शुक्रवार, 5 अगस्त 2011

नागचंद्रेश्वर के मंदिर के कपाट खुले

'आपके शहर' में हमें एक खबर मध्य प्रदेश के उज्जैन से मिली है. 
उज्जैन, ऐतिहासिक नगरी उज्जैन में वर्ष में एक दिन नाग पंचमी को खुलने वाले नागचंद्रेश्वर के मंदिर में श्रद्धालुओं का तांता लगा हुआ है. श्रद्धालु अपनी मनोकामनाएं पूरी करने के लिए विशेष पूजा अर्चना कर रहे हैं. प्रसिद्ध महाकालेश्वर मंदिर के ऊपरी हिस्से में स्थित है, नागचंद्रेश्वर का मंदिर. इस मंदिर के कपाट वर्ष में एक दिन नागपंचमी की रात खुलते है. वर्षों से चली आ रही परंपरा के मुताबिक नागपंचमी को बुधवार की रात को 12 बजे मंदिर के कपाट खोले गए. मंदिर के कपाट खुलने के बाद से ही देश के विभिन्न हिस्सों से पहुंचे श्रद्धालु पूजा अर्चना करने लगे हैं. कोई दूध से स्नान करा रहा है तो कोई अनुष्ठान कर रहा है. यहां आने वाले श्रद्धालुओं का मानना है कि नागचंद्रेश्वर के दर्शन मात्र से ही समस्याओं से मुक्ति मिलती है तथा मनोकामनाएं पूरी होती हैं.
संभवत: यह देश का इकलौता ऐसा मंदिर है जिसके कपाट वर्ष में एक दिन के लिए खुलते हैं. यह मंदिर महाकाल मंदिर के ऊपरी हिस्से में स्थित है तथा इसके निर्माण को लेकर तरह-तरह की किंवदंतियां हैं। यह मंदिर आर्कषक है. इस मंदिर में उत्तरी दिशा की दीवार में नागदेवता की प्रतिमा बनी है. सर्प के सिंहासन पर भगवान विष्णु विराजमान है. वहीं सात सर्पो के आसन पर भगवान शिव विराजित है. यहां गणेश जी की भी प्रतिमा है. 
प्रस्तुति: इनसाईट स्टोरी 

ये आन्दोलन: ऐसा क्या है


इस लेख के सर्वाधिकार लेखक के पास सुरक्षित हैं, बिना लिखित अनुमति पूर्ण या आंशिक रूप से इसका प्रकाशन, सम्पादन या कापी करना वर्जित है.


आज एक अहम सवाल देश के लोगों से क्या आन्दोलनों या हडतालों से देश सही दिशा में जाएगा? आज हर तरफ आन्दोलनों की बाढ़ है, जहां सारे देश में कांग्रेस के खिलाफ आन्दोलन हैं; वहीं जिन राज्यों में कांग्रेस की सरकार नहीं है, वहां कांग्रेस आन्दोलन कर रही है. आज बैंको की हड़ताल है, रोज कहीं न कहीं हड़ताल होती है, और ये आन्दोलन किसी सेलिब्रेटी के द्वारा किया जाय तो फिर देखिये, एक जमात खड़ी हो जाती है इनके साथ भले ही उनका कुछ लेना देना हो या ना हो बस फोटो आ जाय किसी विडियो फुटेज में दिख जाएँ. आन्दोलन कैसा हो, कब हो, किसके खिलाफ हो और क्यों हो? इसके लिए क्या कोई नियम हों. कर्नाटक के मुख्यमंत्री ने जब लोकायुक्त की रिपोर्ट के खिलाफ बयान दिए, या उसे चैलेन्ज किया तो कोई आन्दोलन नहीं हुआ. जब देश में एक बड़ा तबका लोकपाल के पक्ष में आन्दोलन रत है तो लोकायुक्त संतोष हेगड़े की रिपोर्ट की धज्जियां उड़ाना कैसे संभव हुआ? क्या आन्दोलन प्रायोजित भी होते हैं? शायद हाँ, शायद नहीं सिर्फ हाँ, ज्यादातर आन्दोलन प्रायोजित ही होते हैं, और उन्हें करने वालों का देशहित से कुछ लेना देना नहीं होता है. हाँ कुछ लोगों को मोहरा बना कर पेश किया जाता है, वो चाहे समाजसेवी हों, छात्र हों या फिर सन्यासी हमें ९० के दशक का आरक्षण विरोधी आन्दोलन याद है. कुछ लोगों के भड़काऊ बयानों ने देश को एक आग में झोंक दिया था, कई छात्र-छात्राओं ने आत्मदाह किया था, सारे देश में अफरातफरी थी. उसके बाद बाबरी मस्जिद को लेकर हुए हंगामें. क्या हुआ सारे देश में सबको याद होगा? ३१ अक्टूबर १९८४ को जब इंदिरा गाँधी को गोली लगी तो पूरा देश कैसे जला था, कुछ ही लोग थे जिन्होंने ये आग फैलाई थी. कैसे भूल जाएँ गोधरा? क्या ये सब आन्दोलनों का कोई परिणाम सामने आया? आज आरक्षण जितना था उससे बढ़ ही गया, बाबरी मस्जिद पर जो फैसला आया उसे कोई मानेगा नहीं.
एक तबका है इस देश में जिनको कहना चाहिए "फुर्सत के बुद्धिजीवी" जिनके पास बस एक काम है, नयी थ्योरी को तैयार कर उसे जनता पर थोपना है, जनता ना माने तो आन्दोलन शुरू कर दो. लेकिन ७० फीसदी वो जनता जो अपने हाड़-मांस को सूखा हमारे लिए काम कर रही है उसके लिए आन्दोलन करने वाला कोई नहीं. १००० रूपया ना दे पाने के कारण कई किसानों की जमीने और घर कुर्क कर लिए जातें हैं; तब कहाँ होते हैं ये सब लोग. इन्हें दूर तो बहुत दिखता है लेकिन बगल वाले का गला ये बखूबी काटते हैं. जब किसी की बहन या माँ के साथ दुर्व्यवहार होता है तो कहाँ रहते हैं वो वकील जो देश को सुधारने की बात करते हैं. आन्दोलन और हड़ताल को मानवाधिकार और संविधान प्रदत्त अधिकार मानने वाले ये तथाकथित बुद्धिजीवी, अपने संवैधानिक कर्तव्यों का पालन क्यूं नहीं करते हैं? अगर संविधान में आस्था हो तो पूरी हो. पहले अपना पाठ तो पूरा पढ़ें फिर बढ़ें देश सुधार की ओर. एक ख़ास वर्ग को आज देश के इन ठेकेदारों ने बोलने को तैयार कर छोड़ा है और ये हैं कि काठ के पुतलों की तरह अपने आकाओं का संरक्षण करने खड़े दिखते हैं चाक-चौबंद.
आप आन्दोलन कीजिये लेकिन ये जरूर ध्यान में रखें की देश पहले है, हम बाद में... मेरे कहने से तो ये देश सुधरने से रहा. इस देश में जो फैसले जनता ने किये वो ही सबसे खूबसूरत हैं, और आगे भी उसे करने दो. आजादी के बाद इस देश की सत्ता कई बार बदली लेकिन एक पार्टी बार-बार लौट के आई है, इमरजेंसी के बाद ये माना जा रहा था कि कि अब इंदिरा कभी नहीं लौटेंगी लेकिन लौटी और मरने तक सत्ता में रही. उसके बाद वी.पी सिंह के बोफोर्स के हल्ले के बाद फिर कांग्रेस का सूरज अस्त हुआ, लेकिन फिर नर्शिम्हा राव और भारत की आजादी के बाद का स्वर्ण युग रहा विकास के मायने में. फिर पतन कुछ साल फिर सत्ता मनमोहन को दो बार. हर बार हल्ला हुआ लेकिन हर बार विकल्प ना होने पर फिर लौट के आना. आज फिर कांग्रेस हाशियें पर है, लेकिन फिर एक बार लौटेगी. तो आखिर क्या हुआ इतने आन्दोलनों का इनके अनुसार तो कांग्रेस को कभी लौटना ही नहीं चाहिए था. दरअसल आन्दोलन सिर्फ सत्ता को हथियाने या बचाने को होते हैं. ऐसे आन्दोलन का कुछ होने वाला नहीं जब तक एक गरीब किसान, और मजदूर हुंकार कर खड़ा नहीं होगा, आप एसी पंडाल और सुरक्षा के बीच चाहे जितने आन्दोलन कर लें शक्ल नहीं बदलेगी. जनता के स्वत: स्फूर्त होने का इन्तजार करो, आन्दोलन शब्दों से नहीं आता, कर्मों से आता है. गांधी बनने के लिए महीनों उपवास की ताकत और अनाशक्ति योग का अभ्यास चाहिए, आजाद जैसा सीना होना चाहिए.
(आशुतोष पाण्डेय)

दुखद: एक युग का अंत

उत्तराखंड के शहर हल्द्वानी से एक दुखद समाचार प्राप्त हुआ है.
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के विचारों से प्रेरित स्वतंत्रता संग्राम सेनानी अंबा दत्त ढौंडियाल का गुरुवार को हल्द्वानी में देहावसान हो गया. स्वतंत्रता संग्राम सेनानी अंबा दत्त ढौंडियाल का जन्म छह दिसंबर 1924 को आंवलाकोट गांव स्थित कोटाबाग में हुआ था. महात्मा गांधी की प्रेरणा से ही 14 वर्ष की अवस्था में ही भारत छोड़ो आंदोलन व सविनय अवज्ञा आंदोलन के कारण उन्हें जेल जाना पड़ा. स्वर्गीय ढौंडियाल पूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी के साथ बरेली जेल में आठ माह तक रहे. पंडित गोविन्द बल्लभ पंत के साथ भी 11 माह तक अल्मोड़ा जेल में रहे. तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें ताम्रपत्र देकर सम्मानित किया था. उत्तर प्रदेश राज्यपाल ने भी उन्हें सम्मानित किया था. उन्हें जिला पंचायत सदस्य मनोनीत किया गया था. वे ग्राम सभा आंवलाकोट के 15 वर्ष तक ग्राम प्रधान रहे. राजकीय सम्मान के साथ रानीबाग के चित्रशिला घाट पर उनका अंतिम संस्कार किया गया.
देश की आजादी के लिए संघर्ष करने वाले इस जाबांज सिपाही की कमी तो पूरी नहीं हो सकती है, लेकिन एक सीख हमें जरूर मिलती है कि जिस देश को आजाद करने में इन लोगों ने अपना तन, मन और धन सब लुटा दिया उसे बनाए रखें.
(इनसाईट स्टोरी) 
हल्द्वानी 

