रविवार, 16 जून 2013

ये मोदी-मोदी चिल्लायेंगे गठबंधन तोड़ के

तमाम उठापठकों के बाद जदयू और भाजपा का गठबंधन टूट ही गया और इस प्रकार एनडीए गठबंधन महत्वहीन ही हो गया. मोदी के नाम को आगे कर देने के बाद से ही देश की राजनीति में कई नये समीकरण दिखने लगें हैं. पहले आडवानी की नाराजगी फिर नीतीश कुमार का 17 साल पुराना गठबंधन तोड़ने का फैसला. ममता बनर्जी का तीसरे मोर्चे की तैयारी करना. इन सब के बीच भारतीय राजनीति किसी बड़े उलटफेर का इन्तजार कर रही है. पहले बात मोदी को लेकर हो जाये, मोदी को बीजेपी के धड़े द्वारा विशेष हवा दी जा रही है. पिछले कुछ सालों में बीजेपी के सभी चुनावी मुद्दे पिट चुके हैं उसकी हिंदुत्व की छवि तार-तार हुयी है. ऐसे में भाजपा के पास मोदी ही तुरूप का ऐसा पत्ता है जिस पर दाँव खेला जा सकता है और भाजपा इसी दाँव को लगा भी रही है लेकिन एक राजनैतिक समीक्षक की हैसियत से देखें तो गुजरात के बाहर मोदी का जादू नहीं चल रहा है. लगभग सात दशकों के लोकतांत्रिक इतिहास में देश की सत्ता किसी कट्टरपंथी को नहीं सौपीं गयी है. यही कारण भी है की देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था फली-फूली है. मोदी को गुजरात के परिपेक्ष्य में देखें तो एक विकास पुरूष से ज्यादा उनकी छवि कट्टरपंथी के रूप में दिखी है.
अपने विरोधियों को ठिकाने लगाने से लेकर जनता के बीच में इस सन्देश को पहुचाने में भी मोदी सफल रहें हैं की मोदी गुजरात की जरूरत हैं अगर मोदी नहीं रहेंगे तो गुजरात में हिन्दू बेमौत मारा जाएगा. लेकिन अपने सियासी फायदे के लिए बजरंगी और कोदनानी को फांसी की सिफारिश करने से भी मोदी को गुरेज नहीं दिखता है, भाड़ में जाए हिन्दू वाली तर्ज में हिन्दू नेताओं को फांसी की मांग करने वाले मोदी को कुछ लोग हिन्दू धर्म के लिए मसीहा के रूप में स्थापित करने की कोशिश में हैं. आडवानी को जिस तरह मोदी ने चित्त किया उससे ये सन्देश ही गया की जो मोदी पूजा नहीं करेगा उसे या तो चुप कर दिया जाएगा या फिर ठिकाने लगाने से भी गुरेज नहीं किया जाएगा. भाजपा मोदी को लेकर जितनी उत्साहित दिख रही है, उसका कोई कारण नहीं दिखता है. कुछ लोगों के सोचने से कोई प्रधानमंत्री नहीं बन जाता है और भाजपा के समर्थक तो मोदी को प्रधानमंत्री बना चुके हैं उन्हें इतना सब्र नहीं की चुनावों का इन्तजार करें. वैसे भाजपा और उसके समर्थक कब किस के तारों को आसमान से जमीनों-जद कर दें कहना मुश्किल हैं. ये वह ही लोग हैं जो कभी आधी रोटी खायेंगें मंदिर वहीं बनायेंगें का नारा देते थे लेकिन सत्ता के बाद एक बार उस और झांका तक नहीं हाँ अटल जी ने पाकिस्तानी पार्टी खूब उडाई और पाकिस्तान ने कारगिल से मार की. अब देखना ये है की मोदी कब तक प्रधानमंत्री बने रहते हैं, चुनाव के बाद तो जनता का फैसला ही मानना पडेगा तब तक मोदी हमारे प्रधानमंत्री. 

हुस्न के जाल में दिल्ली! खरीददार महिलाएं

जी हाँ ये हुस्न भी कब कातिल बन जाए कोई नहीं जानता लेकिन आज हुस्न का भी प्रोफेशनल यूज किया जा रहा है. दिल्ली की बालाएं जहां कई दिलों को धकड़ा रहीं हैं वहीं कई जेबों की तराशी भी कर रही हैं। हुस्न और अदाओं का बाजार सजा रहता है जब जो चाहे आये और खरीद ले. एस्कार्ट सर्विस के नाम पर दिल्ली के हर कोने में ये बालाएं तैयार मिलती हैं. बुकिंग नेट से, एस एम एस, फोन या फिर दलालों के जरिये की जा सकती है. एक खासे प्रोफेशनल की तरह इनके भी समय, स्टेट्स और लोकेशन के अनुसार दाम तय हैं। इस बाजार में कौन बिक रहा है और कौन खरीद रहा है ये जान पाना मुश्किल है. फीमेल एस्कार्ट ही नहीं मेल एस्कार्ट भी इस प्रोफेशन में हैं और उनकी बड़ी डिमांड है. एक अनुमान के अनुसार दिल्ली और एनसीआर के इलाके में करीब 800 मेल एस्कार्ट सर्विस हैं। इसका मतलब क्या निकाला जाय क्या महिलाएं भी हुस्न और सेक्स के बाजार में खरीददार हैं, जी बिलकुल मेल एस्कार्ट का धंधा जिस रफ्तार से चल पड़ा है उसके अनुसार तो महिला ग्राहकों की संख्या भी कम नहीं हैं। एक विशेष अभियान के तहत जब एक मेल स्ट्रिपर से बात की तो काफी दिलचस्प बात सामने आयीं हैं, एक मेल स्ट्रिपर को एक बार में 10,000 से 30,000 मिलता है. ये मेल स्ट्रिपर कई बार तो एक ग्रुप के द्वारा भी बुक करवाए जातें हैं. 

शुक्रवार, 14 जून 2013

मानव डीएनए का पेटेंट नहीं हो सकता


अमरीका के सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि मेडिकल कंपनियां मनुष्य के प्राकृतिक डीएनए का पेटेंट नहीं करा सकतीं लेकिन प्रयोगशाला में तैयार किया गया डीएनए पेटेंट योग्य माना जाएगा. कोर्ट का कहना है कि डीएनए प्रकृति की देन है और सिर्फ़ इस आधार पर उसका पेटेंट नहीं किया जा सकता कि किसी शोध के लिए वह शरीर से अलग किया गया है. कोर्ट ने मिरियड जेनेटिक्स नाम की एक अमरीकी कंपनी द्वारा स्तन और गर्भाशय कैंसर का पता लगाने संबंधी शोध में इस्तेमाल हुए जीन के पेटेंट को अवैध क़रार दिया है.
चिकित्सकीय शोध और जीव विज्ञान तकनीक के लिए कोर्ट के इस फ़ैसले के दूरगामी परिणाम होंगे. अमरीकी जैव वैज्ञानिक समुदाय ने इसका विरोध करते हुए कहा है कि ऐसे पेटेंट पर बंदिशें लगाने से जीन से जुड़े शोध पर नकारात्मक असर पड़ेगा. मामला मुख्य रूप से स्तन और गर्भाशय कैंसर का पता लगाने संबंधी शोध से जुड़ा था.मिरियड जेनेटिक्स एक ऐसे टेस्ट पर काम कर रही थी जिससे कैंसर को जन्म देने के लिए जिम्मेदार जीन में तब्दीली की संभावना को तलाशा जा सके. अमेरिकन सिविल लिबर्टीज़ यूनियन का तर्क था कि डीएनए प्रकृति की रचना है इसलिए इसका पेटेंट नहीं हो सकता लेकिन कंपनी का कहना था कि जिस जीन पर सवाल उठाए जा रहे हैं उसे कंपनी ने शरीर से बाहर निकाल कर शोध किया है इसलिए उसका पेटेंट हो सकता है. 
2010 में एक न्यूयॉर्क फ़ेडरल कोर्ट ने यूनियन का पक्ष लिया लेकिन अपीलीय न्यायालय ने मिरियड जेनेटिक्स की बात स्वीकार करते हुए कहा कि मानव शरीर से निकाले गए डीएनए का रासायनिक स्वरूप बिल्कुल भिन्न होता है. सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को नहीं माना. न्यायाधीश जस्टिस टॉमस ने फ़ैसले में लिखा कि सिर्फ़ इस आधार पर कि 'जीन को शरीर से बाहर निकाल लिया गया है उससे मिलने वाली जानकारी को पेटेंट योग्य नहीं माना जा सकता'. इस कथन के समर्थन में ही न्यायाधीश जस्टिस एन्टोनिन स्केलिया ने लिखा कि डीएनए का एक हिस्सा अगर बाहर निकाल भी लिया जाए तब भी वह अपने स्वरूप में उस प्राकृतिक डीएनए का ही हिस्सा है. अमेरिकन सिविल लिबर्टीज़ यूनियन की वक़ील सैन्ड्रा पार्क इस फ़ैसले का स्वागत करते हुए कहती हैं कि अब वैज्ञानिकों के लिए इन जीन पर शोध करना ज़्यादा आसान होगा क्योंकि किसी तरह की बौद्धिक संपत्ति के उल्लंघन का कोई डर नहीं रहेगा .अमरीका के सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि मेडिकल कंपनियां मनुष्य के प्राकृतिक डीएनए का पेटेंट नहीं करा सकतीं लेकिन प्रयोगशाला में तैयार किया गया डीएनए पेटेंट योग्य माना जाएगा. कोर्ट का कहना है कि डीएनए प्रकृति की देन है और सिर्फ़ इस आधार पर उसका पेटेंट नहीं किया जा सकता कि किसी शोध के लिए वह शरीर से अलग किया गया है. कोर्ट ने मिरियड जेनेटिक्स नाम की एक अमरीकी कंपनी द्वारा स्तन और गर्भाशय कैंसर का पता लगाने संबंधी शोध में इस्तेमाल हुए जीन के पेटेंट को अवैध क़रार दिया है. चिकित्सकीय शोध और जीव विज्ञान तकनीक के लिए कोर्ट के इस फ़ैसले के दूरगामी परिणाम होंगे. अमरीकी जैव वैज्ञानिक समुदाय ने इसका विरोध करते हुए कहा है कि ऐसे पेटेंट पर बंदिशें लगाने से जीन से जुड़े शोध पर नकारात्मक असर पड़ेगा. कोर्ट का ये फ़ैसला मिरियड जेनेटिक्स और अमेरिकन सिविल लिबर्टीज़ यूनियन के बीच चले एक मुक़दमे का नतीजा है. इस संगठन ने 2009 में एक मुक़दमा दायर कर ये सवाल उठाया था कि क्या मेडिकल कंपनियों को मानव जीन का पेटेंट करने की इजाज़त होनी चाहिए. 

