(ये आलेख हमारी वन्दना जी से हुयी बातचीत और उनकी कविताओं की समीक्षा पर आधारित है. जल्द ही ही हम मूल साक्षात्कार को प्रकाशित करेंगें .)
आलेख: आशुतोष पाण्डेय
कौन बनता है खबर? कौन होता ख़बरों के केंद्र में? क्या बिकती हैं खबरें? घोटाले बनाए भी जातें हैं? ख़बरों का सच, ख़बरों का झूठ, इनसाईट स्टोरी के आईने में. आप बताएं कहाँ क्या हो रहा है? कैरियर, स्वास्थ्य, विज्ञान, फिल्म ....... और बहुत कुछ आपके लिए.
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| फिरोज अब्दुल रशीद खान |
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| पी. चिदम्बरम |

हाल में कुछ राज्यों में हुए उपचुनावों ने देश की राजनीतिक तस्वीर को किसी हद तक साफ़ कर दिया है, देश की जनता भ्रष्टाचार को मुख्य मुद्दा मानने को तैयार नहीं है, कांग्रेस समर्थित तृणमूल कांग्रेस का पश्चिमी बंगाल में अभूतपूर्व बहुमत और जयललिता की तमिलनाडु में वापसी इस दावे को सच ठहराती है, और कही ना कही आज अन्ना और रामदेव के भ्रष्टाचार की हवा निकाल रहें हैं. अब बड़ा सवाल यह है की अन्ना और रामदेव सही हैं या फिर जनता? क्या हुआ भ्रष्टाचार के खिलाफ खादी जनता एकाएक भ्रष्टाचारियों की समर्थक कैसे बन गयी, दरअसल सच कहें तो ये पब्लिक है सब जानती है.... आज सेलिब्रेटी बनने का शौक अन्ना या नेताओं को है उतना ही आम जनता को भी है.... इस लिए अन्ना को समर्थन देने वाले भी, ज़रा बताएं वोट किसको दिया.
जनता ने जो किया उसका अपना मापदंड है, अगर वह गुजरात में नरेन्द्र मोदी को जिताती है तो, वही बुद्धदेव अपनी सीट भी नहीं बचा पते हैं, जनता का वोट लोकपाल या विदेश नीति को नहीं मिलता उसका वोट तो खालिश विकास को जाता है, वो भले मोदी करें या नितीश कुमार. अब बात करें उत्तराखंड की जहां इस समय बीजेपी की सबसे अलोकप्रिय सरकार काबिज है, बीजेपी सत्ता की कमान खंडूरी से छीन कविवर निशंक को दे चुकी है लेकिन यहाँ तो अंधेर नगरी चौपट राजा वाली बात हुई, राज्य का विकास तो छोडिये, विनाश करने में कसार नहीं छोडी है इस सरकार ने, ये दावा हमारा नहीं हैं, ये जनता की ही आवाज है, जिसमें वो पूछ रही है कितने बेरोजगारों को नौकरी मिली, वो आपकी एक योजना थी अनाज मिल रहा था... कहाँ लागू है वो, एक यूनिट पर २५० ग्राम चीनी, बिजली की १० घंटे कटौती, निरंकुश नौकरशाही, ये सब क्या है? ये नतीजे हैं हमारी इनसाईट स्टोरी टीम के द्वारा किये गए एक रेंडम सेम्पल सर्वे का, जिसके सभी नतीजे एक दो दिन में आपको मिल जायेंगे, जनता ने जहा पूरे कार्यकाल के लिए पूर्व कांग्रेस सरकार को १० में से ६.८ दिए हैं वहीं वर्तमान भाजपा सरकार को मात्र ३.७ अंक दिए हैं. ![]() |
| (रोना आता है... ये हालत देख) |
मुरली मनोहर जोशी ने रिपोर्ट को लोक सभा अध्यक्ष के पास भिजवा दिया है और अध्यक्ष से ये आग्रह किया है कि इस रिपोर्ट को मंज़ूर करें. रिपोर्ट लोक सभा अध्यक्ष के पास भिजवाने के बाद जोशी ने पत्रकारों से बात करते हुए आरोप लगाया कि समिति में कांग्रेस सदस्यों ने केंद्रीय मंत्रियों के दिशा निर्देशों पर काम करते हुए हंगामा किया. उन्होंने कहा, "समिति में रिपोर्ट का विरोध करने वाले यूपीए से संबंधित संसद सदस्यों के पास पर्चियाँ आ रही थीं." जोशी ने चिदम्बरम के बयानों से जुड़े एक प्रश्न के उत्तर में उन्ही की और संकेत कर कहा, "जो मंत्रिगण समिति के सदस्यों को कठपुतलियों की तरह नचा रहे थे उनका नेतृत्व कौन कर रहा था?".![]() |
| अन्ना हजारे |
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| ये दिल भी क्या चीज है? |
ये रिपोर्ट 8 देशों बांग्लादेश, भूटान, भारत, नेपाल, पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान, मालदीव और श्रीलंका में अध्ययन के बाद तैयार की गई है.
