन में बनने वाली प्रोटीन को बंद कर दे क्योंकि उसी से निरंतर उठने वाला दर्द नियंत्रित होता है. ये तो पहले से पता था कि एचसीएन-2 जीन से दर्द के प्रति संवेदनशील नसों के अंत में दर्द उठता है. लेकिन अब तक ये नहीं पता था कि एचसीएन-2 का दर्द नियंत्रित करने में क्या भूमिका है. इस शोध के लिए वैज्ञानिकों ने चूहों में दर्द के प्रति संवेदनशील नसों से एचसीएन-2 जीन को हटाया. फिर उन्होंने उन नसों की कोशिकाओं में बिजली के झटके दिए ताकि ये पता चल सके कि एचसीएन-2 हटाने से क्या बदलाव आए हैं. इसके बाद उन जीन संशोधित चूहों का अध्ययन किया और ये देखा कि बजली की झटका लगने से चूहे कितनी गति से पीछे हटते हैं. इससे उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि एचसीएन-2 जीन निकाल देने से नसों के ज़रिए होने वाला दर्द ख़त्म हो जाता है.लेकिन ये भी पाया गया कि इस जीन को निकालने से आम तीखे दर्द पर कोई असर नहीं होता - यानी वो दर्द जो आपको ग़लती से जीभ काटने पर होता है, उस पर कोई असर नहीं होता.इस अध्ययन का नेतृत्व करने वाले प्रोफ़ेसर पीटर मैक्कनौटन का कहना है, "जो लोग नसों के कारण दर्द से पीड़ित होते हैं, उन्हें दवाओं के अभाव के कारण कोई राहत नहीं मिलती है. हमारे अध्ययन से ये पता चला है कि यदि दवाओं के इस्तेमाल से एचसीएन-2 जीन को ब्लॉक किया जाए यानी रोका जाए तो दर्द निवारण संभव है. "उनका ये भी कहना था कि रोचक बात यह है कि एचसीएन-2 को ब्लॉक करने से नसों का दर्द ख़त्म होता है लेकिन आम दर्द का एहसास ख़त्म नहीं होता जिससे किसी भी दुर्घटना होने के स्थिति में व्यक्ति को उसका एहसास हो जाता है.
(इनसाईट स्टोरी मेडिकल टीम)
बुधवार, 7 सितंबर 2011
फैक्ट्री में बनेंगे कृत्रिम अंग
अब वो दिन दूर नहीं जब मानव अंग फैक्ट्रियों में तैयार किये जायेंगें. इस हेतु वैज्ञानिक काफी प्रयास कर रहें हैं और अब इसमें सफलता भी मिलने लगी है. वैज्ञानिकों ने ऐसी तकनीक खोज निकाली है जिसमें बताया गया है कि मानव अंग बनाने के 20 तरीके हैं। वैज्ञानिकों ने अब तक ब्लैडर, यूरीथ्रा और श्वासनली बना कर मानव अंग बनाने की कल्पना को साकार किया है। इन बनाए गए कृत्रिम अंगों को मरीजों में लगाया जा चुका है। अब वैज्ञानिकों का दिल, किडनी, लिवर, पेन्क्रियाज (पाचक तंत्र) और थाइमस जैसे शरीर के सबसे जटिल अंगों को बनाने की कोशिश है। यदि इन अंगों को बनाने में सफलता प्राप्त हो जाती है तो लोगों की उम्र बढ़ाई जा सकती है और ट्रांसप्लांट होने में लगने वाले अधिक समय, और उपलब्धता की कमी से भी बचा जा सकता है। वैज्ञानिकों ने इस कायाकल्प कर देने वाली तकनीक की जानकारी कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में आयोजित होने वाली कांफ्रेंस में दी थी। आयोजक ऑब्रे डी ग्रे ने बताया कि चिकित्सा जगत में यह आने वाला नया युग होगा, जो बीमारियों और उम्र को रोक देगा।
(इनसाईट स्टोरी )
मंगलवार, 30 अगस्त 2011
अमेरिका ने ली कई जानें:काला चेहरा
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| अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा |
(आशुतोष पाण्डेय)
शनिवार, 27 अगस्त 2011
हीरे जैसा ग्रह
इस ब्रह्मांड में ना जाने कितने कितने रहस्य छिपे हैं, रोज नए-नए रहस्यों से पर्दा उठने के साथ ब्रह्मांड की गुत्थियां और उलझती जा रहीं हैं. अभी वैज्ञानिकों ने हीरे से बने एक ग्रह को खोज निकाला है. आकशगंगा में हमारे सौर मंडल से थोड़ा ही दूर एक चमकता ग्रह मिला है जिसके बारे में वैज्ञानिक ये मान रहें है कि ये कार्बन के अणुओं के काफी पास आ जाने के कारण भारी दवाब से हीरे में बदल गया है, जहां इसका आकार तो जुपिटर से छोटा बताया जा रहा है, लेकिन द्रव्यमान उससे कही ज्यादा होने की संभावना है. अभी इस ग्रह का नामकरण नहीं किया गया है.