गुरुवार, 18 अप्रैल 2013

भारतीय सद्दाम साबित ना हों मोदी

ये कुर्सी भी कितनी अजीब चीज है कि इंसान की नीयत और सिद्धांतों दोनों की ऐसी-तैसी कर देती है. २००२ गुजरात दंगों के बाद मोदी ने जिन आरोपियों को मंत्री तक बनाया था आज वह उन्हीं के लिए फांसी की मांग कर रहें हैं. माया कोडनानी और बजरंगी के साथ अन्य हिन्दू नेताओं को जब २००२ के दंगों के लिए आबद्ध किया गया था तो मोदी ने उन्हें निर्दोष बताया था. जबकि एक आईपीएस संजीव भट्ट ने इन दंगों के लिए मोदी और गुजरात सरकार पर अंगुली उठाई थी तो उनका क्या हस्र हुआ सबको याद होगा. लेकिन आज खुद मोदी सरकार इन दंगों के लिए इन लोगों को दोषी मान इनकी उम्र कैद को फांसी में बदलने की मांग कर रही है. अगर ये लोग और विशेष माया कोडनानी दोषी हैं तो मोदी क्यों नहीं. इससे पहले भी मोदी अपने खिलाफ खड़ें होने वालों को ठिकाने लगा चुके है. मोदी समर्थक चीख-चीख कर मोदी के इस एजेंडे को प्रचारित कर रहे थे कि ये दंगें मुसलमानों ने करवाए हैं और मोदी ने हिन्दूओं को एक सुरक्षित गुजरात दिया है. इन समर्थकों ने मोदी को अगला प्रधानमंत्री तक घोषित कर दिया था. ये समर्थक किसी की सुनने को तैयार नहीं थे. मोदी को शेर कहा जा रहा था.
अब मोदी का असल चेहरा सामने आ चुका है. मोदी के कोई भी दावे सच तो क्या सच के आस-पास भी नहीं हैं इसाई मिशनरीयों के द्वारा खुल कर धर्म-परिवर्तन किये जा रहें हैं. साम्प्रदायिकता का डर दिखा लोगों को गुमराह किया जा रहा है. दिल्ली में महिलाओं को लेकर बड़ी सोच बघारने वाले मोदी के सामने जब महिला आरक्षण का प्रस्ताव एक महिला राज्यपाल द्वारा रखा गया था तब उन्होंने उसे पास करवाने के लिए प्रयास क्यों नहीं किये? बकायदा मोदी ने तो उस पर गौर तक नहीं किया. दरअसल मोदी का एकमात्र एजेंडा है प्रधानमंत्री का पद और उसके मिल जाने के बाद देश में तानाशाह बन राज्य करना जो बोले उसकी हत्या. उनके सभी समर्थकों को माया की तरह फांसी दे दी जायेगी. जो बोलेगा उसकी हत्या कर दी जायेगी. इतना खौफ की सत्ता सुख बार-बार जनता ही देगी जैसे सद्दाम को देती थी. जो सद्दाम ने किया उसी राह पर मोदी भी हैं, बस फर्क इतना है कि वह भारत में हैं? भारत को इराक ना बनने दें. 

शुक्रवार, 12 अप्रैल 2013

एक करोड़ बेटियों के कातिल हम भारतवासी

आज सारी दुनिया में जहां महिला अधिकारों और कन्या भ्रूण हत्या पर बहस शुरू हो रही है, वहीं दूसरी ओर महिलाओं और बच्चियों के प्रति अत्याचार कम नहीं हो रहें हैं। क्या कारण है इस सब का, आखिर कौन जिम्मेदार है इसके लिए. अल्ट्रासाउंड कराने वाले सेंटर या गर्भपात करवाने वाले डाक्टर, अगर सही मायनों में देखें तो एक माँ ही आज कातिल की भूमिका में दिख रही है. बिना माँ की सहमति के शत-प्रतिशत केसों में भ्रूण हत्या नहीं करवाई जा सकती है. आधुनिकता की कसमें खाने वाली आज की माएँ खुद एक कन्या को गर्भ में खत्म करने को तैयार रहती है, समाज में चाहे वह खुद को लड़के और लडकी में कोई अंतर ना करने वाली दिखाने की कितनी भी कोशिश करे लेकिन सच तो ये है कि वह खुद ऐसा नहीं कर पाती है. 
इस देश में जहाँ नारी को नवदुर्गा और ना जाने कितने रूपों में पूजा जाता है लेकिन वास्तव में वही नारी एक बेटी को जन्म नहीं देना चाहती है ऐसा क्यों? क्या वास्तव में नारी खुद ऐसा करती है? यह एक बड़ा सवाल है? आज जब महिलाओं को काफी अधिकार मिलें हैं तब भी कन्या भ्रूण हत्या रूक क्यों नहीं रही है? दरअसल महिलाओं के लिए बने सारे क़ानून और अधिकार ना तो उसकी रक्षा कर पायें हैं और ना ही उसे समाज में समान अधिकार दें पायें हैं. एक महिला जब खुद को सुरक्षित महसूस नहीं करेगी तो कैसे एक कन्या को जन्म देना मंजूर कर पायेगी. आज भी धर्म और समाज एक बेटे के बिना परिवार को अधूरा मानता है. बिना बेटे के वंश कैसे चलेगा? ये एक सवाल हर समय समाज पूछता है, अगर विज्ञान की कसौटी पर इसे कसे तो ये एक बिलकुल ही बेहूदा तथ्य है, जिस तरह से माता-पिता के डीएनए बेटे को मिलते हैं बिल्कुल वैसे ही बेटी को भी तो फिर ये अंतर क्यों? हमारा ये बेहूदा राग अलापना कहाँ तक ठीक है। अगला सवाल ये है कि अब और कितना समय लगेगा हमारी मानसिकता बदलने में? 
आइये बदलें और एक बिटिया को जन्म दें उसे पालें और अपना वंश आगे ले जाएँ क्योंकि चाहे बेटा हो बेटी वह नौ माह तो पलेगा एक नारी के गर्भ में ही.
जो आकड़े उपलब्ध हैं उनके अनुसार पिछले बीस सालों में १ करोड़ लडकियों को भारत देश में पैदा होने से पहले ही मार दिया गया है? ये है मेरा भारत जो नवदुर्गा  की पूजा तो करता है लेकिन.....