दुनिया भर के स्वास्थ्य मंत्री इस बात पर सहमत हुए हैं कि हर साल गर्भावस्था और प्रसव के दौरान होने वाली महिलाओं की मौत को रोकने के लिए तत्काल कार्रवाई की जानी चाहिए.
इथियोपिया की राजधानी आदिस अबाबा में संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष यानी यूएनपीएफ़ की बैठक में इस बात पर चिंता जताई गई कि कई देशों में इस वजह से होने वाली महिलाओं की मौतों में हाल के दिनों में काफ़ी बढ़ोत्तरी हुई है। सम्मेलन में इस बात पर सहमति बनी कि इस समस्या के निदान के लिए परिवार नियोजन सबसे सस्ता माध्यम है। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष ने साल 2015 तक दुनिया भर में गर्भावस्था और प्रसव के दौरान मृत्यु दर में दो तिहाई कमी लाने का लक्ष्य रखा है। लेकिन इस लक्ष्य में विभिन्न देशों की सांस्कृतिक और धार्मिक मान्यताएं कई बार आड़े आ जाती हैं। सम्मेलन में इस बात पर भी चिंता जताई गई।
उल्लेखनीय है कि बहुत सी महिलाएँ मानती हैं कि प्रसव के दौरान महिलाओं की मौत ईश्वर की इच्छा पर निर्भर होती है लेकिन उन्हें यह जानकारी नहीं है कि इनमें से बहुत सी मौतें रोकी जा सकती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन इस समस्या को 'मानवीय आपात स्थिति' बता रहा है। सहस्त्राब्दी विकास के जो लक्ष्य तय किए गए थे, उनमें प्रजनन के दौरान गर्भवती महिलाओं की मौत की दर को कम करना भी था लेकिन इस मामले में सबसे कम प्रगति हुई है। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष का कहना है कि इसकी वजह राजनीतिक इच्छाशक्ति का कम होना है।
इनसाईट स्टोरी
आशुतोष पाण्डेय
अपराध, आतंक, हत्या, बलात्कार, लूट ये सब अब हमारे देश की नियति बन चुकी है। आर्थिक विकास औरबौद्धिक विकास का दावा करने वाले भारतीय समाज का ये वीभत्स रूप आख़िर क्यों दिख रहा है? मोबाइल औरतमाम अन्य सुविधाओं से लबरेज इस समाज की मत्ती मारी जा चुकी है। इसका मुख्य कारण मूलय्परक शिक्षा का पूर्णतया अभाव है। बच्चे के लिए प्रायमरी शिक्षा के साथ मीड - डे मील देने की व्यवस्था तो कर दी गई लेकिन जीवन मूल्यों की स्थापना के लिए प्रयास करने की सुध किसी को नही रही। आतंकी कौन बनते हैं? कौन करता है अपराध? इन सवालों की तह तक जायें तो एक बात साफ़ सामने आती है की बिना जीवन आदर्शों ओर संवेदनशीलता के साथ जवान होने वाला बचपन आसानी से गुमराह किया जा सकता है। न ही सरकारी ओर न ही पब्लिक स्कूल इस बात की परवाह कर रहें हैं की वे बच्चों को किस प्रकार की शिक्षा दे रहें हैं। हर एक सिर्फ़ पैसा कमाना चाहता है। शिक्षा को बेचने और खरीदने वालों की भरमार है। लेकिन आख़िर कब तक ये देश बिना मूल्यों के चल पायेगा। ये बात शर्म की है कि एक