वैज्ञानिक इस पर आक्सीजन और कार्बन गैसों के अस्तित्व को मान रहें हैं, लेकिन हाइड्रोजन जैसे हल्के अणुओं का पाया जाना संदिग्ध माना जा रहा है, पृथ्वी से चार हजार प्रकाश वर्ष की दूरी पर स्थित है. इसकी उत्पत्ति एक तारे से मानी जा रही है, जो टूट कर नष्ट हो गया और ये ग्रह अस्तित्व में आया होगा. काफी दवाब के कारण ही कार्बोन परमाणु हीरे के रूप में संघनित हो गये होंगे, इसी कारण इसका घनत्व अभी तक पाए गए सभी सौर मंडल के ग्रहों और ब्रह्मांडीय पिंडों से ज्यादा है. साइंस नाम के अंतर्राष्ट्रीय जर्नल में ये जानकारिया दी गयी हैं जिसे २५ अगस्त २०११ को आनलाइन प्रकाशित किया गया है.
(इनसाईट स्टोरी टीम)
पढिये विज्ञान के और सच और अजूबे: उलटा चलने वाला एक ग्रह
बुधवार, 24 अगस्त 2011
दूर की बीबी, लम्बे बच्चे
लम्बे बच्चे चाहिए तो शादी कहीं दूर से करें अभी पोलैंड के वैज्ञानिकों ने एक शोध के बाद ये निष्कर्ष निकाला है कि अगर पति पत्नी एक ही शहर या क्षेत्र के रहने वाले होंगे तो उनके बच्चों के नाटे होने की संभावना ज्यादा होगी, 2675 लड़कों और 2603 लड़कियों पर शोध करने के बाद ये वैज्ञानिक इस नतीजे पर पहुचें हैं. इसका कारण एक क्षेत्र विशेष के लोगों में पायी जाने वाली जेनेटिक समानता है. जिसके कारण बच्चों में भी माँ और पिता के प्रभावी लक्षण दिखतें हैं. इसमें इन लडके लड़कियों से उनके माता पिता के आर्थिक स्तर के बारे में भी पूछा गया था, इसमें पाया गया जिन लोगों की परवरिश अच्छी तरह हुयी थी उनके बच्चे ज्यादा स्वस्थ और लम्बे हैं. इसके अतिरिक्त समाज और भौगोलिक परिस्थितियों को भी संतान में पाए जाने वाले गुणों के लिए जिम्मेदार माना जा सकता है.
(आशुतोष पाण्डेय)
साथ ही पढ़ें:
मंगलवार, 23 अगस्त 2011
माँ का पोषण बच्चे का जीवन
शिशु का जन्म के समय का वजन उसके भावी स्वास्थ्य और रोग प्रतिरोधी क्षमता को निर्धारित करता है, ये मानना है प्रोफ़ेसर डेविड बार्कर का. उनके अनुसार गर्भ में पल रहे शिशु का पोषण माँ के रोजमर्रा के भोजन से नहीं बल्कि माँ के शरीर में संचित भोजन से होता है और बच्चे का स्वास्थ्य माँ के जीवन भर हुए पोषण पर निर्भर करता है. शिशु का शरीर माँ के द्वारा लिए गये भोजन के प्रति भी निश्चित प्रतिक्रिया करता है और उससे प्रभावित भी होता है. जन्म के समय शिशु का वजन गर्भावस्था और उससे पूर्व माँ को मिले पोषण पर निर्भर करता है.
भारत के कई गावों में जहां लोग काफी सक्रिय थे और खानपान में पूर्ण शाकाहारी थे भी मधुमेह से ग्रसित पाए गए हैं, ये बात चौकाने वाली थी, लेकिन प्रोफ़ेसर बार्कर के शोध ने इस गुत्थी को काफी हद तक सुलझाने में मदद की है. दरअसल इन गाँव में माँओं को मिलने वाला पोषण काफी निचले दर्जे का होता है और यही कई रोगों और कम प्रतिरोधी क्षमताओं से किसी इंसान को जीवन भर जूझने के लिए मजबूर करता है.