(सुलेखा)
लेखिका Institute of Generation Education and Empowerment से जुड़ी हैं।  

रविवार, 24 फ़रवरी 2013

मेरा समाज और आंतक का पोषण

हैदराबाद में हुए हालिया धमाकों ने आतंकवाद और उसके रूपों पर एक नई बहस छेड़ दी है. इन धमाकों के पीछे मास्टर माइंड कौन है? या ये धमाके किस मानसिकता का परिणाम हैं इन मुद्दों पर तो खूब धमाल किया जाता है. धर्म, मजहब और सम्प्रदाय से जोड़ने के साथ पुलिस और सरकारों को भी खूब कोसा जाता है. लेकिन हम ये भूल जाते हैं की इन अलगावादियों को पनाह और पोषण देने वाला समाज हमारा ही है. देश में कहीं भी आतंकवादी घटनाएँ होती हैं तो समाज के एक तबके का इन घटनाओं को संरक्षण होता ही है. अपने तुच्छ फायदों के लिए आंतकियों को पनाह देने वालों की फेहरिस्त कम नहीं है. एक दूसरा सवाल आतंकियों के धर्म को लेकर उठाया जाता है, शायद ही कोई धर्म यूं कटने काटने की बात करता हो. लेकिन कुछ अलगाववादी अपने फायदे और सत्ता के लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार हैं. चाहे वो ओवैसी हो या फिर तोगडिया. ये बिना वजूद के लोग सिर्फ लोगों को भड़का कर दंगे और आंतक भडकाना जानते हैं. अफजल को फांसी पर देश में कई संगठन बौखला गये थे लेकिन आज जब हैदराबाद जल रहा है तो कहाँ वो लोग. अफजल जैसे आंतकी के मानवाधिकार आपको दिखते हैं लेकिन धमाकों में मरने वालों के अधिकारों से आप त्क्क्लुफ़ तक नहीं रखते दिखते हैं. हिन्दू या मुसलमान आतंकी ये आंतक की परिभाषा नहीं है. क्या पाकिस्तान में आतंकवादी घटनाएँ कम होती हैं? क्या पकिस्तान या कहीं और मुसलमान आतंकवाद से नहीं मर रहा है? शायद मुसलमान पाकिस्तान या अफगानिस्तान में सबसे ज्यादा असुरक्षित है. लेकिन ये भी सच है की ज्यादातर आतंकी मुसलमान के नाम से ही आतें हैं. ऐसा क्यूं है? इसके कारण जब तक धर्म की धुरी पर ढूंढें जायेंगें तब तक उत्तर नहीं मिलेगा. सच तो यह है की दुनिया की महाशक्तियां इस समस्या का हल नहीं चाहती हैं. ये आतंकवाद, दुनिया ने अपनी सरकारों की नाकामी को छुपाने का हथियार बना रखा है. आंतक के खौफ में दुनिया के कई देश हथियारों के सौदागर बने हैं और सारी दुनिया में दादागिरी दिखा रहें हैं. अफजल को फांसी पर इन देशों के मानवाधिकारी चीत्कार करते हैं लेकिन सारी दुनिया में अमेरिका की तानाशाही इन्हें नहीं दिखती है. हमारे देश आतंक का जो चेहरा अब दिख रहा है भले ही वो पाकिस्तान से आयातित मान भी लिया जाय तो उसका गोदाम तो देश में ही है और यहाँ जनता के समर्थन से ही फल फूल रहा है. यही जनता जब कुछ घट जाए तो सड़कों पर आती है लेकिन इन्हें पनाह भी देती है. ऐसा दोहरा आचरण क्यों?

(आशुतोष पाण्डेय)

शनिवार, 22 दिसंबर 2012

शीला की नैतिकता या नौटंकी: दिल्ली गैंगरेप


शीला दीक्षित: कैसे मिलाऊँ बलात्कार पीडिता से नजर? आखिरकार शीला दीक्षित ने मान ही लिया की नैतिकता उन्हें बलात्कार पीडिता से नजर मिलाने के काबिल नहीं मानती है। सच में उन्हें ऐसा ही सोचना चाहिए लेकिन ये सोच दिल से निकल आयी है या फिर अभी गुजरात में कांग्रेस के हश्र पर मानसिक कवायद है या फिर जनता का दबाव। क्योंकि, साथ ही शीला ने ये कहने से भी गुरेज नहीं किया है की दिल्ली की शासन व्यवस्था उनके हाथ नहीं है। शीला ये बात आप मनमोहन जी से क्यों नहीं कहती जब आप दिल्ली की जनता की सुरक्षा की जिम्मेदारी ले ही नहीं सकती हैं तो फिर मुख्यमंत्री क्यों बनी हैं? इतनी मजबूरी में सत्ता कैसी? अगर वास्तव में आपको अफ़सोस है तो इस्तीफा क्यों नहीं दे देती हैं। वैसे नेताओं के टंटे सालों पुराने हैं लेकिन फिर भी जनता इन में फंसती ही है। इस बार भी शीला की मनोवैज्ञानिक पुड़िया शायद चल जाए। चंद दिनों में लोग इस घटना को भूल जायेंगें और शीला जी अपनी नैतिकता को। फिर इन्तजार करना पड़ेगा किसी और हादसे का कि जनता चीत्कार करे और नेता अफ़सोस। हमारे गृह मंत्री शिंदे साहिब ने भी कहा था कि वे भी बेटियों के बाप हैं। लेकिन अब कैसे याद आया उन्हें की वे बेटियों के बाप हैं जिस देश में रोज हजारों महिलाओं के साथ बलात्कार होता है उनकी अस्मत लूटी जाती है तो... शीला और शिंदे को याद हादसों के बाद ही आती है।  क्या जनता इस नैतिकता की दुहाई पर शीला दीक्षित से ये नहीं पूछेगी की आखिर कब तक हम ऐसे जियेंगें?
(आशुतोष पाण्डेय) 






गुरुवार, 20 दिसंबर 2012

इनसाईट स्टोरी: अन्ना की बलात्कार को मौन स्वीकृति

इनसाईट स्टोरी: अन्ना की बलात्कार को मौन स्वीकृति: कुछ समय पहले तक देश में अन्ना हर मुद्दे पर मुखर दिखे थे लेकिन अब लगता है एक लम्बे वनवास में किसी जंगल में चले गये हैं, एक ऐसी शख्शियत ...

इनसाईट स्टोरी: बीजेपी कहीं मोदी को भी ना ले डूबे...

इनसाईट स्टोरी: बीजेपी कहीं मोदी को भी ना ले डूबे...: गुजरात के चुनाव सम्पन्न तो हो गये और साथ ही साथ मोदी की वापसी के संकेत भी मीडिया ने देने शुरू कर दिए हैं. इस बार मीडिया मोदी को लेकर ज्या...

इनसाईट स्टोरी: बीजेपी कहीं मोदी को भी ना ले डूबे...

इनसाईट स्टोरी: बीजेपी कहीं मोदी को भी ना ले डूबे...: गुजरात के चुनाव सम्पन्न तो हो गये और साथ ही साथ मोदी की वापसी के संकेत भी मीडिया ने देने शुरू कर दिए हैं. इस बार मीडिया मोदी को लेकर ज्या...

अन्ना की बलात्कार को मौन स्वीकृति

कुछ समय पहले तक देश में अन्ना हर मुद्दे पर मुखर दिखे थे लेकिन अब लगता है एक लम्बे वनवास में किसी जंगल में चले गये हैं, एक ऐसी शख्शियत जिसे हर दशा में सरकार और नौकरशाहों में खोट दिखता था आज जब दिल्ली एक बलात्कार के लिए चीत्कार रहा है अन्ना कहाँ हैं... किसी को पता नहीं। सच और न्याय के इस बड़े पैरोकार को आज क्या हो गया जो वो चुप है या फिर यहाँ कोई बड़ा स्पांसर नहीं मिल रहा है. ये अन्ना टाईप सेलिब्रेटी हर समय किसी बहकाने वाले को खोजते रहते हैं। देश के साथ धोखा करने वालों को ये देश पूजता है, भारतीय मानस हर बार ठगा जाता है। कभी नेताओं द्वारा और कभी अन्ना जैसे षड्यंत्रकारियों द्वारा देश की लोकतांत्रिक  आत्मा के साथ बलात्कार करने वाला ये शख्स आज बलात्कारियों के कृत्यों पर चुप है आखिर क्यों? क्योंकि  इसे कोई फर्क पड़ता है। अगर यहाँ भी कोई प्रायोजक मिल जाए तो अन्ना कल ही धरने पर होंगें। धत अन्ना एक बेटी की अस्मत लूटी गयी और तुम्हारी चुप्पी.....कल तक इस देश ने आपको आदर्श माना था लेकिन आप तो इन नेताओं से भी बदतर निकले इन्हें कम से कम संवेदना को शब्द तो मिले। अगर अब भी ये देश ऐसे छद्म अन्ना की बाँट जोह रहा है तो देश बिक जाएगा और अन्ना प्रायोजक तलाशता रहेगा। ये देश अब उठ अपने बल बूते लड़ने की कुव्वत कर अन्ना को कोई फर्क नहीं पड़ता की तेरी माँ या बहिन की अस्मत लूटी जाय। 

सोमवार, 17 दिसंबर 2012

बीजेपी कहीं मोदी को भी ना ले डूबे...


narendra-modiगुजरात के चुनाव सम्पन्न तो हो गये और साथ ही साथ मोदी की वापसी के संकेत भी मीडिया ने देने शुरू कर दिए हैं. इस बार मीडिया मोदी को लेकर ज्यादा उत्साहित दिखता है. मोदी की वापसी कई मायनों में एतिहासिक होगी इसका सबसे बड़ा असर खुद बीजेपी पर पड़ना तय है. बीजेपी के पुराने दिग्गज नेताओं की पूरी जमात मोदी के लौट आने के बाद अपना वजूद खो देगी और पार्टी के बड़ा हिस्सा कई भागों में बंट जाएगा. इससे मोदी को उस सफ़र में नुकसान होगा जिसका ख्वाब उन्होंने देखा है. केशुभाई, आडवानी जैसे नेता मोदी के साथ आ जाएँ लगता नहीं है और अन्य सेक्यूलर दलों का समर्थन भी मिलना मोदी को संभव नहीं होगा जिसमें बिहार के नितीश कुमार भी शामिल हैं. ऐसे में फिर मोदी को गुजरात में ही अपनी ताकत को खोना पड़ सकता है. बीजेपी का इतिहास रहा है की इस पार्टी ने लम्बे समय तक किसी व्यक्ति विशेष में अपनी आस्था नहीं दिखाई है. ऐसे में मोदी के संग पार्टी के सिपहसालार कितने दिन टिक पायेंगें कहा नहीं जा सकता है. एक समय में दिल्ली को याद करें तो मदन लाल खुराना, साहिब सिंह और सुषमा स्वराज इन तीनों को लड़ा कर बीजेपी लंबे वनवास में चली गयी थी. इस बार फिर यही मोदी के साथ दोहराया जाय तो कोई नई बात तो नहीं होगी. देखना तो ये है की मोदी कब तक बीजेपी के लिए ख़ास बने रहते हैं. 