गुरुवार, 4 अगस्त 2011

खतरा चीन से: हैकिंग

अमेरिका द्वारा जारी एक मीडिया रिपोर्ट में दावा किया गया है कि पूरी दुनिया में भारत सरकार, संयुक्त राष्ट्र संघ और अमेरिका की रक्षा कंपनियों के नेटवर्क अब तक साइबर हमलों का सर्वाधिक शिकार हुए हैं. सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार चीन ही इनमें से अधिकतर के लिए जिम्मेदार है. इसके अलावा भी हैकिंग के मामलों में अक्सर चीनी हैकरों का हाथ होने की बात सामने आती रहती है. "वाशिंगटन पोस्ट" ने एंटी वायरस सॉफ्टवेयर बनाने वाली कंपनी मैकेफी की रिपोर्ट के हवाले से यह जानकारी दी है। रिपोर्ट में कहा गया है कि पांच साल की अवधि में इन हमलों में मुख्य रूप से शिकार बनी 72 संस्थानों की जानकारी जुटाई गई है। इनमें भारत सरकार, अमेरिका, दक्षिण कोरिया, वियतनाम, दक्षिण पूर्वी एशियाई राष्ट्रों के संघ आसियान और आईओसी भी शामिल हैं. जिन संस्थानों और कंपनियों के नेटवर्क में सेंध लगाई गई है, उनमें जेनेवा में संयुक्त राष्ट्र संघ का सचिवालय, अमेरिका के ऊर्जा विभाग की प्रयोगशाला और नए हथियार तैयार करने में लगीं 12 प्रमुख अमेरिकी कंपनियां हैं. रिपोर्ट में कंपनियों के नाम नहीं बताए गए हैं. रिपोर्ट में कहा गया है कि साइबर हमलों के पीछे किसी एक देश के हैकर जिम्मेदार हो सकते हैं. हालांकि इसमें किसी देश का नाम नहीं लिया गया है. लेकिन सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार सबूत चीन की तरफ इशारा करते हैं. मैकेफी के उपाध्यक्ष दमित्री एल्परोवित्च ने 14 पेज की इस रिपोर्ट में कहा है कि सबसे बड़ा सवाल यह है कि साइबर हमलों से जुटाई गई जानकारियों का हैकरों ने क्या किया? इसके गलत हाथों में पड़ने से बड़ा खतरा पैदा हो सकता है. रिपोर्ट के अनुसार साइबर हमला करने वाले सैन्य व्यवस्था और सैटेलाइट संचार जैसी संवेदनशील हासिल करना चाहते थे। साइबर हमलों में सैन्य ठेकेदारों, इलेक्ट्रॉनिक फर्मों और वित्तीय संस्थानों को भी निशाना बनाया गया. उल्लेखनीय है कि  इससे पहले भी कई साइबर हमलों के बाद अमेरिका ने चीन की ओर इशारा कर चुका है.  अमेरिका ने साइबर हमलों को रोकने के लिए कुछ काफी कड़े कदम उठाए हैं, फिर भी वह अब तक इन्हें रोकने में नाकाम रहा है. 
(आशुतोष पाण्डेय)

मैं दुनिया का सबसे भाग्यवान इंसान हूँ


इस लेख के सर्वाधिकार लेखक के पास सुरक्षित हैं, बिना लिखित अनुमति पूर्ण या आंशिक रूप से इसका प्रकाशन, सम्पादन या कापी करना वर्जित है.
मैं दुनिया का सबसे भाग्यवान इंसान हूँ, ये सुनने में कम ही आता है, अभागा होने का रोना रोने वाले तो करोड़ों में मिल जायेंगे लेकिन अपने भाग्य को सराहने वाला शायद ही कोई मिले. हर छोटी से छोटी बात पर भी भाग्य को कोसना, ये तो हमारी किस्मत ही खराब थी, ये सब हमारे साथ ही होना था. धिक्कार हैं! वो लोग जो भाग्य को कोस रहे हैं. हम क्या हैं? हमारा वजूद हमारा भाग्य नहीं कर्म निश्चित करते हैं. भाग्य ही एक ऐसी चीज है जिसे इंसान खुद जैसा चाहे गढ़ ले. दुनिया मैं किसी भी सफल इंसान को लो क्या वो परेशानियों से मुक्त था? जितनी बड़ी परेशानी उतना बड़ा सौभाग्य. अगर हर इंसान सिर्फ भाग्य को ही कोसता तो जानते हैं क्या होता, अभी तक हम असभ्य ही रहे होते. दुनिया भाग्य से नहीं हाथों और इन्द्रियों के मेल से चलती है. दुर्भाग्य क्या है कोई बताये मुझे?
सौभाग्य मैं जानती हूँ. "मैं सौभाग्यशाली हूँ" की इंसान के रूप में इस धरा पर आयी हूँ, मेरे पास करियत्री प्रतिभा है; ईश्वर ने मुझे अपने अंश से सर्वश्रेष्ठ भाग दिया है. शुक्रगुजार हूँ इस चमकते सूरज के लिए, मीठी चाँदनी के लिए और उसके द्वारा दी गयी उन चंद परेशानियों के लिए जिनसे वो मेरे वजूद को परखना चाह रहा है. असल मैं जन्म के बाद एक ही चीज है जिसके लिए हमें ईश्वर का धन्यवाद करना चाहिए वो हैं हमें दी गयी जिम्मेदारियां जिन्हें हम दुःख या फिर दुर्भाग्य कह देतें हैं. हम क्यों भागते हैं परेशानियों से? इन्हें हल कीजिये, ये हल हो सकती हैं, आज नहीं कल इनका हल निकलेगा. आप इन्हें किसी के भरोसे ना छोड़े कम से कम भाग्य के तो कतई नहीं. क्योंकि भाग्य हमारी नकारात्मक सोच का एक ऐसा काल्पनिक बुलबुला है जिसका कोई अपना अस्तित्व होता ही नहीं है. क्यों अब भी कोई संकोच बाकी है ये कहने में कि "मैं दुनिया का सबसे भाग्यशाली इंसान हूँ". मैं कौन हूँ जो ये कहूं की अपनी सोच बदलो. आप अपने दुर्भाग्य के साथ जितना जीना चाहें जी लें. लेकिन ये बंदी तो कभी दस्तक ही नहीं देगी दुर्भाग्य के दरवाजे. चलिए हम तो चले नई दस्तक के साथ.'मेरी दस्तक' मैं फिर आप से मिलेंगे "मैं क्यों मरूं चिंता की मौत" के साथ. अब आप लोग पढ़ सकते हैं, मेरे सारे आलेख ज्ञानपुंज पर भी. यहाँ क्लिक कर पहुँचिये खुशी के संसार में.   

(सुषमा पाण्डेय)

रुद्रपुर का रूख जरा संभल कर

आपका शहर स्तम्भ में हमें पहली खबर मिली है शहर रुद्रपुर से पढ़िए ये कहानी
रुद्रपुर उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश की सीमा पर स्थित एक शहर है जहां पिछले कुछ वर्षों में तेजी से औद्योगिक विकास हुआ है और इसी के साथ यहाँ लोगों की मुसीबतों का विकास भी हुआ है. सड़कों पर घंटों लगने वाला जाम इनमें से एक है, क्यों लगता है ये जाम? हाल ही में अमीर हुए यहाँ के लोग कारों, बाईकों का एक बाजार घरों में खड़ा कर चुके हैं और यातायात के नियमों को पालन करना यहाँ गुनाह माना जाता है, जिस की मन जहां से आये चल पड़े, दायें या बाएं इसका फर्क ही नहीं पड़ता है, कोई कुछ कहे तो मार पिटाई पर उतर आयें. प्रशासन नाम की कोई चीज उत्तराखंड में है ही नहीं तो यहाँ कहाँ से आ जायेगी. सड़कों के हाल देखें तो आप कहेंगे तौबा इसलिए कभी रुद्रपुर (उधम सिंह नगर) का रूख करें तो संभल कर रहिएगा. 
(रवि कुमार रुद्रपुर)

मंगलवार, 2 अगस्त 2011

भ्रष्ट हम भी हैं

इस लेख के सर्वाधिकार लेखक और सम्पादक के पास सुरक्षित हैं, बिना लिखित अनुमति पूर्ण या आंशिक रूप से इसका प्रकाशन, सम्पादन या कापी करना वर्जित है.
देश में काले धन को लेकर काफी बड़ा आन्दोलन करने वाले रामदेव का सब कुछ काला ही काला नजर आ रहा है, इस देश में अपने योग शिविरों के जरिये कालेधन की वापसी को लेकर बड़ी-बड़ी बातें करने वाले रामदेव और उनके साथियों की पोल खुलनी शुरू हो गयी है, बालकृष्ण के फर्जी हथियारों के लाइसेंस, फर्जी डिग्री, फर्जी पासपोर्ट, और तमाम फर्जी जानकारियों के चलते इस बात पर रामदेव की मंशा पर सवाल उठने लगें हैं की क्या रामदेव वास्तव में शुचिता लाना चाहते हैं? या फिर अन्य नेताओं की तरह झूठ बोल जनता को बहला रहें हैं. अभी तक रामदेव और उनके समर्थक इस बात का दावा करते नहीं थकते थे कि बालकृष्ण अपना सब छोड़ कई सालों से पतंजलि योगपीठ की सेवा कर रहें हैं, यहीं बातें खुद रामदेव और बालकृष्ण भी कई बार मंचों से कह चुके हैं. समझ में नहीं आता की उन्होंने या उनके जानने वालों ने इन बातों पर पर्दा क्यों डाल के रखा है? बाल कृष्ण का एक कार्पोरेट साम्राज्य है जिसका टर्न ओवर हजारों करोड़ का है. जिसकी जानकारी जनता को भी सी बी आई की जांच के बाद ही मिलनी आरम्भ हुईं हैं. अब तो उनके परिवार के अन्य लोगों की जानकारियाँ भी मिल रहीं हैं जो इस गड़बड़ झाले में शामिल हैं. मेरठ में उनके भाई ब्रह्मदत्त अपनी पत्नी के साथ पतंजलि योग पीठ का काम देखते हैं. लेकिन सी बी आई के शिकंजे को कसने के बाद भाग खड़े हुए हैं. जब भी कोई इस बाबत बोलता है या लिखता है तो रामदेव के चेलों की एक जमात उसके पीछे पड़ जाती है और कहा जाने लगता है की दिग्गी राजा ये कहते है, सोनिया ये कहती है, सारी सरकार चोर है.... वाह भाई वाह!
कितना शमर्नाक है एक संत का कृत्य,राजनीति तो विद्रूप है ही, जब एक संत ही योग, धर्म और शुचिता की आड़ में ये करे तो राजनेता तो क्या कहने? यह घृणित है. इसका विरोध हो बिलकुल वैसे ही जैसे सरकार की चोरी का. अब इस सवाल का जवाब भी यहाँ आ जाय, ये लाजिमी है क्या किसी को इस बात के लिए बख्श दें कि उसका ये पहला अपराध है या वह संत है? या इससे पहले भी कई लोगों ने ऐसा किया उन्हें सजा नहीं हुयी? यदि अपराध सिद्ध होने पर ए. राजा, कलमाडी या कनिमोझी को जेल हो सकती है तो बालकृष्ण को कैसे बख्श दें, और क्यों? यही व्यक्ति अगर कल देश का प्रधानमंत्री बन गया तो क्या हाल करेगा देश के, जो अपने एक आश्रम को चलाने के लिए इतने घोटाले कर सकता है तो देश की सत्ता मिलने पर क्या करेगा? भ्रष्टाचार चाहे संत का हो या नेता का सजा और विरोध समान हो. हमारा यही दोगला रवैया देश में भ्रष्टाचार को पनपने में मददगार रहा है, हम सदा छोटे और बड़े भ्रष्टाचारी का भेद कर छोटे को छोड़ देतें हैं, और यही छोटा एक दिन बड़ा बन जाता है,  भारत की राजनिती में बाहुबलियों का प्रवेश इसका उदाहरण है.
भ्रष्टाचार के खिलाफ एक बड़े और जनस्फूर्त आन्दोलन की जरूरत है जिसमें हर भ्रष्टाचारी को बराबर का खौफ हो. ऐसा कब होगा पता नहीं. अभी इस देश में कई आन्दोलन चल रहें हैं और इनके संचालक इस बात का दावा कर रहें हैं कि उनके साथ सारा देश खड़ा है और इसके लिए हवाला दे रहें है किन्ही जनमत सर्वेक्षणों का, क्या कहने आप के चंद मेट्रो शहरों में चंद लोगों से चंद सवाल पूछ कर इसे देश की आवाज कह रहे हैं? कभी पूछा उस किसान से जो रोज रोता है उससे पूछिए ना की प्रधानमंत्री के पद को लोकपाल के दायरे में लायें या नहीं? उसका जो जवाब हो उसे सीधा टेलीकास्ट कीजिएगा. फिर देखिएगा की भ्रष्टाचार कहाँ से खत्म करना है. 
एक नेता पांच साल में कितने करोड़ का घोटाला करता है इसकी खबर तो है आपको, लेकिन किसी ने जानने की कोशिश की चुनावों में वोटर वोट की क्या कीमत वसूलता है, कितनी शराब पीता है? तब कहाँ जातें हैं इस देश के बुद्धिजीवी, कितने करोड़पति बी पी एल कार्ड बना बैठें हैं, बाबुओं को लाइन से हटकर काम करने के लिए रिश्वत का लालच कौन देता है? बिना हेलमेट गाडी चलाने पर पकड़ने जाने पर चालान कटवानें की जगह रिश्वत कौन दे रहा है? एक बार सब मिलकर कसम खा लें की कम से कम हम अब कोई भ्रष्ट आचरण नहीं करेंगें तो देखिये फिर क्या होता है? हमारे भ्रष्ट आचरण को लोकपाल की परिधि में लाओ इसकी मांग करो? फिर देखिये क्या होता है? जितना समय हम इस बहस में जाया करें की कौन लोकपाल में हो कौन ना हो उससे तो अच्छा है कि हम खुद भ्रष्ट आचरण छोड़ दें.
(आशुतोष पाण्डेय)  