समय दुनिया को नैतिकता कि शिक्षा देने वाला ये देश आज अपने नैतिक पतन के चरम पर है। आख़िर हम क्यों नहीं सोच रहें हैं इस बारे में? क्या नैतिक शिक्षा और जीवन आदर्शों कि स्थापना के लिए भी मीड - डे मील की तरह का कोई कार्यक्रम विश्व बैंक के सहयोग से चलाना होगा। जो भीं पाठक इस लेख को पढे इस पर अपने विचार अवश्य भेजे। हम आप सभी के विचार इनसाईट स्टोरी के माध्यम से दुनिया तक पहुचायेंगे।
अपने विचार geetedu@gmail.com पर भेजें।
आशुतोष पाण्डेय


(आशुतोष पाण्डेय)
दुनिया की तीन दिग्गज सॉफ्टवेयर कंपनियों माइक्रोसॉफ्ट, गूगल और याहू ने विभिन्न आधिकारिक हस्तक्षेप रोकने और ऑनलाइन पर बोलने की आज़ादी की सुरक्षा के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। इन तीनों कंपनियों ने ऐसे समय में ये समझौता किया है जब इन कंपनियों पर चीन जैसे देशों में इंटरनेट पर पाबंदी लगाने में सरकार का सहयोग करने के आरोप लग रहे हैं। इस समझौते के निर्देशों के तहत जब बोलने की आज़ादी का मामला सामने आएगा तो ये कंपनियां आपस में तय करेंगी कि कितने आकड़े अधिकारियों को उपलब्ध कराए जाएं। ह्यूमन राइट्स फर्स्ट के अधिकारी माइक पोस्नर का कहना था कि ये ऑनलाइन से जुड़े मामलों की दिशा में एक महत्वपूर्ण क़दम है। उनका कहना था, ''कंपनियों को थोड़ा आक्रामक होना होगा और अनचाहे सरकारी हस्तक्षेप के ख़िलाफ़ आवाज़ उठानी होगी। '' इस समझौते में कहा गया है कि प्राइवेसी ''मानवाधिकार है और मानव सम्मान का गारंटीकर्ता है।'' इलेक्ट्रॉनिक फ्रंटियर फाउंडेशन के डैनी ओ ब्रायन का कहना था, ''पारदर्शिता अपनाने के लिए ये सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज है।'' गूगल की ग्लोबल पब्लिक पॉलीसी के निदेशक एंड्रयू मैकलॉलिन का कहना हैं कि हम कोशिश कर रहे हैं और कई लोगों के साथ मिलकर काम कर रहे हैं क्योंकि अकेले कंपनियां वो नहीं पा सकती जो कई लोग मिलकर कर सकते हैं। गूगल पर पूर्व में आरोप लगे थे कि उन्होंने चीनी सरकार की मदद की थी। असल में चीन की सरकार उन लोगों पर नज़र रखती है जो इंटरनेट पर थिआनमन चौराहा या लोकतंत्र के नाम पर सर्च करते हैं और गूगल लोगों पर नज़र रखने में चीन सरकार की मदद कर रहा था। उधर माइक्रोसॉफ्ट पर चीनी सरकार का विरोध करने वाले एक रिसर्चर का ब्लॉग रोकने का आरोप भी लगे हैं। उल्लेखनीय है कि चीन में अभी भी मीडिया की स्वतंत्रता पर पाबंदियां हैं और सर्च इंजनों पर सरकार की मदद करने के आरोप यदा कदा लगते रहे हैं। इन तीन बड़ी कंपनियों के बीच जो समझौता हूआ है उसकी शुरुआत ग्लोबल नेटवर्क इनिशिएटिव के तहत हुई है जिसमें इंटरनेट कंपनियों के अलावा मानवाधिकार संगठन, निवेशक और बुद्धिजीवी भी शामिल हैं।