सोमवार, 22 अक्टूबर 2012

आम आदमी की टोपी के साथ केजरीवाल

शीला दीक्षित अरविन्द केजरीवाल को मान हानि का नोटिस भेज चुकी हैं लेकिन केजरीवाल ने कहा है जब तक शीला का यही रवैया रहेगा तब तक वे उनकी मानहानि करते ही रहेंगे. केजरीवाल को अपने वक्तव्य पर कोई अफ़सोस है, होना भी नहीं चाहिए क्योंकि सच को कहने में अफ़सोस क्यों किया जाय? दूसरी खबर जो आज नुमाया हुयी है की बिजली के नये स्लैबों में कुछ राहत दी गयी है. ये राहत भी ऐसी है की क्या कहें शब्दों का अकाल पड़ गया है. वाड्रा साहब और बेगम खुर्शीद के साथ नितिन जी पोल खोल केजरीवाल ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं कि इस समय  देश की राजनीति में सब लुटेरे हैं. असल में केजरीवाल के इन खुलासों ने देश के सामने राजनैतिक निर्वात की स्थिति पैदा कर दी है. लेकिन केजरीवाल के इस आन्दोलन के साथ भी कई सवाल जुड़े हैं? जैसे उनके साथियों पर लगे आरोप, अन्ना और सिविल सोसायटी के अन्य सदस्यों  की दूरी. अन्ना जिस आन्दोलन को पूरे जोर शोर से चला रहे थे लेकिन राजनितिक विकल्प के सामने आने के बाद उनके लिए ये सब अछूत हो गया. जिस लोकपाल को अन्ना लाना चाहते थे उसे पास करवाने के लिए नितिन, खुर्शीद और पवार जैसे नेताओं के का समर्थन ही चाहिए और ये समर्थन क्यों देने लगे इनमें से कोई भी इतना बेवकूफ नहीं दिखता की अपनी रसद लाइन ही काट डाले. ऐसे में जो विकल्प बचता है वह केवल चुनाव के साथ संसद में दो तिहाई बहुमत के साथ पहुचने पर ही पूरा हो पायेगा. इस बात को तो अन्ना और किरण बेदी जानते ही होंगें लेकिन ऐन मौके पर अपने हाथ पीछे खीच वे क्या दिखाना चाह रहे थे. दरअसल अन्ना का आन्दोलन एक प्रायोजित कार्यक्रम ही था जिसमें कांग्रेसी नेताओं को बदनाम कर भाजपा को सीधा फायदा पहुंचाना ही था. लेकिन जब अरविन्द ने राजनितिक विकल्प पर सहमति दी तो अन्ना ने आन्दोलन को खत्म ही कर डाला. अब भी आम आदमी जिसके नाम की टोपी अरविन्द के सर पर है वही अरविन्द के साथ     जुड़ कर भी ठगा नहीं जाएगा इस बात की क्या गारंटी है? लेकिन अच्छा होगा यदि ये आन्दोलन आम आदमी को फिर से संसद और विधायिका के प्रति विश्वास करने का मौक़ा देगा.
और अरविन्द एक ख़ास बात आपके लिए ये जो जनता आज आपके साथ है और नेताओं से जवाब मांग रही है एक दिन उन्हीं नेताओं की जय जयकार करती थी लेकिन आज उन्हें उखाड़ने के लिए आप के साथ है. कल अगर आप भी उन्हीं नेताओं की कतार में खड़ें हो गये तो जनता आप को भी यही सबक देगी.

शनिवार, 4 अगस्त 2012

अन्ना की कशीदाकारी: जनता के साथ धोखा


तू भी अन्ना, मैं भी अन्ना.... जैसे नारों के फेर में पड़ कर लाखों भारतवासियों की भावनाओं के साथ लंबा खिलवाड़ किया गया. राजनीति को गाली और नेताओं को चोर बताने वाली टीम अन्ना जिस छद्म आंदोलन का सहारा लेकर संसद और लोकतंत्र को गुमराह कर रहे थी उसका हस्र तो होना ही था लेकिन देश और उसकी भावनाओं से जो खिलवाड़ किया गया वह आश्चर्यजनक है. लोकतंत्र का जो दुरूपयोग अन्ना और उनकी सिविल सोसायटी ने किया वैसा इससे पूर्व कहीं नहीं देखा गया. भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़ी अन्ना की टीम खुद जनता के साथ एक बड़ा खेल खेल गयी. जनता की मेहनत की कमाई से चलाया गया ये आंदोलन टीम अन्ना की लिप्सा की भेंट चढ गया. अन्ना जिस भावना को लेकर इस आंदोलन का आजाग कर चुके थे उसका विषय था जन लोकपाल लेकिन जन लोकपाल से ये आंदोलन कुछ मंत्रियों के खिलाफ व्यक्तिगत बयान बाजी तक सिमट गया और अंत होने तक शुचिता की तमाम सीमायें लांघकर ये आंदोलन सरकार, मीडिया और व्यक्तिगत आक्षेप का अखाड़ा बन गया. जब ये आंदोलन चला था तो लोगों को आस जगी थी की भ्रष्टाचार के खिलाफ ये लड़ाई किसी मुकाम तक पहुचेगी लेकिन आंदोलन के साथ ही टीम अन्ना कई प्रकार की व्यक्तिगत अपेक्षाओं की शिकार होती गयी. कभी आर एस एस और भाजपा का गुणगान करने और कभी अपने ही सदस्यों पर जासूसी का आरोप लगाकर इस समूह ने खुद  का राजनितिक दलदल में फंसा होना साबित कर दिया था. जंतर मंतर और सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर सेलिब्रिटी के साथ नाम जोड़ने की तमन्ना रखने वालों से ये आंदोलन आगे नहीं जा पाया. इंडिया अगेंस्ट करप्शन के कार्यकर्ताओं के द्वारा तमाम मुद्दों पर सरकारी कार्यालयों पर छापेमारी के अभियान तक चलाए गए, लेकिन ना तो इसके बाद कहीं कुछ कार्रवाई की गई और ना ही कोई आंदोंलन इन अनियमिताओं के खिलाफ किया गया, तो ये सब क्यों किया गया इसका सीधा जवाब किसी के पास नहीं है. इसके बाद इन लोगों ने अपने व्यक्तिगत कार्य सिद्ध करवाए. गैस सिलेंडरों की कालाबाजारी के खिलाफ आंदोलन करने वाले इंडिया अगेंस्ट करप्शन के सदस्यों के द्वारा ठेकेदार से उनके घर प्राथमिकता के तौर पर सिलेंडर की डिलीवरी करने पर ये आंदोलन यहीं सिमट गया. कई ठेके और अन्य काम भी इन लोगों ने ब्लैकमेल कर करवा लिए. क्या जब ये लोग अन्ना पार्टी के सांसद या विधायक होंगें तो इनका रवैया क्या होगा? ये सोचने वाली बात है. भ्रष्टाचार हटना चाहिए लेकिन पुराने भ्रष्टाचार को हटाने के लिए नए भ्रष्टाचारियों की टीम खड़ी करना कहाँ की सोच है? सत्याग्रह जिसकी तुलना गांधी के सत्याग्रह से की जा रही थी और अन्ना को गांधी कह कर प्रचारित किया जा रहा था इस गांधी के पास ना तो लोकतंत्र का सम्मान करने का माद्दा है और ना ही वो सोच. कहने को गांधीवादी हों लेकिन अन्ना इस आंदोलन में तो प्रोफेशनल ही लगे हर घटना के साथ बेलेंस सीट बना कर आंदोलन को चलाया जा रहा था. भीड़ का गणित तक लगाया गया, पूरे कार्पोरेट तमाशे किये गए, डैमेज कंट्रोल और विज्ञापनों का सहारा लिया गया. गांधी जी ने वैचारिक हिंसा का सहारा कभी नहीं लिया, व्यक्तिगत आक्षेप के लिए उनके दर्शन में कोई जगह नहीं थी, लेकिन अन्ना का आंदोलन तो था ही वैचारिक हिंसा का आंदोलन. गांधी कहलवा लेना आसान है लेकिन गांधी बनना काफी कठिन है. टोपी पहन गांधी बन देश से खिलवाड तो देशद्रोह की श्रेणी में आना चाहिए और इसके लिए एक सजा मुकरर होनी चाहिए.
(आशुतोष पाण्डेय)