सोमवार, 1 अगस्त 2011

छात्रों को सिखाएं आधारभूत तथ्य

25 जुलाय 2011 को एजुकेशन मंत्रा  ने सफलतापूर्वक 15 सालों का सफ़र पूरा कर लिया है. इस सफ़र में कई सफलताओं की कहानिया जुडी हैं, 2000 से ज्यादा विद्यार्थी 10 वीं और 12 वीं की परीक्षा में सफल हो चुके हैं. इसके अतिरिक्त 556 विद्यार्थी इस सत्र तक इंजीनियरिंग और मेडिकल में दाखिला ले चुके हैं. दिल्ली के जी. टी. बी. इन्क्लेव से शुरू ये सफ़र जिसे मात्र तीन छात्रों के साथ आरम्भ किया था. आज हजारों सफलताओं की कहानियों से जुड़ा है.एक स्वप्न के साथ आरम्भ ये संस्थान अभी अपने मुकाम से काफी दूर जरूर खडा है लेकिन मंजिल बिलकुल साफ़ दिखती है. हमारा उद्देश्य कोचिंग से पैसा कमाना मात्र नहीं रहा, हर एक को आत्मनिर्भर बना कर खुद पढ़ने और पढ़ने की तकनीक विकसित करना सिखाया है. हम शिक्षा को कोचिंग मुक्त बनाना चाहते हैं, पहली क्लास से ट्यूशन की जो प्रवृति देखी जा रही है वो काफी घातक है, हम बच्चे के विकास के बजाय विनाश के लिए कोच करें ये कहाँ तक ठीक है. छात्रों को विषय के आधारभूत तथ्यों (Fundamentals) की जानकारी ना ही स्कूलों में दी जाती है और ना ही कोचिंग सेंटरों पर. लेकिन हमने अभिनव प्रयोग किये हैं छात्रों के लिए Fundamentals को जानने के लिए कई तरीके विकसित किये हैं. आज एजुकेशन मंत्रा क्लास रूम, आनलाइन और पोस्टल कोचिंग के रूप में कुल प्रतिवर्ष १०० छात्रों का ही प्रवेश लेता है. हमारे पास उपलब्ध सीमित साधनों में इससे ज्यादा प्रवेश दे पाना अभी हमारे लिए संभव नहीं है. हम कमाई से तो समझौता कर सकतें हैं लेकिन गुणवत्ता से समझौता हो ही नहीं सकता है. 
आप किसी भी प्रकार की जानकारी हमारी टीम से ले सकतें हैं: mail: mantraedu@hotmail.com
mobile: +91-7895365453 (Time 10:00 A.M-1:00 P.M & 7:00 P.M-9:00 P.M)

(सुषमा पाण्डेय)
Course Co-ordinator
Education Mantra

शनिवार, 30 जुलाई 2011

हिन्दुओं को एकजुट होना होगा: सुब्रहमन्यम स्वामी

जनता पार्टी अध्यक्ष सुब्रहमन्यम स्वामी के डी.एन .ए इंग्लिश डेली में लिखे एक लेख को लेकर अमेरिका के हावर्ड विश्विद्यालय में हंगामा खडा हुआ है. १६ जुलाई को लिखे एक सम्पादकीय में उन्होंने भारतीय हिन्दुओं से मुस्लिम कट्टर पंथी से निपटने के लिए एकजुट होने को कहा है. स्वामी कह रहें हैं जहां मदिर गिरा कर मस्जिद बनाई गयीं थी, फिर मंदिर बना दिए जाएँ. जो लोग या समुदाय हिन्दुओं को अपने पूर्वज मानने को तैयार ना हों उन्हें तो भारत में मताधिकार से वंचित करने की वकालत भी उन्होंने कर डाली है. १३ जुलाई को मुंबई बम हमलों की प्रतिक्रिया स्वरूप लिखे इस सम्पादकीय में उन्होंने पाक प्रायोजित और मुस्लिम आंतंकवादी इतिहास को देखते हुए भारत के मुसलमानों के हिन्दुओं के खिलाफ आत्मघाती बनने की शंका जाहिर की है. हावर्ड विश्विद्यालय में अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेसर सुब्रहमन्यम स्वामी के इस लेख ने अमेरिका के इस प्रसिद्ध विश्विद्यालय में एक नयी बहस को जन्म दिया है. २५० से अधिक छात्रों और उनके अभिभावकों के द्वारा भेजे गये एक इलेक्ट्रानिक पत्र में ये आशंका जताई गयी है की स्वामी के इस बयान देश में एक समुदाय विशेष के छात्रों के सम्मान को ठेस पहुंची है. इस के चलते विश्विद्यालय को स्वामी से सम्बन्ध समाप्त कर देने चाहिए. भारत और अमेरिका दोनों देश कट्टरपंथी आतंकवाद का शिकार भी हैं, और अभी दोनों इस आतंकवाद से निपटने को एकजुटता भी दिखा चुके हैं. ऐसे समय में इस बहस के कई मायने मिल सकते हैं, वैसे खुद सुब्रहमन्यम स्वामी को खबरों में बने रहने का शौक भी है. इस लेख में तो उन्होंने हिन्दू मानसिकता को ललकारा है कि यदि यहूदी दस साल गैस चेम्बरों में रहकर बकरी से शेर बन सकतें हैं तो हिन्दू क्यों नहीं? उन्होंने लिखा है की हिन्दू दस नहीं पांच सालों में ये कर सकते हैं. इस पर जहां हावर्ड में कड़ी प्रतिक्रिया हुयी है वहीं भारत में ना ही कोई इस बारे में बोला है, ना ही सरकार ने कोई स्टेंड लिया है. अब देखना है भारतीय बुद्धिजीवी वर्ग इस पर क्या प्रतिक्रिया देगा?

(आशुतोष पाण्डेय)

शुक्रवार, 29 जुलाई 2011

देश रंगा हिना के रंग

पाक विदेश मंत्री हिना रब्बानी 
आजकल देश का मीडिया और नेता हिनामय हो गए हैं, हिना रब्बानी खर पाकिस्तान की पहली महिला विदेश मंत्री हैं और पहली बार बतौर विदेश मंत्री यहाँ आयीं हैं. क्या कहने विपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवानी से लेकर समूची सरकार हिना, हिना का ही उद्घोष कर रही है. ये इस देश की आदत है, हर किसी को सिर चढ़ाना. सब भूल जातें हैं हम अगला पिछ्ला. बस हिना के साथ एक फोटो खिचवाने के लिए नेता बेताब दिख रहें हैं. लेकिन पाकिस्तान की कारगुजारियों पर कोई खफा दिख ही नहीं रहा है, बीजेपी जो सरकार से आंतकवाद पर रोज सवाल पूछती थी, आज उनके वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवानी भी एक बुके लेकर हिना के इर्द गिर्द नजर आतें हैं, काफी खुश हैं हिना को देख, सब भूल गए अगला पिछ्ला. हमारे विदेश मंत्री और सरकार के नुमाइंदे तो क्या कहने किस मुँह से कहें की आंतकवाद पाकिस्तान की देन है. क्योंकि कांग्रेस के कई बड़े नेता तो हिन्दू आतंकवादियों का ढिंढोरा पिटते नहीं थक रहें हैं उन्हें तो अजमल कसाब और लादेन से बड़े आतंकवादी आरएसएस में दिखते हैं, और पाकिस्तान को एक आतंकियों की लिस्ट भेजी थी उसका क्या हस्र हुआ जग जाहिर ही था.
*देश रंगा हिना के रंग* *कहीं कारगिल २ का आगाज तो नहीं* * अपनों से लड़ते हैं और विदेशी के सामने नत मस्तक* *सोनिया जानती है भारत का चरित्र*
हिना हमारी मेहमान हैं उनके साथ बदसलूकी ना की जाए लेकिन कम से ये तो कह दो की बस अब बर्दाश्त नहीं होता है. अगर अब भी तुम्हारी कारगुजारियां नहीं रुकेंगी तो हम भी नहीं रुकेंगे. लेकिन कौन कहे? सत्ता में जो बैठे हैं उनके होश तो पहले ही उड़ें हैं और विपक्ष इतना कमजोर है की अपने ही एक मुख्यमंत्री को हटाने के लिए उसे पापड बेलने पड़ रहें हैं. ऐसे में तो ये देश लगता ही हिना के हवाले हैं. कहीं ये हिना की चमक कारगिल-२ का आगाज ना हो. दुल्हन के हाथ में महेंदी तो अच्छी रची लेकिन अगले दिन ही रातों रात अगर दुल्हन घर को लूट प्रेमी के साथ चम्पत हो गई तो कोई क्या कर लेगा? अब बानगी इस देश की जनता की अपनों से तो लडती है, अन्ना की टीम, रामदेव की टीम, शिव सेना, विश्व हिन्दू परिषद् और अपने मोदी भाई ये सब यहाँ तो लड़ लेते हैं लेकिन विदेशी के आगाज को नजरअंदाज कर देते हैं. इसी कारण भारत पहले भी गुलाम रहा है और सोनिया गांधी जानती हैं भारत के इस चरित्र को इसीलिये बिंदास राज किये जा रहीं हैं.
(आशुतोष पाण्डेय)
सम्पादक इनसाईट स्टोरी