(इनसाईट स्टोरी टीम )
भारत के कई गावों में जहां लोग काफी सक्रिय थे और खानपान में पूर्ण शाकाहारी थे भी मधुमेह से ग्रसित पाए गए हैं, ये बात चौकाने वाली थी, लेकिन प्रोफ़ेसर बार्कर के शोध ने इस गुत्थी को काफी हद तक सुलझाने में मदद की है. दरअसल इन गाँव में माँओं को मिलने वाला पोषण काफी निचले दर्जे का होता है और यही कई रोगों और कम प्रतिरोधी क्षमताओं से किसी इंसान को जीवन भर जूझने के लिए मजबूर करता है.
(इनसाईट स्टोरी टीम )
सोमवार, 22 अगस्त 2011
यूँ न खाएं एस्प्रिन

स्कॉटलैंड में किए गए एक शोध से संकेत मिले हैं कि मधुमेह से पीड़ित लोगों को दिल के दौरे से बचने के लिए नियमित रूप से ऐस्प्रिन का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। ब्रिटिश मेडिकल जर्नल की रिपोर्ट के मुताबिक 1300 ऐसे वयस्कों ने ऐस्प्रिन का नियमित रूप से सेवन किया जिनमें हृदय रोग के कोई लक्षण नहीं थे। उन्हें इससे कोई फ़ायदा नहीं हुआ। यह अनुसंधान उन विभिन्न दिशा-निर्देशों के विपरीत हैं जिनमें दिल के दौरों से बचने के लिए ऐस्प्रिन के इस्तेमाल पर ज़ोर दिया जाता है। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है स्वास्थ्य संबंधित ख़तरे झेल रहे कई अन्य ऐसे मरीज़ हैं जिन्हें इसकी ज़रूरत हो सकती है। नवीनतम अध्ययन के मुताबिक जिन लोगों को दिल का दौर पड़ चुका हो या फिर जो हृदय रोग से ग्रस्त हों, उनमें ऐस्प्रिन के इस्तेमाल से भविष्य में होने वाले ख़तरों में लगभग 25 प्रतिशत कटौती होती है।
लेकिन 40 साल से ज़्यादा उम्र वाले मधुमेह से पीड़ित लोगों पर हुए ताज़ा शोध में सात साल की अवधि में ऐस्प्रिन के सेवन करने वाले और उसका सेवन न करने वाले लोगों में दिल के दौरे के संबंध में कोई फ़र्क नहीं पड़ा। अध्ययन दल की प्रमुख प्रोफ़ेसर जिल बेल्च का कहना है कि पेट में रक्त स्त्राव की शिकायत के साथ अस्पताल पहुँचने वाले अधिकतर लोग ऐस्प्रिन सेवन के शिकार होते हैं। उन्होंने कहा, ''शुरूआती स्तर पर बचाव के लिए इसके इस्तेमाल पर हमें दोबारा विचार करने की ज़रूरत है।"
इंपीरियल कॉलेज लंदन के एक विशेषज्ञ पीटर सेवर का मानना है कि यह अध्ययन 'बेहद महत्वपूर्ण' है.
लेकिन 40 साल से ज़्यादा उम्र वाले मधुमेह से पीड़ित लोगों पर हुए ताज़ा शोध में सात साल की अवधि में ऐस्प्रिन के सेवन करने वाले और उसका सेवन न करने वाले लोगों में दिल के दौरे के संबंध में कोई फ़र्क नहीं पड़ा। अध्ययन दल की प्रमुख प्रोफ़ेसर जिल बेल्च का कहना है कि पेट में रक्त स्त्राव की शिकायत के साथ अस्पताल पहुँचने वाले अधिकतर लोग ऐस्प्रिन सेवन के शिकार होते हैं। उन्होंने कहा, ''शुरूआती स्तर पर बचाव के लिए इसके इस्तेमाल पर हमें दोबारा विचार करने की ज़रूरत है।"
इंपीरियल कॉलेज लंदन के एक विशेषज्ञ पीटर सेवर का मानना है कि यह अध्ययन 'बेहद महत्वपूर्ण' है.