मंगलवार, 10 जुलाई 2012

तन्हाई में हो तो मुझसे दिल की बातें करें


मुझसे दोस्ती करोगे! तन्हाइयों में हमसे बातें करें... जैसे सन्देश आपको अपने मोबाइलों पर रोज मिलते होंगें और यदि कभी आपने इन नम्बरों पर फोन किया होगा तो पता चला होगा कि आप को चूना लग चुका है. ऐसे सैकड़ों सन्देश मोबाइल सर्विस प्रोवाइडर कंपनियों द्वारा रोज उपभोक्ताओं को भेजे जातें हैं और रोज लाखों रूपये ये कंपनियां इन फर्जी काल के जरिये करवा रहीं हैं. हद तो यह है कि ये कंपनियां कुछ लड़कियों को बिठा कर अश्लील बातें करवा रहीं हैं और ये धंधा खुले आम चल रहा है. इनसाईट स्टोरी ने एक ऐसे ही सन्देश में दिए गए नंबर पर जब काल कर बात की तो पता चला की कुछ लडकियां अपने फर्जी नामों से बात करती हैं और बात करने वालों को अश्लील बातें करने के लिए उकसाती हैं. कई बार ऐसी काल्स में फंसा कर बाद में ब्लैकमेलिंग और जिस्म फरोशी का काम भी किया जा रहा है. उपभोक्ता इनके चक्कर में फंस कर काफी देर तक बातें करतें हैं. इस प्रकार ये सर्विस प्रोवाइडर कंपनियां प्रतिदिन मोटी कमाई कर रही हैं. इस बारे में जब किसी सर्विस प्रोवाइडर के कस्टमर केयर में बात की जाती है तो वे  ऐसे किसी सन्देश के उनके नेटवर्क से आये होने से मना कर देतें हैं. डी एन डी (डू नाट डिस्टर्ब) सेवा के चालू होने के बाद भी ये सन्देश उपभोक्ता के मोबाइल तक पहुंच ही जातें हैं. ये सब कैसे होता है समझ से परे है और इन संदेशों का रिकार्ड होने  से ये कंपनियां साफ़ मना क़र देती हैं. मोबाइल ही नहीं समाचार पत्रों में भी ऐसे कई विज्ञापन भरें होते हैं जिनमें दोस्त बना फोन पर बात करवाई जाती है. ये विज्ञापन पहले महानगरों से छपते थे लेकिन अब ऐसे कई क्लब जो फोन पर दोस्ती करवातें हैं छोटे शहरों में भी मिल जायेंगें. यहाँ दोस्ती के नाम पर खुला जिस्म फरोशी का धंधा भी चलाया जाता है. इन मोबाइल कंपनियों और दोस्ती के क्लबों के लिए कोई नियम क़ानून भी नहीं हैं. इस प्रकार के धंधों के जाल में फंसने वाले भी इसकी शिकायत नहीं करना चाहतें हैं. बकायदा पुलिस और राजनीतिक संरक्षण भी इन्हें प्राप्त है. तन्हाई में हो तो मुझसे दिल की बातें करें जैसे संदेशों से सावधान कहीं आप किसी मुसीबत में ना फंस जाएँ. 



(इनसाईट स्टोरी टीम)

शनिवार, 7 जुलाई 2012

आपका मोबाइल फोन हो सकता है हैक

ओह ये क्या मैंने मोबाइल का इस्तेमाल नहीं किया और मेरे पैसे कट गए ऐसी समस्या से मोबाइल रखने वाले रोज दो चार होते ही रहतें हैं. यदि आपको लगता है कि आपके मोबाइल फोन का बिल ज्यादा आ रहा है या पैसा ज्यादा कट रहे है तो तुरंत सावधान होने की जरूरत है क्योंकि आप शैतानी सॉफ्टवेयर मालवेयर के शिकार हो सकते हैं. अधिकाँशत: लोग ये सोचते हैं कि कम्प्यूटर पर काम करते वक्त ही वायरस या फिर मालवेयर के शिकार होते हैं तो वे लोग अपनी इस सोच को बदल लें क्योंकि आईटी विशेषज्ञों और टेलीकॉम क्षेत्र से जुड़े जानकारों के मुताबिक देश में वे मोबाइल फोन उपभोक्ता मालवेयर के शिकार हो रहे हैं जो मोबाइल से इंटरनेट का ज्यादा इस्तेमाल कर रहे हैं। खासकर फेसबुक, ऑरकुट और ट्विटर का इस्तेमाल करने वाले ज्यादातर मोबाइल वायरस के शिकार हो रहे हैँ।

मालवेयर क्या है? मालवेयर एक ऐसा सॉफ्टवेयर प्रोग्राम है जो आपकी इजाजत के वगैर आपके मोबाइल फोन पर जाकर बैठ जाते हैं और कुछ परिस्थितियों में आपके डॉटा को आपकी इजाजत के बगैर मोबाइल के बाहर भेजते हैं। कई बार मालवेयर की वजह से आपके मोबाइल फोन का बिल बढ़ जाता है और अनावश्यक कॉल आती है.
एक आईटी विशेषज्ञ के अनुसार ग्राहकों को कभी +92 जैसे कुछ अजीबोगरीब नंबरों से फोन कॉल आने की यही वजह है कि फोन मालवेयर का शिकार हो गया है. कॉल उठाने पर फोन से पैसे कट जाते है. यही नहीं यह मालवेयर इतने ताकतवर होते है कि कई मामलों में देखा गया है कि मालवेयर हमलावर आपके फोन पर कब्जा कर कंपनी की बिलिंग प्रणाली से जुड़कर आपके मोबाइल फोन का बिल भी बढ़ा देते है. एंटी वायरस सॉफ्टवेयर बनाने वाली कंपनी एवीजी टेक्नोलॉजी के सर्वेक्षण में भी मोबाइल फोन पर सबसे ज्यादा मालवेयर हमलों का खुलासा हुआ है. मालवेयर से संक्रमित मोबाइल फोन का ग्राहक जब सोशल मीडिया पर जाता है और अपनी प्रोफाइल खोलने के लिए पासवर्ड का इस्तेमाल करता है तो मालवेयर तुरंत आपका पासवर्ड चुराकर आपसे जुड़ी सारी जानकारियां चुरा लेते है. अगर आपको अपने फोन की सुरक्षा की परवाह नहीं की तो संभावना है कि आपको नुकसान हो सकता है। आज के समय में सिर्फ कंप्यूटर में ही नहीं बल्कि मोबाइल फोन में भी एंटी वायरस सॉफ्टवेयर प्रयोग करने की जरूरत है. ब्लू टूथ का इस्तेमाल करने से भी वायरस का शिकार हो सकते हैं ब्लूटूथ से सबसे ज्यादा संक्रमण होता है. इसके अलावा फेसबुक पर भी फर्जी प्रोफाइल के जरिए मालवेयर हमले देखने को मिल रहे हैं। इसमें लुभावने ऑफर देकर आपको जाल में फंसाया जाता है. लुभावने आफरों के जरिए भेजे गए मालवेयर सॉफ्टवेयर में इतनी क्षमता होती है कि वह आपके सिम कार्ड को अपने मनमुताबिक काम में लेकर इसका दुरुपयोग कर सकते हैं. एंड्रायड क्षमता युक्त फोनों में एंड्रायड मार्केट से मुफ्त में एंटी वायरस और एंटी मालवेयर साफ्टवेयर डाउनलोड कर सकते हैं. 
(आशुतोष पाण्डेय)

रविवार, 3 जून 2012

कुत्ते की 1800 किमी की यात्रा


कभी जानवर भी मनुष्य से बड़े कारनामे कर इंसान के लिए प्रेरणा बन जाता है. चीन में एक आवारा कुत्ते ने तिब्बत की यात्रा पर निकले साइकिल सवारों के एक समूह का पीछा किया और उनके साथ-साथ 20 दिन में 1,800 किमी से अधिक दूरी तय कर ली. शियाओसा नामक इस कुत्ते ने हर दिन 50 से 60 किमी की दूरी तय की और पूरी यात्रा के दौरान कभी पीछे नहीं गया. सूत्रों के अनुसार, यह कुत्ता 4,000 मीटर ऊंचे 12 से अधिक पहाड़ों पर चढ़ा और उसे खराब मौसम का भी सामना करना पड़ा. एक साइकिल सवार शियाओ योंग ने कहा कि पूरे रास्ते यह कुत्ता उन्हें प्रोत्साहित करता रहा. अब योंग इस कुत्ते को सेंट्रल हुबेई प्रांत स्थित अपने गृह नगर ले जाकर अपने साथ रखना चाह रही है. 

ऐश और आराध्या

कॉन फिल्म फेस्टिवल २०१२ में हिस्सा ले वापस भारत लौटती ऐश्वर्या राय बच्चन और बेटी आराध्या . 