सोमवार, 25 जुलाई 2011

कांग्रेस सर्कस और उसके नट

अब कांग्रेस के दिन गुजर चुके हैं, घोटालों की जद में जकड़ी पार्टी के लिए उसी के सिपहसालार मुश्किलें खड़ी कर देतें हैं.ताजा मुश्किल पार्टी के वरिष्ठ नेता मणि शंकर अय्यर की टिपण्णी से आयी है, जिसमें वो कांग्रेस को सर्कस कह रहे हैं, और काग्रेसियों को नट. चलो मणिशंकर जी को भले बुरे की पहचान तो हुयी, लेकिन जिस अवसर पर ये बात कही उस अवसर पर वे खुद सबसे बड़े नट दिग्विजय के साथ राशिद किदवई की किताब '२४ अकबर रोड' का लोकार्पण कर रहे थे. उन्होंने तो यहाँ तक कह डाला की सोनिया गांधी और अहमद पटेल का निवास कांग्रेस मुख्यालय से ज्यादा पावरफुल है वहां तक विशेष प्रभावशाली ही पहुच पातें हैं. अब देखना ये है इसी कार्यक्रम में उनके साथ आये दिग्गी बाबू भी इस बात पर हामी भरते हैं? या फिर मणिशंकर की व्यक्तिगत सोच कह कर पल्ला झाड देतें हैं. वैसे ये आरोप नए नहीं हैं, आम कांग्रेसी कार्यकर्ता मात्र प्रयोग की वस्तु है, जिसे कांग्रेसी दिग्गज अपने स्वार्थों के लिए प्रयोग करते रहे हैं. पहली बार किसी ने खुल कर ये कहने का साहस किया है. लेकिन इस सर्कस के नटों को नैतिकता के ढोल पर नचाना किसी के बूते की बात नहीं है. राहुल की कार्पोरेट सोच भी नहीं चली........... चाटुकारों की पार्टी बन गयी है कांग्रेस........... जनता परेशान.......... क्या फिर अज्ञातवास में जायेगी?

पिछले कुछ सालों में जब से राहुल सक्रिय हुए हैं पार्टी के अंदरूनी हालत काफी काफी पतले हो गए हैं दरअसल राहुल की कार्पोरेट सोच पार्टी के लिए ज्यादा घातक साबित हो रही है. मनमोहन सिंह की जिन खूबियों को भुना कांग्रेस सत्ता में आयी थी वो भी उलट पड़ी हैं. जाने-माने अर्थशास्त्री का अर्थशास्त्र घोटालों में डूब गया, और उदारीकरण की सोच के चलते घोटालेबाजों को लेकर भी उदार हो गए, अब कहाँ गिने जहां घोटाले ना हुए हों. उसके बाद भी कांग्रेसी शुचिता की बात करते थकते नहीं हैं. मणिशंकर की ये टिपण्णी अब क्या गुल खिलायेगी खुदा जाने लेकिन इस देश की जनता को सर्कस के इस खेल को समझना होगा. सर्कस में रिंग मास्टर बन कर नटों को काबू करना ही होगा. 
आलेख: आशुतोष पाण्डेय 
प्रस्तुति: सुषमा पाण्डेय "निहारिका" 

रविवार, 24 जुलाई 2011

इंजीनियरिंग कालेजों का काला सच

देश में जहां आई आई टी की गुणवत्ता पर लगातार सवाल उठ रहें हैं वहीं दूसरी ओर प्राइवेट इंजीनियरिंग कालेजों की भरमार देखने को मिल रही है, जब आई आई टी अपनी गुणवत्ता के मानक पर खरी नहीं उतर रही है तो इन इंजीनियरिंग कालेजों का क्या कहना? एक समय महानगरों तक सीमित ये प्राइवेट कालेज शहरों और कस्बों तक में खुल चुके हैं. विज्ञापन में सबसे उत्कृष्ट होने का दावा करने वाले कालेजों के पास एसी क्लास रूम और वाई फाई कनेक्टिविटी भले ही हो लेकिन अगर शैक्षणिक माहौल की बात करें तो ये शिफर नजर आतें हैं, इन कालेजों में लैब का तो सर्वथा अभाव ही दिखता है. तो फिर कैसे चल रहें हैं ये कालेज? दरअसल इन कालेजों में एडमिशन लेने वाले काफी बाद की रैंकिंग वाले वो छात्र हैं जो सरकारी कालेजों में प्रवेश नहीं ले पाए और वे इसे आशीर्वाद मान लेतें हैं. मनचाही फीस वसूलने वाले इन संस्थानों में फैकल्टी की भारी कमी है, और यू जी सी के मानकों को तांक पर रख मात्र बी. टेक.या एम. टेक योग्यता वाले अध्यापक इनका काम चला रहें हैं. इसके अलावा कुछ विजिटिंग फैकल्टी के नाम पर ये छात्रों को बेवकूफ बना ही लेते हैं और ये विजिटिंग भी महज साल में एक या दो क्लास ही लेतीं हैं. इस प्रकार इंजीनियर बनाने के ये कारखाने चल पड़ें हैं. अब सवाल ये है की ये तैयार इंजीनियरों की फसल कैसी होगी? और ये देश के विकास में क्या योगदान कर पायेंगे? ये कुछ ऐसे यक्ष प्रश्न हैं जिनका उत्तर भले ही हमारी व्यवस्था के पास ना हो लेकिन इन्हें नजर अंदाज कर पाना भी इतना आसान नहीं होगा. कल जब ये इंजीनियर देश की मुख्या धारा मेंशामिल होंगे तो क्या करेंगे. अगर इनके बनाए पुल गिरने लगे, पटरियां उखड़ने लगें और घर जान लेने लगें तो... दोष किसके सर मढ़ा जाएगा. इस व्यवस्था को या फिर जनता की किस्मत को जो इसकी शिकार बनेगी.

शुक्रवार, 22 जुलाई 2011

सभ्य समाज का सच

हल्द्वानी एक सेक्स रैकेट के खुलासे ने सभ्य समाज का नग्न रूप प्रस्तुत किया है. पिछले कुछ सालों में हल्द्वानी की फिजा इस कदर बिगड़ी है की ये अपराध नगरी के रूप में जाने जानी लगी है. भू माफियाओं और  रेत माफियाओं के लिए मशहूर हल्द्वानी अब अंडरवर्ल्ड के कार्यवाही और काल गर्ल सप्लाई केन्द्रों के रूप में  विकसित हो रही है. ये एक नया शगल नहीं है, दरअसल ये सिलसिला कई सालों से चल रहा है, कालगर्ल सप्लाई का और आश्चर्यजनक रूप से इसमें पत्रकारों और पुलिस की भूमिका भी इस कृत्य को और शर्मनाक बनाती है. हल्द्वानी के मुखानी कालोनी में पकडे गए सेक्स रैकेट जिसमें हल्द्वानी के अतिरिक्त दिल्ली और रामनगर की लडकियां  भी शामिल हैं इस कड़ी का एक नया शगूफा है, पिछले कुछ सालों से हल्द्वानी में सेक्स रैकेट खूब पनप रहा है, इसमें अधिकतर मध्यवर्गीय परिवारों से सबंधित महिलायें हैं, बाकायदा दलालों के जरिये सुनियोजित नेटवर्क के जरिये इस धंधे को किया जा रहा है, इस बार पकड़ी  गयी स्कैंडल सरगना बसन्ती बिष्ट पहले भी अपनी बेटी के साथ जेल जा चुकी है, शानदार एसी और सभी सुविधाओं से लैस हल्द्वानी की पाश कालोनी में रहने वाली बसन्ती ने आरोप लगाया है की एक स्थानीय पत्रकार और पुलिस अधिकारी को वो बाकायदा पैसा देती रहीं हैं... हल्द्वानी के पत्रकारों पर ऐसे आरोप पहले भी कई बार लग चुके हैं, लेकिन कभी कोई नाम सार्वजनिक नहीं किया जाता है, आम आदमी की पोल खोलने वाले मीडिया का रूख ही ऐसा हो तो क्या किया जाय? असल में मीडिया भी इस बारे में ईमानदारी से काम नहीं कर रहा है. जहां सेक्स रैकेट की संचालिका का नाम तो सार्वजनिक कर दिया लेकिन पकड़ी गयी लड़कियों का नाम सार्वजनिक नहीं किया जाता है और नहीं इससे जुड़े ग्राहकों का नाम पता किसी को मालूम पड़ता है और लचर क़ानून के चलते जल्द ही सब आजाद हो जाते हैं. वैसे तो छोटी छोटी बातों पर सड़कों में आने वाली जनता भी इनका मूक समर्थन करती दिखती हैं. तभी तो कई बार पकडे  जाने के बाद भी इनका काम बदस्तूर जारी रहता है और सच तो यह है की इन्हें एक पहचान मिल जाती है.
(इनसाईट स्टोरी रोमिंग संवाददाता)