उन्होंने कहा, ''हज़ारों लोग दुकानों से ऐस्प्रिन ख़रीदते हैं। मैं उन मरीज़ों से हमेशा कहता हूँ कि ऐसा न करें। '' इस सब के बावजूद रॉयल कॉलेज के प्रोफ़ेसर स्टीव फील्ड का कहना है यह अध्ययन मौजूदा-दिशा निर्देशों को बदलने के लिए महत्वपूर्ण है। इनसाईट स्टोरी की टीम ने जब मधुमेह के मरीजों से बात की तो उन्होंने इस प्रकार की किसी जानकारी से इनकार किया। इनसाईट स्टोरी ने ५५० मधुमेह रोगियों से बात की जो नियमित योग करतें हैं और एक शोध रिपोर्ट दिनांक २० जुलाय को पेश की. शोध के अनुसार मधुमेह की रोकथाम योग के द्वारा सम्भव है। मधुमेह के साथ आने वाली तमाम बिमारियों का इलाज भी योग के माध्यम से हो सकता है। ३६ फीसदी लोगों का मानना है कि प्रतिदिन आधे से एक घंटा तक योग करने वाले व्यक्ति को इंसुलिन की कम मात्रा या बिलकुल जरूरत नहीं होती है. लगातार तीन महीने तक आधे घंटा नियमित योग करने वाले लोगों में ६०% का मानना है की वे लोग कई बिमारियों से निजात पा चुके हैं।
(आशुतोष पाण्डेय)
रविवार, 21 अगस्त 2011
आरएसएस इस गांधी को भी बर्बाद कर देगा
जनलोकपाल को लेकर अनशन में बैठे अन्ना हजारे ने आज प्रधानमंत्री पर आरोप लगाया कि वो घूसखोरों के दवाब में हैं, इसलिए जनलोकपाल विधेयक लाने में डर रहें हैं, अन्ना की ये टिप्पणी काफी आश्चर्यचकित करने वाली है, शायद अपने पीछे आये जन सैलाब को अन्ना अपना राजशाही का तमगा समझ रहें हैं, इसलिए कुछ भी बोल रहें हैं. प्रधानमंत्री के ऊपर लगातार अशोभनीय टिप्पणी कर अन्ना नेताओं वाला खेल ही खेल रहें हैं. इस देश में जो चाहे प्रधानमत्री बन जाए ये नहीं होता है, यहाँ जनता अपनी सरकार चुनती है. क्या अन्ना के साथ जुड़े सभी लोग दूध के धुले हैं, जो पार्टियाँ या दल आज अन्ना की जय कर रहें हैं क्या वो सब पवित्र हैं? क्या अन्ना इस देश की संसद से भी ऊपर हो गए हैं. न संसद की गरिमा कि चिंता, न न्यायपालिका की स्वतंत्रता की चिंता पता नहीं अन्ना सद्दाम बनना चाह रहें हैं या फिर हिटलर, कि इस देश को सिर्फ लोकपाल चलाएगा. अन्ना को अनशन करना है करें लेकिन जनता को गुमराह ना करें, जैसे रामदेव ने कालेधन को लेकर हल्ला किया और जब खुद काले धन को विदेश भेजने के आरोप लगे तो फिर योग शिविर शुरू कर दिए. किरन बेदी ने कहा है अन्ना अनशन नहीं अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल करेंगे. मतलब जब तक मन आये बैठे फिर उठ लिए. इस आड़ में ये लोग देश को कमजोर कर रहें हैं, सारा देश और सरकार इसमें उलझेगी और विदेशी ताकतें इसका फायदा उठाएंगी. अगर ऐसे हालातों को रोकने के लिए सिर्फ आपातकाल ही अंतिम चारा बचता है तो सरकार क्या करे? लेकिन लोकतंत्र में जो भी हो उसकी सीमाओं में हो उसके उल्लंघन पर सजा हो. सरकार क्यूं तब्बजो दे रही है अन्ना और रामदेव को समझ नहीं आ रहा है, लोकसभा भंग करे और चुनाव करवा ले. सारा सच सामने आ जाएगा. जब इंदिरा ने आपातकाल लगाया था तो क्या कहा जा रहा था कि अब इंदिरा सिर्फ जेल में रहेगी, लेकिन फिर इंदिरा सत्ता में आयीं और लोकतंत्र के इतिहास में दुनिया की सबसे चर्चित और ताकतवर प्रधानमंत्रियों में गिनी जाती हैं. इसलिए अन्ना ब्लैकमेलिंग छोड़ जनता की अदालत में आयें और अन्ना टीम को चुनाव में खड़ा कर दें दो ढोल की पोल खुल जायेगी, आज आर एस एस के संरक्षण में बैठे अन्ना की टीम चुनाव के मैदान में आयेगी तो आरएसएस इस गांधी को भी बर्बाद कर देगा.