शनिवार, 2 जून 2012

इनसाईट स्टोरी: कैटरीना इन एक्शन

इनसाईट स्टोरी: कैटरीना इन एक्शन: कैटरीना अब अपनी रोमांटिक इमेज को छोड़ एक्शन क्वीन बनने जा रही हैं. पहले सल्लू के साथ 'एक था टाइगर' में और फिर धूम-३ में भी एक्शन करने जा रह...

कैटरीना इन एक्शन

कैटरीना अब अपनी रोमांटिक इमेज को छोड़ एक्शन क्वीन बनने जा रही हैं. पहले सल्लू के साथ 'एक था टाइगर' में और फिर धूम-३ में भी एक्शन करने जा रहीं हैं. वह आजकल थाईलैंड में 'एक था टाइगर' की शूटिंग में व्यस्त हैं, दिन में शूटिंग के बाद वे रात को धूम३ के एक्शन सीन की तैयारियां करती रहती हैं. इस व्यस्त शेड्यूल के चलते उनकी नींद भी पूरी नहीं हो पा रही है. धूम-३ में वे आमिरखान के साथ काम कर रहीं हैं. धूम३ के एक्शन सीन करने के लिए आदित्य चोपड़ा ने  तीन बाडी ट्रेनर नियुक्त किये हैं. देखना है कि रोमांटिक इमेज वाली कैटरीना क्या एक्शन कर पाती है. अभी थोड़ा इन्तजार करना पडेगा. 

मनमोहन कहें अब बख्श दो प्रणव


मनमोहन सिंह अब वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी से छुटकारा चाहतें हैं. वे चाहते हैं कि प्रणव बाबू का नाम जल्द ही यूपीए के द्वारा राष्ट्रपति के उम्मीदवार के रूप में घोषित किया जाय. आर्थिक मोर्चों पर हर जगह विफल रहने वाले प्रणव मुखर्जी के खिलाफ सीधे कोई कदम उठाना मनमोहन सिंह के लिए संभव नहीं दिखता है. भले ही कांग्रेस अगला चुनाव मनमोहन के नेतृत्व में लड़ने का लाख दावा करें लेकिन २०१४ में मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बनने वाले नहीं हैं, चाहे कांग्रेस की सरकार ही क्यों ना बने. अपने बचे हुए कार्यकाल के लिए मनमोहन सिंह खुद वित्त मंत्रालय की कमान संभालना चाहते हैं और आर्थिक असफलताओं का दंश  झेल रही सरकार की इमेज सुधारना चाह रहें हैं.  वित्त मंत्री के रूप में मनमोहन सिंह का एक स्वर्णिम इतिहास रहा है. पीएमओ के सूत्रों के अनुसार प्रधानमंत्री रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर और अब इकनॉमिक अडवाइजरी काउंसिल के अध्यक्ष सी रंगराजन को वित्त मंत्रालय में मुख्य भूमिका देना चाह रहें हैं. ये खुलासा अंग्रेजी समाचार पत्र डीएनए की एक खबर में किया गया है. मनमोहन सिंह अगले दो सालों में कुछ कठिन और बड़े आर्थिक फैसले लेकर पुन: मनमोहनी अर्थशास्त्र की उपादेयता सिद्ध करना चाहते हैं. देखने वाली बात है कि पिछले कुछ समय से पीएमओ और वित्त मंत्रालय के बीच दूरियां बढनें की खबरें आम रहीं हैं क्योंकि एक वित्त मंत्री के रूप में प्रणव हर मोर्चे पर विफल ही रहें हैं लेकिन यूपीए के अंदर प्रणव का कद देख प्रधानमंत्री खुद किसी सार्वजनिक मंच पर उनका विरोध नहीं कर पा रहें हैं. अब वर्तमान आर्थिक संकट से निपटने के लिए वे रंगराजन को अपना जरनल बनाना चाहतें हैं. लेकिन यूपीए के घटक दलों के साथ नितीगत तालमेलों को देखते हुए तो ये संभव नहीं लगता है कि अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए उठाये गए ठोस क़दमों का समर्थन तृणमूल कांग्रेस या अन्य सहयोगी दल करेंगें.
    (आशुतोष पाण्डेय )





गुरुवार, 31 मई 2012

अन्ना की टीम ने बनाया संसदीय व्यवस्था का मजाक


नाम सिविल सोसायटी, काम लोकतंत्र और संसद का मजाक, कभी संसदीय व्यवस्था को गाली तो कभी देश के  संघीय ढ़ाचे के खिलाफ परिलक्षित मंशा. ये है अन्ना की टीम जो किसी भी गाली का प्रयोग कभी भी कहीं भी कभी  भी कहीं भी कर ले. प्रधानमंत्री को शिखंडी कह कर इस लोकतांत्रिक व्यवस्था का खुला मजाक उड़ाना फिर भी सिविल कहलवाना ये तो अन्ना और टीम का शगल ही लगता है, जिस भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना की टीम लड़ रही है, उसके लिए वो जनता के बीच जाने से क्यों गुरेज कर रही है... इस देश में संसदीय व्यवस्था है और संसद ही सर्वोच्च भी है. संसद में चुने जाने वाले वहाँ खुद नहीं पहुंचे हैं इस देश की जनता ने उन्हें वहाँ भेजा है. संसद को और उसके लोकतांत्रिक ढ़ाचे की यूं मजाक बनाना कहाँ तक उचित है... अन्ना जिस देश की जनता को लेकर ये तमाम आंदोलन खड़े कर रही है उसकी क्षमताओं पर विश्वास क्यों नहीं कर रही है. संसद और उसके नुमायांदों का फैसला जनता खुद कर लेगी और इससे पहले कई मौकों पर किया भी है. दरअसल अन्ना और उनके साथी राजनितिक लिप्सा के शिकार हैं और जनता के बीच सीधे जाने से डर कर देश को अस्थिर कर कमोबेश पाकिस्तान के जैसे हालात यहाँ बनाना चाहतें हैं. अगर ऐसा नहीं है तो टीम अन्ना खुद संसद में अपना बहुमत ले और फिर खुद को साबित करे. ये सच है कि सिविल सोसायटी के किसी भी सदस्य की संसद तक पहुँच जायें ये  हिम्मत नहीं दिखती है. खैर अंतिम फैसला तो जनता की अदालत में ही होगा लेकिन... क्या आज संसद की मर्यादा को भंग ना होनें दे ये जिम्मेदारी हमारी नहीं है... इस देश की जनता को सोचना होगा हम आज आदम युग में नहीं जी रहें हैं ये सभ्यता का युग है और यहाँ शुचिता बरकरार रखने की जिम्मेदारी हर नागरिक की है. टीम अन्ना के बयानों से आज हमारी संसदीय व्यवस्था जिस पर समूचे विश्व में हम छाती फूला के चलते थे आज लांछित हुयी है. 

बुधवार, 30 मई 2012

इनसाईट स्टोरी: खुदा जाने क्या होगा बहुगुणा का

इनसाईट स्टोरी: खुदा जाने क्या होगा बहुगुणा का: शह और मात के खेल में कब किसका मोहरा पिट जाए कहा नहीं जा सकता है, कमोबेश यही कुछ आजकल उत्तराखंड में चल रहा है. मुख्यमंत्री बहुगुणा के लिए...

खुदा जाने क्या होगा बहुगुणा का

शह और मात के खेल में कब किसका मोहरा पिट जाए कहा नहीं जा सकता है, कमोबेश यही कुछ आजकल उत्तराखंड में चल रहा है. मुख्यमंत्री बहुगुणा के लिए सितारगंज के भाजपा विधायक किरण मंडल से इस्तीफा दिला कर कांग्रेस ने सीट तो खाली करा ली लेकिन साथ ही मौक़ापरस्ती और जोड़-तोड़ की राजनिती को सिरपरस्ती करने का मौक़ा दे दिया. चूंकि किरण मंडल बंगाली समुदाय से आते हैं, जिनका प्रतिशत इस सीट पर २५ से भी ज्यादा है... इसी के चलते भाजपा ने उन्हें टिकट भी दिया था. सरकार ने यहाँ बंगालियों को जमीन पर भूमिधरी हक देने की बात कह कर जनहित में किरण मंडल के इस्तीफे को भुनाने की कोशिश की जरूर है लेकिन      इस सीट को खोने देने के हक में बीजेपी भी नहीं है... और पार्टी हाई कमान खुद इस सीट पर तवज्जो ले रहा है, आगामी तीन जून के मुख्यमंत्री के द्वारा खुद सितारगंज में ही अपने इस सीट से चुनाव लड़ने का खुलासा करने की योजना है. अभी तो शह और मात के इस खेल में कांग्रेस का पलड़ा भारी दिख रहा है लेकिन कब किसका कौन सा मोहरा कब और कौन पीट दे ये कहना राजनीती में संभव नहीं दिखता है. भाजपा एक बार फिर इस सीट पर बंगाली उम्मीदवार को उतार कर बहुगुणा की मुसीबतों को कई गुना बढ़ा सकती है और खुद कांग्रेस का एक गुट भी बहुगुणा के खिलाफ लामबंद हो सकता है. यहाँ एक बाहरी व्यक्ति को चुनाव मैदान में उतारने को भी मुद्दा बनाया जा सकता है. ऐसा कर मुख्यमंत्री ना बन पाने की खुर्नस भी निकाली जा सकती है. शायद कांग्रेस का ये गुट बसपा और समाजवादी उम्मीदवार को भी इस सीट पर ना उतरने के लिए तैयार कर सकता है. अगर ऐसा हो गया तो बहुगुणा खुद के बुने जाल में फंस सकतें हैं.
(आशुतोष पाण्डेय) 