सोमवार, 20 जून 2011

इक्कीस वीं सदी का अंध विश्वास

२१वीं सदी और अंधविश्वास एक और माडर्न होने का दावा वहीं दूसरी ओर अंधविश्वासों की गिरफ्त. हम कहाँ हैं ये  सवाल एक यक्ष प्रश्न है, आज हम ऐसे ही एक अंधविश्वास से आपको दो चार करवा रहें हैं, उत्तराखंड में एक देव पूजन की विधि है "जागर" यह जागरण का ही एक रूप है जिसमें देवी देवताओं का आवाह्न किया जाता था, किसी भी शुभ अवसर पर इष्ट देव या ग्राम देव को पूजने की एक प्रथा थी, इसका उल्लेख कहीं न कहीं वैदिक साहित्य और अन्य अभिलेखों में मिलता है. लम्बे समय तक इसका स्वरुप इसी प्रकार का बना रहा लेकिन समय के साथ इसके रूप में परिवर्तन किया हुआ और इसे कई अंधविश्वासों के साथ जोड़ दिया गया, पूजा के साथ बलि और अन्य तमाम विधानों को जोड़ कर इसे पेट भरने और लोगों को भरमाने का जरिया बना दिया गया, आप आज उत्तराखंड के गाँव या कस्बों में ये खुले आम देख सकतें हैं की किस प्रकार कुछ लोग लोगों को भ्रमित कर अपना उल्लू सीधा कर रहें हैं. ये लोग चावल देख भूत काल की ५ पीढी से पहले की ऐसी घटनाएँ बताते हैं, जिन के बारे में इस पीढी को कुछ भी पता नही होता है, अधिकतर ये घटना किसी स्त्री के साथ हुए अन्याय से जुडी होती हैं. पांच पीढी या उससे पहले की घटनाओ को इतने सही तरीके के साथ प्रस्तुत किया जाता है की आम आदमी इस पर अनायास ही विश्वास कर लेता है, इसके बाद एक सिलसिला शुरू होता है पूजा पाठ और बलि का, इसमें "अहंकार पूजन", "रोष पूजन", "मृत आत्माओं का अवतार", "उनकी तृप्ति", मृत और अतृप्त आत्माओं की मंदिर बना स्थापना तक करवा दी जाती है. अक्सर देखा गया है की कोई परिवार एक बार इस में फंस जाय तो उसका निकलना मुश्किल ही होता है और आगे फंसता ही जाता है. एक बार पूजा करवाने के बाद फिर कह  दिया जाता है की पूजा में गड़बड़ हो गयी है, इन गड़बड़ियों की बानगी देखिये जैसे पूजा में काले मुर्गे की जगह सफ़ेद मुर्गा इस्तेमाल होना था, या फिर किसी के मन में कोई खोट था, या फिर पूजा जहां देनी थी, वहाँ नहीं दी गयी. लेकिन समाज इस जंजाल में इतनी बुरी तरह फंसा है की वो कोई सवाल पूछता ही नहीं है, जब पूजा करवाई जा रही थी तो आपके कहे अनुसार किया था तो गलत कैसे हो गया? अब ज़रा आपको इन पूजाओं  के सभी चरणों के बारे में बताएं सबसे पहले किसी चावल देखने वाले (जिसे पुछार या पुछयार कहतें हैं) के पास चावल लेकर जाना होता है, इसके बाद चावल देखकर उक्त व्यक्ति कोई भूत काल की कहानी सुनाता है जैसे आपकी पांच या सात पीढी पहले की कोई स्त्री की आत्मा भटक रही है जिसके साथ आपके पूर्वजों ने अन्याय किया था .इस पर विश्वास करना आसान भी हो जाता है क्योंकि कुछ समय पहले तक यहाँ बहु-विवाह प्रथा के स्पष्ट प्रमाण मिलते हैं. इसके बाद ये पुछ्यार करार रखने को कहते हैं और बताते हैं की ६ महीनों में इसकी पूजा करवानी होगी, छः माह के भीतर जागर लगानी होती है इस जागर में एक नाचने वाले और एक हुडका (उत्तराखंड का एक डमरू जैसा वाद्य) बजाने वाला (डंगरिया) आकर जागर लगाता है, इस प्रकार नाचने वाले व्यक्ति के शरीर में देवता का अवतार होता है और वो बताता है की किसी स्त्री के साथ जमीन, जायजाद, नपुंसकता, अंतिम संस्कार ना करने या फिर दूसरी शादी करने के कारण जो अन्याय  हुआ है उसी की बद दुआ के कारण उक्त स्त्री प्रेत रूप में भटक रही है यदि इसका इलाज नहीं किया गया तो परिवार के ऊपर विनाश का पहाड़ टूट जाएगा. फिर परिवार के लोग इसका निवारण पूछते हैं तो सभी को एक ही निवारण बताया जाता है जैसे, वो हरिद्वार जाकर इसका क्रिया कर्म करें फिर घर लौट कर जागर लगायें, और पूजा में इस आत्मा की तृप्ति के लिए  बकरे की बलि देने को कहा जाता है, इसके बाद एक साल के अन्दर अन्य कई पूजा करवाने को कहा जाता है, एक बार की इस पूजा का खर्च लगभग १० से ५० हजार तक आ जाता है. इतना सब करने के बाद कहा जाता है पिछली पूजा में कोई विधान गलत करवा दिया गया था, फिर से पूजा करवानी पड़ेगी. इस प्रकार ये अंत हीन सिलसिला चलता ही रहता है. इस प्रकार कई परिवार बर्बाद हो गए हैं, और कुछ लोगों का धंधा चल निकला है और सभ्यता और आधुनिकता का दावा करने वाला नवयुवा भी इसकी गिरफ्त में है, असल में उसे अनिष्ट की आशंका से इतना डरा दिया जाता है की वो अपना सब कुछ लुटाने को तैयार हो जाता है, जब हमने लोगों से उनके विचार जानना चाहे तो जो जवाब मिले वो लाजवाब थे, हमारा सवाल था की कैसे मान लेतें हैं कि ये सब सच है जवाब सुनिए कई चावल देखने वालों ने एक ही बात बतायी की किसी महिला के साथ हमारे पूर्वजों ने अन्याय किया था (वास्तव में सभी चावल देखने वाले एक ही बात बताते हैं, आप खुद इनके पास जाकर देख लें). दूसरा सवाल था कि ये पूजा गलत कैसे हुयी और उक्त आत्मा तृप्त क्यों नहीं हुयी? इसका भी उत्तर करीब करीब सामान मिला पूजा के किसी विधान को नही किया गया, या जैसा करना था वैसा नहीं हुआ. अब क्या करेंगे? इसका जवाब मिलता है फिर पूजा करनी है पिछली बार से इस बार बड़ी होगी. बलि की बात पर भी वो लोग अडिग दिखते हैं. लेकिन जब ये पूछा जाता है कि किसी की जान लेकर कैसे आप अपना भला कर लेंगें इस का कोई जवाब किसी के पास नहीं होता है. अब क्या इस समाज को सभ्य कहा जा सकता है. हम आत्मा या उसके अस्तित्व पर कोई बहस नहीं छेड़ना चाहतें हैं. आज वैज्ञानिक भी इसके स्वरुप को मान रहें हैं और सापेक्षिता के सिदधांत को देखें तो इनका अस्तित्व नकारा नहीं जा सकता है, दुनिया की पुरातन संस्कृति से लेकर आज का विज्ञान भी इसे जब स्वीकार कर रहा है तो इसके लिए कसौटी क्या हो ये सवाल अहम् हैं और दूसरा सवाल इस प्रकार लोगों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ का है. अभी एक आत्मा की शांति के लिए ना जाने कितने जीवों की बलि दी जायेगी. क्या ये हो सकता है की एक जान लेकर कोई आत्मा शांत हो जाय? ये प्रश्न हम अपने सभी समाज के लिए छोड़ रहें हैं. 
(आशुतोष पाण्डेय और इनसाईट स्टोरी टीम ) 

मुंबई पुलिस की कहानी

इस देश की पुलिस कारगुजारियों की एक मिशाल देखिये, महाराष्ट्र पुलिस के दाउद के अँगुलियों की छाप मौजूद नहीं हैं, जबकि ये शातिर अपराधी कई बार मुंबई पुलिस की गिरफ्त में आ चुका है. ये पुलिस की किस छवि को दिखाता है. मिड डे के रिपोर्टर की ह्त्या में दाउद का हाथ होने की खबर के बाद एक बार फिर पुलिस और अन्य सुरक्षा एजेंसियां दाउद के रिकार्ड खगालने में जुट गयी हैं. नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के महानिदेशक एनके त्रिपाठी के अनुसार दाउद कई बार मुंबई पुलिस की गिरफ्त में रहा है, लेकिन उसके पास दाउद के फिंगर प्रिंट उपलब्ध नहीं हैं. अगर दाउद के फिंगर प्रिंट लिए गए होते तो आज उसके खिलाफ कार्रवाई करने में सहूलियत होती, एन के त्रिपाठी का ये खुलासा चौंका देने वाला तो है ही साथ ही पुलिस की छवि पर भी सवाल उठा रहें हैं. ये एक दाउद का ही मामला नहीं है बल्कि ऐसे हजारों मामले इस देश की पुलिस से जुड़े हैं जहां ये अपराधियों की सहायता करते नजर आते हैं. अब देखना ये है मुंबई पुलिस इस बारे में क्या सफाई पेश करती है, या फिर गृह मंत्रालय और सुरक्षा एजेंसिया क्या रूख अख्तियार करती हैं?
(आशुतोष पाण्डेय) 

गुरुवार, 16 जून 2011

कांग्रेस मुन्नी से ज्यादा बदनाम

अपने बयानों के कारण अक्सर  विवादों रहने वाले भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष नितिन गडकरी ने कांग्रेस को लादेन की औलाद कहने में भी गुरेज नहीं किया. साथ ही ये भी कह दिया कि कांग्रेस पार्टी मुन्नी से भी ज़्यादा बदनाम हो गई है. इतना ही नहीं उन्होंने कहा कि जिस तरह सोनिया गांधी के भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ संघर्ष की बात तो वे मज़ाक में कहते हैं कि ये ऐसी ही बात है जैसे पाकिस्तान आतंकवाद के ख़िलाफ़ संघर्ष की बात करता है. कोलकाता में पार्टी के एक कार्यक्रम में हिस्सा लेने पहुँचे नितिन गडकरी ने कांग्रेस पर आरोप लगाते हुए कहा कि यह मां-बेटे की पार्टी है और बाक़ी सबकी  हैसियत नौकरों वाली है.
कांग्रेस पार्टी ने गडकरी के बयान पर कड़ी आपत्ति जताई है और सार्वजनिक रूप से माफ़ी मांगने को कहा है. पार्टी प्रवक्ता जयंती नटराजन ने कहा कि गडकरी गटर की राजनीति कर रहे हैं. दूसरी ओर नितिन गडकरी के तेवर यहीं ठन्डे नहीं हुए. रामलीला मैदान में हुई कार्रवाई को रावणलीला करार देते हुए उन्होंने कहा कि ये सब सोनिया गांधी के आदेश पर हुआ था. गडकरी ने कहा, "हम इस मामले पर चुप नहीं बैठ सकते. भाजपा सरकार के इस अलोकतांत्रिक क़दम को बर्दाश्त नहीं करेगी." उन्होंने कहा कि भ्रष्टाचार के मुद्दे पर कांग्रेस की छवि ख़राब हो चुकी है और यह पार्टी अब मुन्नी से भी ज़्यादा बदनाम है.
(इनसाईट स्टोरी टीम)  

ये कट आफ: उफ़


सरकार और मानव संसाधन मंत्रालय के तमाम प्रयासों के बीच भी छात्रों को कालेज में प्रवेश के लिए कोई राहत मिलती नजर नहीं आ रही है, कल दिल्ली के श्रीराम कालेज आफ कामर्स की कट आफ लिस्ट देखकर छात्रों के होश पाख्ता हो गए हैं इस साल जारी पहली कट आफ लिस्ट १०० फीसदी की है, कालेज के इस रवैये की चारों ओर भर्त्सना  हो रही है. कॉलेज की मंगलवार को जारी सूची के अनुसार, जिन छात्रों के पास 12वीं में बिजनेस स्टडीज, गणित, एकाउंटस और अर्थशास्त्र में से कोई विषय नहीं है तो उनके लिए बीकॉम में दाखिले के लिए सौ फीसदी कट ऑफ रखा गया है. साधारणतया इस सूची में विज्ञान के छात्र आते हैं. सिब्बल ने इस के लिए दिल्ली विश्विद्यालय के कुलपति को तो तलब किया ही साथ ही ये भी माना की देश में गुणवत्तापूर्ण कालेजों की कमी के चलते ये स्थिति पैदा हुयी है. इस प्रकार ९७-९८ फीसदी अंक लाने वाले छात्र भी प्रवेश से वंचित रह जायेंगे. सरकार को चाहिए की वह परीक्षा प्रणाली को सरल कर छात्रों को अधिक अंक लाने में सहायता करने के बजाय वास्तव में बुद्धिमान छात्रों को प्रोत्साहित करे. लेकिन सरकार केवल परीक्षा प्रणाली को सरल कर छात्रों को आकर्षित तो कर ले रही है लेकिन  इस तैयार भीड़ को खान समायोजित किया जाय इसके लिए कोई कदम उठा ही नहीं रही है. जब हमने छात्रों से इस बारे में बात की तो उनका कहना था की सब १०० प्रतिशत तो हो नहीं सकते हैं. अभी हाल के महीनों महीनों में रीलिज फिल्म फ़ालतू में विषय को काफी गहराई से दिखाया गया है. 
(इनसाईट स्टोरी कैम्पस टीम )