(आशुतोष पाण्डेय)
बुधवार, 10 अगस्त 2011
राहुल बन गए प्रधानमंत्री?
सोनिया ने राहुल को पार्टी की कमान क्या सौंप दी की, उन्हें देश का प्रधानमंत्री प्रोजेक्ट कर दिया जाने लगा, सोमवार को एक समाचार चैनल ने कह दिया की देश में राहुल प्रधानमंत्री के लिएलोगों की पहली और अंतिम पसंद हैं, खूब हंसी आयी ये प्रहसन सुन. सुना है दिल्ली की कोई सेंटर फार द स्टडी आफ डेवलपिंग सोसाइटीज है जिसने ये सर्वे कराया है. उनके अनुसार ४२ फीसदी लोग चाहतें हैं की राहुल गांधी प्रधानमंत्री बनें. और आगे देखिये की ३४ फीसदी चाहते हैं की वो तुरंत प्रधानमंत्री बनें, वाह भाई वाह क्या सर्वे करा डाला? ये क्या बात हुयी राहुल जी दो दिन पार्टी की कमान तीसरे दिन प्रधानमंत्री का ख्वाव. वैसे मेरा कहा मान लो तो बन जाओ प्रधानमंत्री, चुनावों के बाद तो ये कौड़ी दूर की होगी. ये गौरव गाथा यहीं खत्म हो तो बताया जाय. इस सर्वे में २२ फीसदी लोग मनमोहन के साथ हैं. अजी काफी हैं २२ फीसदी तो बहुत है, जब अकेले सोनिया जी के वरदहस्त से दो बार प्रधानमंत्री बन गए तो इस बार तो २२ प्रतिशत साथ हैं, जय हो! कैग की रिपोर्ट का क्या काहे विपक्षी चिल्लाय रहें हैं, ज्यादा चिल्लाए तो हम एक और सर्वे करवा देंगें. अजी अपने योगेन्द्र जी हैं ना सर्वे स्पेलिस्ट ३९ हजार लोगों में ४२ फीसदी का साथ मिलने से जब राहुल बाबा को प्रधानमंत्री की कुर्सी दिलवा दें तो, दो-चार सौ लोगों से बात कर कैग की रिपोर्ट की भी... क्या कहें साहिब जहां ३९००० में पार्षद का चुनाव भी ना जीता जाय, योगेन्द्र जी राहुल को प्रधानमंत्री बना गए. मजा आ गया भाई, योगेन्द्र जी को मैं भी चाह रहा हूँ बुला लूं क्योंकि एक हजार वोट पर कम से विधायक तो बन ही जाउंगा. अगर उस पर राहुल जी हैं ही अपने, वो अपनी चाची के मामा के दोस्त के भतीजे के साले के पता नहीं क्या हैं? तुरंत प्रधानमंत्री बनाने वाले उनकी कृपा हो गयी तो, कोई कामनवेल्थ भले ही ना हों असली वैल्थ का इंतजाम तो हो ही जाएगा जैसे वढेरा जीजा का हो गया हमारा भी कुछ हो ही जाएगा. अगर ना भी हुआ तो भाई कम से अपना भी नाम भी सीबीआई वाले जान लेंगे. आज विधायक तो कल १० जनपथ तक भी, वैसे भी सोनिया अपनी ताई हुयी, अब कैसे ये मत पूछना जब कोई काम की बात पूछ ले तो हम कांग्रेस वालों को स्मृति भ्रम हो जाता है. अरे यार क्या पीछे पड़ गए, सारी सरकार अन्ना के पीछे है, और तुम भी ना हमारे पीछे. केंद्र मैं हुआ तो हल्ला, शीला जी राज्य में करें तो हल्ला. क्या लोगे चुप रहने का सुनो हम सरकारी लोकपाल बिल लाने वालें हैं, वहां तुम्हारा भी जुगाड़ करवा देंगें. कम से लोकपाल कार्यालय में कैंटीन का ठेका तुम्हारा रहा. और सुनना है, अरे छोडो हम कांग्रेसी हैं, हम नहीं बोलते, यहाँ बोलने का काम दिग्गु चाचा का है, ये दिग्गु कौन हुए भाई, अरे यार तभी तो आज तक प्रधानी का चुनाव भी न जीत पाए, कामन सेन्स ना ही है ना, कामन जनता वाला. दिग्गु माने अपने दिग्गी राजा, अब दिग्गी राजा कैसे हुए, युवराज ही राजा होंगें, अरे आप योगेन्द्र जी आ गये जी हाँ बस आप ही फोन लगा रहा था. अपना भी पपलू फिट करवा दो कम से कम १००० से बात कर, सर्वे कर ए मे ले तो बना दो वैसे हम खुद भी बहुत मैले इंसान हैं.