मंगलवार, 29 मई 2012

बालिकाएं फिर अव्वल: उत्तराखंड बोर्ड का परीक्षा परिणाम

उत्तराखंड विद्यालयी शिक्षा परिषद की हाईस्कूल एवं इंटरमीडिएट परीक्षा में इस बार छात्राओं ने बाजी मारी है। हाईस्कूल का परीक्षा परिणाम 70.26 % और इंटरमीडिएट का परीक्षा परिणाम 78.49% रहा है। हाईस्कूल में 76.10 प्रतिशत बालिकाओं और 64.97 प्रतिशत बालकों ने सफलता पाई है। जबकि इंटरमीडिएट में 83.44 प्रतिशत बालिका एवं 73.84 बालकों ने सफलता हासिल की है।
इंटरमीडिएट में पूर्णानंद इंटर कालेज जसपुर की इरम सैफी ने 92.40 प्रतिशत हासिल कर राज्य में प्रथम स्थान प्राप्त किया है जबकि हाईस्कूल में जीआईसी रामनगर के समीर रियाज 95.80 अंकों के साथ टॉपर रहे हैं। अन्य दो टॉपरों में इंटर में शुभम गुप्ता (विद्या मंदिर बाबूगढ़, विकासनगर, देहरादून) 91.80 प्रतिशत अंक लेकर दूसरे और संजीव कुमार (आरकेएम विद्या मंदिर इंटर कालेज बाजपुर) 90.20 प्रतिशत अंकों के साथ तीसरे स्थान पर रहे हैं। हाईस्कूल में हरगोविंद सुयाल विद्या मंदिर हल्द्वानी की अदिति मंमगाई 94.60 प्रतिशत अंक लेकर दूसरे और विद्या मंदिर मुनस्यारी के सिद्धार्थ कुमार ने 93.80 प्रतिशत अंकों के साथ तीसरा स्थान पाया है। बोर्ड सचिव डॉक्टर डीके मथेला के मुताबिक सभापति के रूप में माध्यमिक शिक्षा निदेशक चंद्र सिंह ग्वाल ने परीक्षाफल घोषित किया। प्रदेश में 12 से 30 मार्च तक 1226 केंद्रों पर हाईस्कूल, इंटरमीडिएट बोर्ड परीक्षा हुई थी। इसमें पंजीकृत 3.16 लाख में से करीब आठ हजार परीक्षार्थी अनुपस्थित रहे थे। इन केंद्रों में से 188 केंद्र संवेदनशील थे। मूल्यांकन कार्य 10 से 25 अप्रैल तक हुआ था। एजुकेशन मंत्रा की निदेशक श्रीमती सुषमा पाण्डेय ने सभी छात्र छात्राओं को उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए बधाई दी है. उन्होंने कहा उत्तराखंड बोर्ड के विद्यार्थियों के द्वारा भी अब काफी हद तक उच्चतम प्रदर्शन किया जा रहा है. उन्होंने कहा कि हिन्दी माध्यम के विद्यार्थियों के द्वारा 96 फीसदी तक नंबर लाने के कारण अब विद्यार्थियों का रुझान इस और बढ़ेगा.
उत्तराखंड  10 वीं और 12 वीं का रिजल्ट जानने के लिए यहां क्लिक करें।

रविवार, 27 मई 2012

अधिकारी और कर्मचारी ही लगा रहें हैं विभाग का पलीता

इस साल भीषण गर्मी और देशव्यापी बिजली कटौती से जीना दूभर हो रहा है. लेकिन बिजली चोरी भी खुलेआम चल रही है. उत्तराखंड के रुद्रपुर शहर में बिजली चोरी का अपना एक रिकार्ड है. यहाँ विद्युत वितरण की जिम्मेदारी उत्तराखंड पावर कार्पोरेशन के पास है. जिन्हें जिम्मेदार बनाया गया है वे ही इस चोरी में शामिल हो विभाग को चूना लगा रहें हैं. यहाँ आलम ये है कि बड़ी संख्या में उपभोक्ता किसी ना किसी रूप में चोरी में शामिल हैं. इसमें पोल से सीधे कटिया डालकर, मीटर के साथ छेड़खानी कर, बाईपास करवा या कनेक्शन लेने के तीन सालों बाद भी बिना मीटर के बिजली जला रहें हैं. ये सब व्यापक स्तर पर हो रहा है, एक ही कालोनी में कई घर ऐसे हैं जहां ये सब चल रहा है. अधिकारी और कर्मचारी इस बारे में कुछ कहने की स्थिति में नहीं हैं... जब भी इस बाबत कुछ पूछा जाता है तो सब ठीक किया जा रहा कहकर पल्ला झाड़ लिया जाता है। वास्तविकता तो यह है की कर्मचारियों और अधिकारियों मिलीभगत के बिना इतने व्यापक स्तर पर चोरी नहीं की जा सकती है। यदि कहीं किसी व्यक्ति के द्वारा ऐसी शिकायत की भी जाती है तो अधिकारी कहीं कोई कार्रवाई नहीं करते दिखते हैं. इस प्रकार घाटे में चल रहे यूपीसीएल को प्रति माह करोड़ों के राजस्व की हानि हो रही है. अब यूपीसीएल चोरी पकडवाने वाले व्यक्ति या संस्था को प्रोत्साहन राशि देने की बात भी कह रहा है (पढ़िए कार्यालय ज्ञाप, प्रबंध निदेशक, उत्तराखंड पावर कारर्पोरेशन), लेकिन जब हमाम में सभी नंगे हों तो इस प्रकार की योजनायें महज खानापूर्ति ही कही जा सकती हैं. ये कहानी कमोबेश सारे उत्तराखंड की है. हमारी टीम ने कई उपभोक्ताओं से बात की जो अवैध तरीके से बिजली जला रहे थे. तो उनका जवाब था कि हम बकायदा हर महीने पैसा दे रहें हैं तो फिर चोरी कैसी? जब उनसे पूछा गया कि आप मीटर क्यों नहीं लगवा लेते हैं तो उनका जवाब था हम कई बार कर्मचारियों को पैसा दे चुके हैं वो मीटर लगा ही नहीं रहें हैं. अगर ये सब सच है तो स्थिति काफी दयनीय है और यूपीसीएल को तुरंत कड़े कदम उठाने ही पड़ेंगें. यदि सही तरीके से विद्युत् वितरण किया जाय और चोरी को पूर्ण तया रोक दिया जाय तो निश्चित तौर पर यूपीसीएल को बड़ा राजस्व प्राप्त होगा और बिजली की कमी से जूझ रहे उपभोक्ताओं को भी राहत मिलेगी.