काग्रेस को राहत: रिलायंस की माफी

पी. चिदम्बरम 
रिलायंस इंडस्ट्रीज़ लिमिटेड (आरआईएल) ने अपने कर्मचारी के.आर. राजा की अपमानजनक टिप्पणी के लिए केन्द्रीय गृह मंत्री पी चिदंबरम से माफ़ी मांगी है. दरअसल आरआईएल के एक कर्मचारी ने पी चिदंबरम के बारे में कहा था कि उन्हें भी 2-जी स्पैक्ट्रम घोटाले में लाभ मिला है. इस पर गृह मंत्री ने क़ानूनी नोटिस भेज दिया था. इस नोटिस के जवाब में आरआईएल के ग्रुप प्रेसिडेंट वी बाला सुब्रमण्यम ने कहा है कि लॉबिस्ट नीरा राडिया के साथ बातचीत में उनके एक कर्मचारी केआर राजा ने गृह मंत्री के ख़िलाफ़ अपमानजनक और अनुचित टिप्पणी की थी. सुब्रमण्यम ने गृह मंत्री पी चिदंबरम के वकील को पत्र लिखकर कहा है कि राजा को उनके आधारहीन और ग़ैर ज़िम्मेदाराना बयान के काफ़ी फटकार लगाई गई है. उन्होंने कहा कि रिलायंस इंडस्ट्रीज़ इस घटना पर खेद व्यक्त करते हुए माफ़ी मांगती है. केआर राजा ने भी चिदंबरम के वकील को अलग से पत्र लिखकर माफ़ी मांगी है. इस पत्र में उन्होंने कहा है कि नीरा राडिया के साथ बातचीत में उन्होंने बिना किसी आधार के चिदंबरम पर अपमानजनक टिप्पणी की थी, इसलिए वे इस मामले पर माफ़ी मांगते हैं.दरअसल के.आर राजा और नीरा राडिया के बीच हुई बातचीत मीडिया में लीक हो गई थी. जिसके बाद चिदंबरम के वकीलों ने राजा को क़ानूनी नोटिस देते हुए माफ़ी मांगने को कहा था. इन मीडिया रिपोर्टों के बाद भारतीय जनता पार्टी ने 2-जी घोटाले में फ़ायदा उठाने का आरोप लगाते हुए चिदंबरम से त्यागपत्र की भी मांग की थी. इसके बाद शायद कांग्रेस ने राहत की सांसे ली होंगी क्योंकि २ जी घोटाले को लेकर सरकार और पार्टी पहले से ही कटघरे में खडी थी. 
(आशुतोष पाण्डेय)

शनिवार, 11 जून 2011

इनसाईट स्टोरी का सच

फ़ाइल फोटो: रामदेव-अन्ना हजारे 
आखिरकार इनसाईट स्टोरी की मुहिम जो ये साबित करना चाह रही थी की रामदेव का आन्दोलन मात्र एक शिगूफा है, आज अन्ना हजारे ने भी इस पर मुहर लगा दी, टाइम्स आफ इंडिया को दिए एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा की रामदेव योग गुरु हैं और वो ही बने रहें, किसी बड़े आन्दोलन को लीड करने की हिम्मत उनमें नहीं है, सामाजिक कार्यों के लिए कई अनुभवों की जरूरत होती है जो अभी उनके पास नहीं हैं. 
यह पूछने पर कि उन्होंने बाबा के आंदोलन से दूरी क्यों बना ली है, अन्ना ने कहा कि अपने आंदोलन में हम सभी के विचारों को सुनते हैं, चर्चा करते हैं और उसके बाद मिलकर कोई फैसला लेते हैं, लेकिन बाबा इस तरह नहीं सोचते। वह अकेले ही सारे फैसले लेते हैं। यही कारण है कि कई बार अपनी बातों ने उन्होंने अनजाने में ही सरकार को ही फायदा पहुंचाया है। उन्होंने कहा की रामदेव की लड़ाई भी भ्रष्टाचार को लेकर है लेकिन तरीका ठीक नहीं है, यही बात इससे पहले कई कांग्रेसी नेता और समीक्षक भी कह चुके हैं. ये बात सही है की रामदेव की इस कार्रवाई से अन्ना की लड़ाई को काफी नुकसान पहुचा है. यही बात हम लगातार अपने आलेखों में कहते रहें हैं. 
(आशुतोष पाण्डेय)

एक नया विवाद और कांग्रेस

रामदेव से ट्रस्ट का हिसाब किताब मागने वाली कांग्रेस अब खुद एक विवाद में फंस गयी है, ताजा ख़बरों के मुताबिक़ प्रधानमंत्री की चंडीगढ़ की संपत्ति की कीमत आधी से भी कम आंकी गयी है, आज जब प्रधानमंत्री की सम्पत्ति का ब्योरा सार्वजनिक किया गया तो उस पर ये नया विवाद खडा हो गया और प्रधानमंत्री कार्यालय ने इस पर सफाई भी पेश कर डाली की ये चार साल पुरानी कीमत बताई गयी है, लेकिन ये बात हजम नहीं हो रही है की जिस ब्योरे को आज जारी किया गया है उसमें चार साल पुरानी कीमत बताने का औचित्य क्या है? मनमोहन सिंह के पास चंडीगढ़ में एक घर है, जिसकी कीमत को लेकर ये नया विवाद खड़ा हुआ है, वैसे ही भ्रष्टाचार के मुद्दे पर बदनाम इस सरकार की मुसीबत बढ़ने को ये काफी है, अब चाहे प्रधानमंत्री कार्यालय कोई भी सफाई दे लेकिन जवाबदेही तो सरकार और खुद प्रधानमत्री की भी बंटी है, क्योंकि ये मामला खुद उनकी अपनी संपत्ति को लेकर है. देखना ये है की अब सरकार और प्रधानमंत्री का क्या रूख होता है?
(आशुतोष  पाण्डेय) 

टूटेगा रामदेव का अनशन!

अब जल्द ही रामदेव के अनशन छोड़ने के आसार नजर आ रहे हैं, कल १० जून को एकाएक तबियत खराब हो जाने के कारण उन्हें उत्तराखंड सरकार की सहमति से प्रशासन ने अस्पताल में भर्ती करा दिया गया था झा लीवर में संक्रमण हो जाने के कारण उन्हें आई सी यू में रखना पडा था, आज पुन: श्री श्री रविशंकर रामदेव से मुलाक़ात करने पहुचे हैं, विश्वस्त सूत्रों की मानें तो एक केन्द्रीय मंत्री के विशेष आग्रह पर रविशंकर ये पहल कर रहे हैं. इससे पहले भी रविशंकर उनसे अनशन तोड़ने की अपील कर चुके हैं. लेकिन एक बड़ा वर्ग इसे रामदेव की हार ही मान रहा है... उनके समर्थक इस बात से व्यथित हैं की उत्तराखंड सरकार उन्हें जबरन उठा कर ले गयी, और अनशन तुडवाने की नियत से अस्पताल में ले जाया गया, उनके समर्थक कई जगह इसके लिए प्रदर्शन भी कर चुके हैं और कई सड़कों पर जाम भी लगाएं हैं. अगर रामदेव अपना अनशन बेनतीजा ख़त्म करतें हैं तो उनके समर्थकों के बीच एक नकारात्मक सन्देश जाएगा. लेकिन उत्तराखंड की सरकार भी ये नहीं चाहती है की कोई बबंडर यहाँ खडा हो. इसलिए भारतीय जनता पार्टी के तमाम नेता जो रामलीला मैदान में उनके अनशन को समर्थन दे रहे थे अब उनसे अनशन छोड़ने की अपील कर रहें हैं. 
(देहरादून इनसाईट स्टोरी टीम अपडेट)

सोनिया राहुल की वेब साईट हैक


कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और पार्टी महासचिव राहुल गांधी के संसदीय क्षेत्र की वेबसाइट्स को हैकर्स ने अपना निशाना बनाया है. रायबरेली व बरेली की वेबसाइट्स से कई दस्तावेज चुराए जाने की आशंका है. अभी तक किसी प्रकार के दस्तावेज चोरी होने या अन्य किसी प्रकार की कोई खबर नहीं आयी है. अभी इस मामले की जांच में दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल जुट गई है. कांग्रेस सांसद राहुल गांधी अमेठी और सोनिया गांधी रायबरेली के लोगों से सीधे संपर्क बनाए रखने के लिए इन वेबसाइट्स का उपयोग करते थे. इसमें क्षेत्र के लिए योजनाओं और विकास कार्यों के बारे में पूरी जानकारियां थीं. पुलिस ने मामले को गंभीर और गोपनीय मानते हुए कार्रवाई शुरू कर दी है. मामले में अदालत में एफ आई आर एक बंद लिफाफे में पेश की गई. फिलहाल पुलिस सूत्रों के अनुसार इतना ही खुलासा हो पाया है कि से वेबसाइट्स डोमेन से हैक की गई हैं. 
(इनसाईट स्टोरी टीम नई दिल्ली)   

बी.पी.एल पेंशन के लिए उम्र ६५ से ६० की

नई दिल्ली. सरकार ने गरीबी रेखा के नीचे (बीपीएल) रह रहे बुजुर्गो के लिए पेंशन की आयु सीमा 65 वर्ष से घटाकर 60 वर्ष कर दी है। इससे बीपीएल श्रेणी के 60 से 64 वर्ष की आयु वाले 72.32 लाख लोग लाभान्वित होंगे। ‘इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वृद्ध पेंशन योजना’ के तहत लाभान्वितों की आयु सीमा कम करने का यह निर्णय केंद्रीय कैबिनेट ने लिया है। इसके अलावा प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में हुई बैठक में 80 वर्ष और उससे अधिक आयु वाले वृद्धों को प्राप्त होने वाली पेंशन की दर में भी बढ़ोतरी करने को मंजूरी दी गई है। अब 80 वर्ष या उससे अधिक आयु वाले बुजुर्गो को 500 रुपए प्रतिमाह दिए जाएंगे। पहले तक यह दर 200 रुपए मासिक थी। इस फैसले से इस आयुवर्ग वाले 26.49 लाख लोग लाभान्वित होंगे। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट की बैठक में यह निर्णय किया गया। सूचना एवं प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी ने बताया कि यह परिवर्तन इस साल 1 अप्रैल से लागू होंगे। 2,770 करोड़ अतिरिक्त खर्च : बीपीएल श्रेणी के 169 लाख लोग 65 वर्ष से अधिक आयु के हैं जिन्हें पेंशन का लाभ मिल रहा है। 60 से 64 वर्ष तक की आयु वाले लोगों को वृद्धावस्था पेंशन योजना के तहत प्रतिमाह 200 रुपए पेंशन देने से सरकार पर 1,736 करोड़ रुपए का बोझ आएगा। 80 वर्ष से अधिक आयु वालों को 500 रुपए पेंशन से सरकारी खजाने से 953 करोड़ खर्च होंगे। इस तरह संशोधित योजना से सरकार पर 2,770 करोड़ रुपए का अतिरिक्त भार पड़ेगा। 
(इनसाईट स्टोरी के लिए, सुषमा पाण्डेय) 