(आशुतोष पाण्डेय)
सोमवार, 1 अगस्त 2011
छात्रों को सिखाएं आधारभूत तथ्य
25 जुलाय 2011 को एजुकेशन मंत्रा ने सफलतापूर्वक 15 सालों का सफ़र पूरा कर लिया है. इस सफ़र में कई सफलताओं की कहानिया जुडी हैं, 2000 से ज्यादा विद्यार्थी 10 वीं और 12 वीं की परीक्षा में सफल हो चुके हैं. इसके अतिरिक्त 556 विद्यार्थी इस सत्र तक इंजीनियरिंग और मेडिकल में दाखिला ले चुके हैं. दिल्ली के जी. टी. बी. इन्क्लेव से शुरू ये सफ़र जिसे मात्र तीन छात्रों के साथ आरम्भ किया था. आज हजारों सफलताओं की कहानियों से जुड़ा है.एक स्वप्न के साथ आरम्भ ये संस्थान अभी अपने मुकाम से काफी दूर जरूर खडा है लेकिन मंजिल बिलकुल साफ़ दिखती है. हमारा उद्देश्य कोचिंग से पैसा कमाना मात्र नहीं रहा, हर एक को आत्मनिर्भर बना कर खुद पढ़ने और पढ़ने की तकनीक विकसित करना सिखाया है. हम शिक्षा को कोचिंग मुक्त बनाना चाहते हैं, पहली क्लास से ट्यूशन की जो प्रवृति देखी जा रही है वो काफी घातक है, हम बच्चे के विकास के बजाय विनाश के लिए कोच करें ये कहाँ तक ठीक है. छात्रों को विषय के आधारभूत तथ्यों (Fundamentals) की जानकारी ना ही स्कूलों में दी जाती है और ना ही कोचिंग सेंटरों पर. लेकिन हमने अभिनव प्रयोग किये हैं छात्रों के लिए Fundamentals को जानने के लिए कई तरीके विकसित किये हैं. आज एजुकेशन मंत्रा क्लास रूम, आनलाइन और पोस्टल कोचिंग के रूप में कुल प्रतिवर्ष १०० छात्रों का ही प्रवेश लेता है. हमारे पास उपलब्ध सीमित साधनों में इससे ज्यादा प्रवेश दे पाना अभी हमारे लिए संभव नहीं है. हम कमाई से तो समझौता कर सकतें हैं लेकिन गुणवत्ता से समझौता हो ही नहीं सकता है.
आप किसी भी प्रकार की जानकारी हमारी टीम से ले सकतें हैं: mail: mantraedu@hotmail.commobile: +91-7895365453 (Time 10:00 A.M-1:00 P.M & 7:00 P.M-9:00 P.M)
(सुषमा पाण्डेय)
Course Co-ordinator
Education Mantra
शनिवार, 19 जनवरी 2008
कंट्टरपंथ सार्क देशों में भी महिलाओं के लिए बड़ा खतरा
दुनिया भर में बढ़ रहा कंट्टरपंथ सार्क देशों में भी महिलाओं के लिए बड़ा खतरा बनकर उभर रहा है। खासकर बांग्लादेश, नेपाल, पाकिस्तान जैसे देशों में यह बड़ी समस्या के रूप में सामने है। लिहाजा दक्षिण एशिया क्षेत्रीय सहयोग संगठन [सार्क] के सभी देशों ने इसके खिलाफ लड़ने के लिए एक साझा नेटवर्क खड़ा करने का फैसला किया है।
महिला समानता और लैंगिक न्याय पर 1995 में बीजिंग में हुए सम्मेलन की अगली कड़ी के रूप में सार्क देशों की महिलाओं के विभिन्न मुद्दों पर छठे दक्षिण एशिया मंत्रिस्तरीय सम्मेलन में शनिवार को सर्वसम्मति से यह फैसला किया गया। यूनीफेम के दक्षिण एशिया सबरीजनल आफिस और भारत के महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की ओर से आयोजित इस सम्मेलन में सार्क देशों के सभी सदस्यों ने 'इंडिया फारवर्ड मूविंग स्ट्रेटजीज जेंडर इक्वलिटी-2008' घोषणापत्र पर हस्ताक्षर भी किए हैं। जिसके तहत सार्क देशों की महिलाओं के लिए बनी कार्ययोजना पर अगले दो वर्र्षो में अमली कार्रवाई की जाएगी।
सम्मेलन के बाद यूनीफेम की क्षेत्रीय प्रमुख चांदनी जोशी ने कहा कि सार्क देशों की महिलाओं के लिए भी कंट्टरपंथ बड़े खतरे के रूप में उभरा है। उन्हें भी इसका बड़ा खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। बांग्लादेश, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, नेपाल व दक्षिण एशिया के दूसरे देश भी इससे अछूते नहीं हैं। इसलिए सार्क देशों के बीच साझा नेटवर्क बनाने का निर्णय लिया गया है, जो खास तौर से महिलाओं को उनके अधिकार सुनिश्चित कराएगा। इसके साथ ही समानता के अधिकार के मद्देनजर सार्क देशों की महिलाओं की नागरिकता के अधिकार पर उनके बच्चों व पतियों को भी नागरिकता दिए जाने पर सहमति बनी है। सम्मेलन में यह सवाल इसलिए उठा कि अभी सिर्फ पति की नागरिकता के आधार पर उसकी पत्नी व बच्चों को नागरिकता मिलने की बात होती है। सम्मेलन में सार्क देशों के बीच जेंडर डाटाबेस भी बनाने पर भी सहमति बनी है।
इसके अलावा महिलाओं के साथ भेदभाव को खत्म करने के लिए कानून बनाने, घरेलू हिंसा रोकने के कानून को प्रभावी बनाने, महिलाओं-बच्चों की तस्करी रोकने व प्रभावितों के पुनर्वास, संपत्तिव भूमि को नियंत्रित करने का अधिकार देने, नीतिगत मामलों व निर्णयों में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने जैसे कई मामलों में भी सभी सदस्य देशों के बीच सहमति बनी है। सम्मेलन में भारत, बांग्लादेश, भूटान, पाकिस्तान, नेपाल, श्रीलंका, अफगानिस्तान और मालद्वीव के प्रतिनिधियों ने भाग लिया।
महिला समानता और लैंगिक न्याय पर 1995 में बीजिंग में हुए सम्मेलन की अगली कड़ी के रूप में सार्क देशों की महिलाओं के विभिन्न मुद्दों पर छठे दक्षिण एशिया मंत्रिस्तरीय सम्मेलन में शनिवार को सर्वसम्मति से यह फैसला किया गया। यूनीफेम के दक्षिण एशिया सबरीजनल आफिस और भारत के महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की ओर से आयोजित इस सम्मेलन में सार्क देशों के सभी सदस्यों ने 'इंडिया फारवर्ड मूविंग स्ट्रेटजीज जेंडर इक्वलिटी-2008' घोषणापत्र पर हस्ताक्षर भी किए हैं। जिसके तहत सार्क देशों की महिलाओं के लिए बनी कार्ययोजना पर अगले दो वर्र्षो में अमली कार्रवाई की जाएगी।