रामदेव विवाद: कांग्रेस दोफाड़

बाबा  रामदेव के मुद्दे पर कांग्रेस और सरकार के बीच पहले दिन से ही दोफाड़ की स्थिति बनी हुई है। कांग्रेस के मुखपत्र ‘कांग्रेस संदेश’ के ताजे अंक में सरकार के उन चार मंत्रियों की तीखी आलोचना छपी है, जो बाबा रामदेव से मिलने एयरपोर्ट गए थे। इस पत्रिका को वितरण केन्द्रों से ही वापस मगा लिया गया है. संदेश के संपादकीय में चार मंत्रियों के  हवाई अड्डे पर जाने के सवाल पर प्रश्नचिंह लगाया गया है. संपादकीय में कहा गया कि हालांकि यह सरकार की जिम्मेदारी है कि वह सिविल सोसायटी की मांगों पर सहानुभूति से विचार करे लेकिन चुनी हुई सरकार की पूरी मर्यादा रखी जाना चाहिए और सरकार के अधिकारों का हनन नहीं होना चाहिए। पत्रिका के संपादक अनिल शास्त्री हैं। जैसे ही यह मामला वरिष्ठ नेताओं की जानकारी में आया, इसका वितरण रोक दिया गया है। नेताओं ने संपादक अनिल शास्त्री के साथ बैठक भी की, लेकिन उसमें कोई निर्णय नहीं लिया जा सका। अनिल शास्त्री भारत के पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय लालबहादुर शास्त्री के बेटे हैं। हालांकि बाबा रामदेव के मुद्दे पर पार्टी नेता दिग्विजय सिंह शुरु से ही रामदेव विरोधी लाइन पर चल रहे हैं, लेकिन सरकार ने उन्हें अनशन न करने से मनाने की पूरी कोशिश की। चार मंत्री एयरपोर्ट पर गए और उनसे बातचीत की। हाल ही में दिग्विजय सिंह ने फिर एयरपोर्ट गए सभी मंत्रियों पर अंगुली उठाई थी. यह संभवतः पहली बार है कि करीब एक दशक से प्रकाशित हो रही इस पत्रिका में छपे लेख या संपादकीय के कारण विवाद हुआ है. माना जा रहा है कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को न तो मंत्रियों के एयरपोर्ट पर जाकर बाबा रामदेव से मिलने की जानकारी थी और न ही रामलीला मैदान पर हुई पुलिसिया कार्रवाई पर उन्हें विश्वास में लिया गया। वे इस मुद्दे पर मंत्रियों के साथ हुई बैठक में अपनी नाराजगी व्यक्त कर चुकी हैं। 
(इनसाईट स्टोरी नई दिल्ली) 

रामदेव की हालत सुधरी

भ्रष्टाचार के खिलाफ अनशन कर रहे योग गुरु की सेहत में अब पहले के मुकाबले सुधार है। उन्हें कल यहां अस्पताल में सघन चिकित्सा कक्ष में भर्ती कराया गया था, लेकिन अब वह गहन चिकित्सा कक्ष (आईसीयू) से बाहर हैं. हिमालयन अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक डॉ. एसएल जेठानी ने बाबा रामदेव के आईसीयू से बाहर किए जाने की जानकारी दी. बाबा को ग्लूकोज चढ़ाया गया, जिसके बाद उनकी हालत में सुधार आया. रामदेव अब बातचीत भी कर रहे हैं. इससे पहले जेठानी ने कहा कि रामदेव के यकृत में थोड़ी गड़बड़ी आई थी लेकिन गुर्दा सामान्य रूप से काम कर रहा है. वह होश में हैं. उनका रक्तचाप 110:78 है और नाड़ी की गति 60 है. उन्होंने कहा कि वह बात कर रहे हैं और कोई दिक्कत नहीं है. उनके स्वास्थ्य में सुधार हो रहा है. देहरादून के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक जीएस मार्तोलिया ने कहा कि 46 वर्षीय योग गुरु को अस्पताल लाने के तुरंत बाद आईसीयू में भर्ती कराया गया जहां चिकित्सकों की दो टीम ने उनका परीक्षण किया. चिकित्सकों ने बताया कि रामदेव को नस के जरिये ग्लूकोज और सामान्य सलाइन दिया जा रहा है जिसके बाद उनकी स्थिति में सुधार हो रहा है.
(इनसाईट स्टोरी टीम हरिद्वार) 

शुक्रवार, 10 जून 2011

बाबा की हालत बिगड़ी, आईसीयू में भर्ती

काले धन के मुद्दे को लेकर अनशन पर बैठे योग गुरु बाबा रामदेव को शुक्रवार को स्थिति बिगड़ने पर हरिद्वार से करीब 25 किलोमीटर दूर जालीग्रांट स्थित हिमालयन अस्पताल में भर्ती कराया गया जहां डाक्टरों की एक टीम ने उनके स्वास्थ्य की गहन जांच पड़ताल की। हिमालयन अस्पताल के वरिष्ठ चिकित्सक डाo दीपक गोयल ने बताया कि सघन चिकित्सा कक्ष में भर्ती रामदेव के स्वास्थ्य पर लगातार नजर रखी जा रही है और उनकी कई प्रकार की जांच कराई गई है। हालांकि उनका स्वास्थ्य सामान्य है लेकिन ऐसे मामलों में जब तक पूरी जांच रिपोर्ट नहीं आ जाती तब तक कुछ भी नहीं कहा जा सकता है।इस बीच आधिकारिक सूत्रों ने बताया कि रामदेव के शरीर में पानी की कमी देखते हुए उन्हें ग्लूकोज चढ़ाया गया है। इसके पूर्व रामदेव के यहां पहुंचते ही डाक्टरों ने उनका उपचार शुरू कर दिया। हिमालय अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक एसएल जेठानी ने बताया कि रामदेव के अस्पताल पहुंचते ही उनका इलाज शुरू कर दिया गया। उन्होंने रामदेव की स्थिति के बारे में तुरंत कोई टिप्पणी करने से इन्कार किया और कहा कि इलाज के बाद ही रामदेव के स्वास्थ्य के बारे में कोई टिप्पणी की जा सकती है।रामदेव को हरिद्वार योगपीठ में अनशन स्थल से कड़ी सुरक्षा के बीच अस्पताल लाया गया। हिमालयन अस्पताल की ओर से शाम को जारी मेडिकल बुलेटिन में कहा गया कि रामदेव के स्वास्थ्य में कुछ सुधार हो रहा है। वह पूरी तरह होश में हैं। उनके गुर्दे ठीक तरह से काम कर रहे हैं लेकिन यकृत में कुछ समस्याएं हैं।बुलेटिन में कहा गया कि रामदेव की विभिन्न तरह की स्वास्थ्य जांच की गई हैं। उनके स्वास्थ्य पर पूरी नजर रखी जा रही है, वहीं दुसरी और रामदेव के समर्थकों में सरकार को लेकर रोष बढ़ता ही जा रहा है.  
(इनसाईट  स्टोरी टीम देहरादून )   

सोमवार, 6 जून 2011

ये आन्दोलन सेलिब्रिटी के साथ

आज देश भारी अस्थिरता के दौर से गुजर रहा है, जहां केंद्र और राज्य सरकारें घोटालों में लिप्त हैं और देश का बुद्धिजीवी वर्ग आन्दोलनों में व्यस्त है, भ्रष्टाचार का भूत देश की गर्दन पर सवार है, पंचायत से लेकर संसद और प्रधानमंत्री तक सभी की कहीं ना कहीं मौन स्वीकृति है इस सब को. केंद्र सरकार इस दुनिया की सबसे भ्रष्ट सरकार है, लेकिन जनता है की मानती ही नहीं, कलमाडी, ए. राजा को जेल जाना पड़ा है. लेकिन कर्नाटक के मुख्यमंत्री को तो भा ज पा हाईकमान तमाम सबूतों के बाद भी दोषी नहीं मान रहा है, अब बात ब.स.पा. की खुद मायावती के खिलाफ दर्जनों भ्रष्टाचार के आरोप हैं, पश्चिमी बंगाल की सरकार जिसे तीन दशकों से जनता का वरदहस्त था, यू. पी.ए. समर्थित और केंद्र सरकार में रेलवे मंत्री ममता बनर्जी के सामने ढह गयी. अब फिर रामदेव ने काले धन को लेकर सरकार पर हल्ला बोला तो जनता फिर उद्वेलित हुयी, लाखों लोग सारे देश में रामदेव के साथ आये, लेकिन रामदेव तो अनशन में बैठने से पहले ही सरकार से एक डील कर चुके थे, भले ही बाद में वो कहें की ये सब जबरदस्ती लिखवाया था, जब आप के साथ जबरदस्ती हुयी तो आपने जनता के पास आ इसका खुलासा क्यों नही किया? लेकिन वे इसका जवाब क्यों दें क्योंकि ये सवाल कोई पूछे तब ना, इस देश में तमाशाई बहुतेरे हैं, किसी भी जलसे या रैली में लाखों की भीड़ यूं ही इकठ्ठी हो जाती है, और इसमें अधिकतर चेहरे तो हर जगह पाए जातें हैं, रामदेव ने भी बुलाया लोग चले आये, सब मानते हैं की आन्दोलन हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है, लेकिन क्या ये सब लोग तब भी जातें हैं जब इनके बगल में भ्रष्टाचार होता है, किसी की इज्जत लुटी जाती है, इस देश की जनता को आन्दोलन करने के लिए सेलिब्रेटी चाहिए, चाहे वो राहुल गाँधी हों, अन्ना हों, रामदेव या फिर कोई और कुछ ख़ास असर नहीं बस आन्दोलन होना चाहिए, चाहे वो दिल्ली का रामलीला मैदान में हो या फिर किसी नेशनल हाईवे को जाम कर किया जाये, अब बात करें अपनी दिल्ली की ये दिल्ली भी ना, सब यही होगा कामनवेल्थ से लेकर धरना तक, और आज कल दिल्ली में एक नया समाज बना है फेसबुकिया समाज, अरे भाई इस समाज के पास विचारों का भण्डार है.. और अपना रूतबा दिखने का शौक भी, बस शुरू हो जाता है ये समाज अपने विचार गढ़ने, हर मुद्दे पर पर अपनी वेबाक राय देने के लिए तो अब ये विख्यात हो गया है, ये फेसबुकिये भी ना किसी भी सेलिब्रिटी के साथ खुद का नाम जोड़ने के लिए बेताब है पहले अन्ना के साथ फोटो अपलोड किये, अब नया बुखार रामदेव का चढ़ गया, ४-५ जून को सरकार ने रामदेव को हटाने के लिए जो किया उसे जलियावाला कह डाला सबने. सरकार ने जो किया वह तो अशोभनीय है और रहेगा भी, लेकिन यदि रामदेव ने सरकार के द्वारा किये गये धोखे को जनता के सामने रख दिया होता तो शायद ये हालात नहीं आते और सरकार की अच्छी फजीहत भी होती, खेल तो रामदेव ने भी खेला. बस जनता अभी समझी नहीं है, सत्याग्रह के लिए आर.एस.एस का साथ, क्या गांधी के देश में ये होना चाहिए था? हाँ गाँधी को मरे तो साल हो गए वो कौन सा सेलिब्रेटी हैं, जो जनता रामदेव से ये पूछती. जिस झूठ को छिपा रामदेव सत्याग्रह के लिए आये वो झूठ तो किसी को दिखता ही नहीं, क्या ये भ्रष्ट आचरण नहीं था? ए राजा और कलमाडी को तो जेल भेजा गया और रामदेव को चार्टर्ड विमान से उनके आश्रम में छोड़ा गया. ये सरकार केंद्र वाली वास्तव में भ्रष्ट है, तभी तो भ्रष्ट काम के लिए किसी को जेल तो किसी को बाकायदा विमान की सेवा.
देश में अस्थिरता ना हो इसके लिए सरकार के चार-चार मंत्री रामदेव के पास गए, रामदेव ने कहा भी की उनकी मांगें मान ली गयी हैं बस इस बात से भा ज पा नाराज हो गयी होगी और रामदेव को सरकार के साथ किया करार तोड़ना पड़ा. ये भ्रष्ट सरकार है जो हर बेईमान के साथ करार कर लेती है. कामन वेल्थ घोटाला देखो कितने बेईमानों को ठेका दिया. अब सरकार को चाहिए की एक सेंसर तैयार करवाए जो बेमानों को देखते ही बोलने लगे मेटल डिटेक्टर की तरह करप्सन डिटेक्टर, हमारे आई आई टी के छात्रों से लेकिन वहां भी समस्या, जयराम का कहना है की वो विश्वस्तरीय नहीं हैं. अब ऐसा करते हैं जहां सब एक मत हैं किसी को कोई परेशानी नहीं वहा की बात करें अरे कुछ दिन पहले मुन्नी बदनाम हुयी और कई अवार्ड ले गयी, अब सरकार बदनाम हो रही है, शीला भी तो जवान हुयी थी, वो भी हिट थी अब भ्रष्टाचार जवान है तो... हल्ला मच गया. चलिए सब हो गया अब देश की सोचतें हैं, ये देश हमारा है, ये ना रामदेव से सुधरेगा ना इस सरकार से बिगड़ेगा, इसे सुधारना और बिगाड़ना हमारे हाथों में है, कुछ करो इस देश के लिए, फेसबुक पर पोस्ट कर सेलिब्रिटी बनाना बंद करो.
(आशुतोष पाण्डेय)