सम्मेलन के बाद यूनीफेम की क्षेत्रीय प्रमुख चांदनी जोशी ने कहा कि सार्क देशों की महिलाओं के लिए भी कंट्टरपंथ बड़े खतरे के रूप में उभरा है। उन्हें भी इसका बड़ा खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। बांग्लादेश, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, नेपाल व दक्षिण एशिया के दूसरे देश भी इससे अछूते नहीं हैं। इसलिए सार्क देशों के बीच साझा नेटवर्क बनाने का निर्णय लिया गया है, जो खास तौर से महिलाओं को उनके अधिकार सुनिश्चित कराएगा। इसके साथ ही समानता के अधिकार के मद्देनजर सार्क देशों की महिलाओं की नागरिकता के अधिकार पर उनके बच्चों व पतियों को भी नागरिकता दिए जाने पर सहमति बनी है। सम्मेलन में यह सवाल इसलिए उठा कि अभी सिर्फ पति की नागरिकता के आधार पर उसकी पत्नी व बच्चों को नागरिकता मिलने की बात होती है। सम्मेलन में सार्क देशों के बीच जेंडर डाटाबेस भी बनाने पर भी सहमति बनी है।
इसके अलावा महिलाओं के साथ भेदभाव को खत्म करने के लिए कानून बनाने, घरेलू हिंसा रोकने के कानून को प्रभावी बनाने, महिलाओं-बच्चों की तस्करी रोकने व प्रभावितों के पुनर्वास, संपत्तिव भूमि को नियंत्रित करने का अधिकार देने, नीतिगत मामलों व निर्णयों में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने जैसे कई मामलों में भी सभी सदस्य देशों के बीच सहमति बनी है। सम्मेलन में भारत, बांग्लादेश, भूटान, पाकिस्तान, नेपाल, श्रीलंका, अफगानिस्तान और मालद्वीव के प्रतिनिधियों ने भाग लिया।
प्रस्तुति: आशुतोष पाण्डेय
सोमवार, 24 दिसंबर 2007
अमेरिका की मदद से भारत में आतंक
अमेरिकी अखबार 'न्यूयॉर्क टाइम्स' के मुताबिक पाकिस्तान को दी जाने वाली अमरीकी सैन्य मदद में से एक बड़ा भारत के खिलाफ़ हथियार बनाने पर खर्च किया जाता है. समाचार पत्र ने अधिकारियों के हवाले से कहा है कि इसमें से ज़्यादातर पैसा इस्लामिक चरमपंथियों से लड़ने के बजाय भारत के खिलाफ़ हथियार बनाने वाली व्यवस्था पर खर्च किया गया है. अमरीका पाकिस्तान को 'आतंकवाद के खिलाफ़' अभियान चलाने पर खर्च किए गए धन की प्रतिपूर्ति करता है. पिछले दिनों अमरीकी कांग्रेस ने पाकिस्तान को सैन्य मदद देने पर कुछ हद तक रोक लगाने के लिए अपना मत दिया था। उसने ऐसा पाकिस्तानी राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ को प्रजातांत्रिक अधिकार बनाए रखने के लिए दबाव डालने के लिए किया था। न्यूयॉर्क टाइम्स ने बिना नाम लिए अमरीका में प्रबंधन और सेना के कुछ अधिकारियों के हवाले से बताया कि वहां इस पैसे पर बहुत कम नियंत्रण है। अधिकारियों के हवाले से बताया गया है कि अमरीका ने पाकिस्तान को इस मद में खर्च किए गए ईंधन, हथियारों और दूसरे खर्चों के लिए बढ़ी हुई दर पर लाखों डॉलर दिए हैं. समाचार पत्र में इस कार्यक्रम की समीक्षा करने वाले अमरीकी सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, "मैं निजी तौर पर मानता हूँ कि इसमें महँगाई को अतिशयोक्तिपूर्ण यानि बढ़ा चढ़ा कर बताया गया है. " उन्होंने कहा, "तब मैने अमरीका में इसे उठाया और कहा कि हमें उन्हें इस तरह पैसा नहीं देना चाहिए था." यह पाँच अरब डॉलर उस कार्यक्रम के ज़रिए दिए गए हैं जिसमें पाकिस्तान को आतंकवाद से निबटने के लिए सैन्य अभियान चलाये जाने पर हुए खर्च की भरपाई की जाती है। पत्र के अनुसार पाकिस्तानी अधिकारियों ने अमरीका पर आरोप लगाया है कि उन्होंने देश के उन्नत हेलीकॉप्टर, वायुयान, रेडियो और रात में देखने वाले उन उपकरणों को बेचने से इंकार कर दिया जिनकी उन्हें ज़रूरत है. पाकिस्तान सेना के प्रवक्ता मेजर जनरल वाहिद अरशद ने समाचार पत्र को बताया कि इन उपकरणों के ऐसे बहुत से पहलू हैं जिन्हें हम हासिल करने के इच्छुक हैं. उन्होंने बताया कि इसके अलावा और भी बहुत सी ऐसी बातें हैं जिन्होंने चरमपंथियों के खिलाफ़ जारी इस जंग को नुकसान पहुँचाया है।
(आशुतोष पाण्डेय)
(आशुतोष पाण्डेय)
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