शनिवार, 4 जून 2011

एक नया शगूफा है रामदेव का अनशन

भ्रष्टाचार, भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचार .... ये इस देश की नियति बन गया लगता है... सब इसकी अंगीठी पर अपने हाथ सेक रहें हैं, कोई लोकपाल की मांग करता है तो दूसरा ये पूछ लेता है की क्या गारंटी है की लोकपाल ईमानदार ही होगा? कोई काले धन को लेकर आंदोलित है. ख़ास बात है की ये सब जनता का साथ मांग रहें हैं. अन्ना हजारे के अनशन के बाद लोकपाल पर एक समिति का गठन तो कर दिया गया लेकिन गठन के समय से ही ये एक विवाद का कारण बन गयी थी, पहले भूषण परिवार को लेकर फिर प्रधानमंत्री और उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों को इस के प्रभाव से बाहर रखने के कारण खासा विवाद है, सरकार और अन्ना के समर्थकों के बीच एक मल्ल युद्ध जारी है, ६ जून को इसका जिन्न बाहर आने वाला है, खैर आज का बड़ा मुद्दा किसी समय योग गुरु रहे रामदेव बाबा का आज ४ जून से शुरू होने वाला अनशन है, रामदेव की मांगें तो बहुत हैं लेकिन सबसे बड़ी मांग में शामिल है, विदेशी बैंकों में रखा काला धन की वापसी. सरकार के मंत्री तो बाकायदा एयर पोर्ट पर भी रामदेव की वन्दना कर चुकें हैं, पर रामदेव हैं की मान ही नहीं रहें हैं, अब एक करोड़ लोगों के साथ अनशन में बैठने की चेतावनी दें, उन्होंने सरकार की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं. अब एक नया मोड़ देखें कल केन्द्रीय मंत्रियों के साथ हुयी एक बैठक का हवाला  देते हुए रामदेव ने कहा था "काफी मुद्दों पर सहमति हो गयी है है, सरकार काले धन को राष्ट्रीय संपत्ति घोषित करने पर राजी तो हो गयी है, लेकिन ऐसा कोई विधेयक लाने के लिए कोई समय सीमा तय नहीं है". रामदेव जी ये क्या आपका ये बयान आपके समझ में आया, सरकार क्या करेगी क्या नहीं ये तो बाद में पता चलेगा लेकिन एक सवाल ये काला धन कहाँ है, कितना है, इस पर भी आप के पास सिवाय कयास के कुछ नहीं है, और क्या ये इतना आसान होगा, जिन देशों के बैंकों में ये पैसा है क्या वो इसे आसानी से वापस कर देंगे? और क्या अन्तर्राष्ट्रीय कानूनों में ये प्राविधान हैं? क्या दुनिया भर के पैसों को जमा करने वाले इसकी जानकारियाँ देकर अपनी साख गिरायेंगें ऐसा तो लगता नहीं हैं. हाँ सरकार इसके लिए प्रयास भर जरुर कर सकती है और करने भी चाहिए. दरअसल अगर सच कहा जाए, आम आदमी भी इस मुहिम में मात्र साथ भर देने को जुड़ा है. इस देश में कितने लोग हैं जो अपना असल टैक्स जमा करतें हैं, कितने हैं जो सरकारी सुविधाओं की धज्जियां नहीं उडातें हैं, कितने प्रतिशत लोग हैं जो अपराधियों को वोट नहीं देतें है, आज अगर ख़ास लोगों पर शिकंजा कसेगा तो उनका कानूनी पलटवार आम जनता पर ही होगा... फिर तो सब भ्रष्टाचारियों को सजा मिले जो ख़ास है आम हैं, जो संसद के चुने नुमायंदे हैं या फर्जी बी पी एल कार्ड बनवाने वाले तथाकथित गरीबी की रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाले लोग, मान लिया राजनेता अनैतिक हैं, तो जनता उन्हें वोट क्यों दे रही है? तमिलनाडु में जयललिता के दामन पर तमाम दाग रहें हैं, पश्चिमी बंगाल में  ममता की ताजपोशी जो की अब तक की दुनिया की सबसे भ्रष्ट सरकार का हिस्सा है,को बहुमत क्या है? क्या रामदेव या अन्ना जनता की इस मंशा को नहीं जानतें हैं, इतने बड़े आन्दोलन खड़े करने की कुव्वत रखने वाले ये समाजसेवी (इस शब्द का इस्तेमाल करना चाहिए या नहीं? ) इतने मासूम तो नहीं हैं? पहले उन एक करोड़ की गारंटी दो बाबा जो आपके साथ अनशन में बैठे हैं, की वे सब ईमानदार हैं. अब भी कुछ बुद्धिजीवी अपनी फोटो खिचवाने जरुर जायेंगें, फिर अखबारों की कटिंग, टी वी बाइट्स सब का रिकार्ड रखेंगें. कुछ अन्ना के साथ चमके, कुछ बाबा के साथ भी चमक जायेंगें.... कुछ तो दो तीन दिन पहले से ही सुपर रिन की चमकार से सराबोर हैं,  लेकिन ये मुआ भ्रष्टाचार बढ़ता ही जाएगा जब तक इस देश का आम आदमी ना सुधर जाए और वो ना सुधरने वाला. अगर वास्तव में इस देश से भ्रष्टाचार मिटाना है तो एक क़ानून बने की है व्यक्ति प्रतिदिन देश के लिए एक घंटे से तीन घंटा अनिवार्य शारिरीक, मानसिक योगदान करे इसमें आम से लेकर प्रधानमंत्री तक को शामिल किया जाय, हर व्यक्ति को आर्मी में सेवा करना अनिवार्य कर दिया जाय कितने समाज सेवी इसके लिए तैयार हैं? ये सवाल है उन लोगों से जो देश को अनशन, धरनों, जलूसों से अस्थिर कर रहें हैं. इतनी देर देश के विकास के लिए काम करो फिर देखो ६ माह में इस देश की तस्वीर और तकदीर दोनों बदल जायेगी.

(आशुतोष पाण्डेय)


शुक्रवार, 27 मई 2011

वो घिनौना चेहरा आपका ही ना हो:फर्जी प्रमाणपत्रों का सच

जहां इस देश के नेता घोटालों में व्यस्त हैं, वहीं आम आदमी भी कहीं पीछे नहीं है, टैक्स की चोरी से लेकर फर्जी प्रमाणपत्रों के जरिये सरकारी नौकरी पा लेने का खुला खेल भी देश में चल रहा है, अभी एक ताजा मामला उत्तराखंड के नैनीताल जिले का सामने आया है, यहाँ एक अध्यापक ने फर्जी प्रमाणपत्रों के जरिये पांच साल सरकारी नौकरी कर ली, अब किसी व्यक्ति के द्वारा सूचना के अधिकार अधिनियम के अंतर्गत सूचना मागने पर ये सच सामने आया है की उसकी एम. ए. और बी. एड. की मार्कशीट ही फर्जी थी जिसका कोई रिकार्ड सम्बंधित विश्वविद्यालय के पास था ही नहीं, ये तो वह मामला है जो पकड़ में आ गया, ऐसे हजारों मामले हर साल होतें हैं जिसमें एक संगठित माफिया काफी सधे तरीके से काम करता है, बाकायदा एजेंटों और आफिस बनाकर काम करने वाले इन माफियाओं के  तार विभिन्न बोर्डों के अधिकारियों से लेकर राजनेताओं और पुलिस तक से जुड़ें रहतें हैं, ये माफिया भी दो तरह के हैं एक वो जो पूरे कायदे -कानूनों के अनुसार काम करतें हैं इनकी प्रवेश से लेकर परीक्षाफल आने तक की सारी जिम्मेवारी होती है, इनके पास नक़ल कराने और दुसरे छात्र को बिठा परीक्षा दिलाने तक की व्यस्था होती है. ये हाल किसी एक शहर या बोर्ड का नहीं है, सारे देश इस प्रकार के माफिया खुले आम अपनी बिसात बिछाए घूम रहें हैं, १० वीं से लेकर बी. एड तक कोई भी डिग्री या कोर्स हो ये करवा देतें हैं, इसके लिए ग्राहकों की कोई कमी भी नहीं होती है, दुसरे प्रकार का माफिया वो है जो फर्जी मार्कशीट खुद तैयार करता है और बेचता है इनके द्वारा दिए गए सभी प्रमाण पात्र नकली होतें हैं, फिर भी हजारों लोग हर साल इनकी सेवा लेतें हैं. इस प्रकार के माफिया बोर्ड के लोगो और मुहर की नक़ल कर फर्जी दस्तावेज तैयार करने में माहिर होतें हैं. समय समय पर इन लोगों की गिरफ्तारियां भी होती हैं लेकिन किसी पुख्ता क़ानून के ना होते ये जल्द ही  बरी हो जातें या जमानत पर आ जातें हैं, सवाल ये नहीं है की ये इतना बड़ा फर्जीवाड़ा करते कैसे हैं असल सवाल तो ये है की आखिर इन्हें काम करवाने वाले मिलते कहाँ से हैं, अभी कुछ दिन पूर्व एक एयर लाइंस के पायलट के पास फर्जी लाइसेंस मिला था. इसके अतिरिक्त फर्जी डोमिसाइल, बी पी एल कार्ड बनाने और बनवाने वालों की कमी नहीं हैं, हर साल फर्जी डोमिसाइल के चलते सैकड़ों छात्रों का प्रवेश निरस्त हो जाता है. फर्जी डाक्टर, फर्जी इंजीनियर से लेकर फर्जी नेता सभी पाए जातें हैं इस दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में. आगे हम आपको सुनायेंगें कुछ दास्तान जिसके चलते आप देखेंगे इस दुनिया का घिनौना चेहरा, लेकिन ध्यान रहे कहीं हमारी अगली मुहिम आपकी दास्तान ना कह रही हो. वो घिनौना चेहरा आपका ही ना हो. 
पड़ताल: (इनसाईट स्टोरी टीम) 
आलेख: आशुतोष पाण्डेय