(इनसाईट स्टोरी टीम)
उधमसिंह नगर

बुधवार, 18 अप्रैल 2012

Check out बोले निर्मल बाबा की जय « इनसाईट स्टोरी

Check out बोले निर्मल बाबा की जय « इनसाईट स्टोरी

बोले निर्मल बाबा की जय


आज निर्मल बाबा को लेकर हल्ला मचा हुआ है... कल तक बाबा का गुणगान करने वाले चैनल और मीडिया आज उन्हें फ्राड बता रहें हैं और कल तक उनकी भक्ति करने वाले आज पुलिस  स्टेशन में जाकर कार्यवाही की मांग कर रहें हैं. ये पहला मौक़ा नहीं जबकि किसी बाबा के खिलाफ ऐसी शिकायतें मिल रहीं हैं, इससे पहले भी कई बार ऐसा होता रहा है. दरअसल ये भारतीय जनमानस की कमजोरी है कि पहले बिना सोचे समझें किसी को सर आखों पर बिठा लेता है और उतनी ही जल्दी किसी के खिलाफ आंदोलनरत भी हो जाता है. एक नट की तरह कभी काले पर्स को खरीदवाने वाले बाबा या कभी गोलगप्पे या भुट्टा खाने की उल-जलूल सलाह देने वाले बाबा के पास अरबों की संपत्ति कैसे इकठ्ठी हुयी ये शोध का विषय है, जब “इनसाईट स्टोरी” ने बाबा के भक्तों से इस अंध भक्ति का कारण जानना चाहा तो ज्यादातर  लोगों ने बताया कि उन्हें उनके किसी जानने वाले ने बाबा के चमत्कारों के बारे में बताया और फिर टीवी चैनलों पर लगातार निर्मल बाबा के चमत्कारों की चर्चा ने उन्हें उनकी ओर आकृष्ट किया, इनमें से कई तो बाबा के लिए दश्वांश के रूप में हजारों रूपया भी भेज चुके हैं. क्या उनके जीवन में कुछ चमत्कार हुआ? इस पर लोगों की प्रतिक्रिया नकारात्मक ही थी, लेकिन कोई लाभ ना होने पर भी बाबा कि ख्याति कैसे बढ़ती गयी तो इस प्रश्न का उत्तर भी काफी दिलचस्प मिला दरअसल बाबा उनके कुछ एजेंट लगातार लोगों के बीच सन्देश देते रहें कि उनके द्वारा पूजा या दैनिक दिनचर्या में कुछ ना कुछ गडबडी की जा रही है , जैसे समोसे अकेले खाना, मंदिर के गुल्लक में मात्र सौ रूपये डालना. इस प्रकार कई मनगढंत  कहानियाँ सुनाकर लोगों को लूटने का सिलसिला जारी है. इस प्रकार मीडिया और बाबा के पेड एजेंटों के चलते बाबा की दुकान चल निकली है. गूगल पर आज निर्मल बाबा फ्राड के नाम से रोज हजारों सर्च किये जा रहें हैं और इतनी ही तादात में सोशल नेटवर्क साईट पर भी पोस्ट किये जा रहें हैं, फेसबुक पर बाबा के एजेंट भी सक्रिय हो गयें हैं जो बाबा के चमत्कार की कहानियाँ सुना रहें हैं और बाबा को अपना भगवान बता रहें हैं. ताजा खबरों के अनुसार अब बाबा अपने अकाउंट खाली कर चुके हैं. लोग कह रहें हैं कि बाबा  का बुरा वक्त शुरू हो गया है लेकिन बाबा इतना कमा चुके हैं कि उन्हें सारे धंदे बंद हो जाने पर भी कोई असर नहीं पड़ने वाला. यदि कोई नेता या बड़ा अधिकारी धोखाधड़ी करे तो तमाम हल्ला होता है सिविल सोसायटी के सदस्य उसके खिलाफ मोर्चा खोल देतें हैं, लेकिन निर्मल बाबा के खिलाफ अन्ना ने ना तो उनके समागम स्थल पर धरना देने की घोषणा की है ना ही केजरीवाल जैसे सिविल सोसायटी के सदस्य जो संसद की गरिमा को तो तार-तार कर सकतें हैं लेकिन निर्मल बाबा के खिलाफ एक भी शब्द उनके मुंह से ना निकलना क्या इस बात की ओर संकेत कर रहा है कि आने वाले समय में अन्ना टीम भी निर्मल बाबा के कारनामों की पुनरावृति करे. कई जगह पर अन्ना के नाम पर अधिकारियों और राजनेताओं को ब्लैक मेलिंग का काम भी किया जा रहा है. सिविल सोसायटी के नाम पर कई स्वयंभू अपना उल्लू सीधा कर रहें हैं. इस देश को लूटने के लिए हर कोई अपनी भूमिका में काम कर रहा है और देश लूट कर भी जय नाद कर रहा है. कहीं निर्मल बाबा की जय तो कहीं सोनिया की पूजा. संसद से लेकर न्यायपालिका और सेना तक सब जगह एक ही चीज कामन है वह है, भ्रष्टाचार. फिर भी भारत चल रहा है, इसीलिए कहा जाता है “मेरा भारत महान”. 

शुक्रवार, 30 दिसंबर 2011

अन्ना की मुहिम: उत्तराखंड में बीजेपी के खिलाफ

आखिरकार अन्ना और लोकपाल का तमाशा कहीं पहुँच नहीं पाया, ना ही सरकार और ना विपक्ष इसके लिए गंभीर था. एक सोची समझी साजिश की तरह ये सब किया गया. अन्ना को देखिये! जब पता चला की अब संसद में लोकपाल पिट जाएगा तो, आन्दोलन वापस ले लिया. वैसे भी इस बार अन्ना की जमात उनके लिए भीड़ नहीं जुटा पाई थी, जिसके चलते अन्ना को अहसास हो गया था की "काठ की हंडिया बार-बार चूल्हे पर नहीं चढती है" और एक ड्रामे के साथ आन्दोलन वापस ले लिया. ये वो ही अन्ना हैं जो कुछ दिनों पहले तक जनलोकपाल के लागू ना हो जाने तक आन्दोलन की चेतावनी दे चुके थे. अब क्या करें पांच राज्यों में चुनाव होने हैं? अन्ना टीम जिस गुप्त मिशन पर थी उसका ठीकरा अब कहीं उसी के सर ना फूटे बस इसी डर से ऐन वक्त आन्दोलन को वापस ले लिया. अब अन्ना कह रहें हैं की वे सरकार के खिलाफ चुनाव प्रचार करेंगें, वैसे उनके समर्थक अभी तक कर क्या रहे थे, किसी की समझ में नहीं आया. बस अन्ना को एक चुनावी आइकन बनना था वे बन गए. कुछ देर तक अपनी टीम के कुछ लोगों की लिप्सा के शिकार बने और बी जे पी के एजेंट.
खैर अब बात हो जाए अन्ना के चुनाव प्रचार की क्या अन्ना का विषवमन चुनावी गणित को बदलेगा? शुरूआत  कर रहें हैं उत्तराखंड से... यहाँ ७० विधान सभा सीटों के लिए चुनाव होने हैं और बीजेपी की सरकार काबिज है. जब हम मतदाता से लोकपाल के बारे में बात करतें हैं तो ८५ फीसदी लोग इसे वोट देने के लिए कोई ख़ास मुद्दा नहीं मानतें हैं. यहाँ भाजपा पहले ही लोकपाल को लागू कर चुकी है... और इसका खामियाजा भी जनता भुगतने लगी है, जो काम आम तौर पर अफसरशाही द्वारा आसानी से कर दिए जाते थे अब लोकपाल की डर से नहीं किये जा रहें हैं, सब कुछ दुरस्त करने के बाद ही फ़ाइल निपटाई जायेगी ये कह कर अफसर अपना पल्ला झाड रहें हैं, और आये दिन अन्ना के समर्थकों के द्वारा आफिस में काम काज का लेखा जोखा मांगें जाने से भी कई फाइलें प्रोसेस नहीं हो पा रहीं हैं. ऐसी स्थिति में अन्ना की मुहिम यहाँ काबिज बीजेपी सरकार के खिलाफ जा रही है. कई अधिकारी भी सरकार के खिलाफ अपनी भड़ास निकालने के लिए इस अचूक अस्त्र का इस्तेमाल कर सरकार के खिलाफ माहौल बना रहें हैं. कहा जा रहा है की नियमों को तांक पर रख कोई काम करेंगें तो लोकपाल द्वारा धर लिए जायेंगें. इसके बाद अन्ना यहाँ चुनाव प्रचार के लिए आयेंगें तो क्या होगा, ये एक सवाल है? वैसे अन्ना को अब चाहिए की जनता को गुमराह करना बंद करें और अपने एन जी ओ को चलायें, कुछ संसद विरोधी ताकतें उन्हें जरूर फायनेंस कर देंगीं.

मंगलवार, 27 दिसंबर 2011

उत्तराखंड के चुनाव: असमंजस


जिन पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं उनमें उत्तराखंड भी एक है, नये परिसीमन के तहत पहली बार विधान सभा चुनाव होंगें. इस बार के चुनाव कई मायनों में काफी दिलचस्प हो सकते हैं, वर्तमान में उत्तराखंड क्रांति दल और कुछ निर्दलियों के सहयोग से यहाँ भाजपा सत्ता सीन है लेकिन पिछले पाँच सालों में तीन तीन मुख्यमंत्रियों के हाथ में सत्ता देने के बाद भी भाजपा के लिए इन चुनावों की डगर आसान नहीं दिख रही है, दूसरी प्रमुख पार्टी कांग्रेस को देखें तो लगता है उसका बियावान भी उजड़ा ही है, अब ना तो कांग्रेस के पास नारायण दत्त तिवारी जैसा कोई चमत्कारी नेता है और ना ही लोकप्रियता. भाजपा और कांग्रेस दोनों ही भीतरघात की शिकार भी हैं. भाजपा जहाँ विकास के बजाय विनाश करने वाली पार्टी के रूप में यहाँ अपनी छवि बना पायी है, इसी बात को लेकर आम कार्यकर्ता काफी गुस्से में है. वैसे लोकपाल का बिल पास करवा मुख्यमंत्री खंडूरी कुछ आस लगा बैठे थे लेकिन नौकरशाहों के हाथ इस क़ानून की धज्जियां उड़ाने का पूरा इंतजाम किया जा चुका है, सरकार के इस फैसले से नौकरशाह खासे खफा दिख रहें हैं और इन चुनावों में कर्मचारी और अधिकारी वर्ग का गुस्सा सरकार को झेलना पड़ सकता है. कांग्रेस जहां एक और केंद्र में अब तक की सबसे अलोकप्रिय सरकार का दंश झेल रही है वहीं प्रदेश में नेतृत्व विहीनता के कारण एक निर्जीव दल के रूप में ही दिख रही है. अब एक नजर उत्तराखंड में इन चुनावों में भारी फेरबदल करने वाली बसपा की और, बसपा अपना ग्राफ जिस तेजी से बढ़ा रही है उसे देख लगता है की इन चुनावों के परिणामों के बाद सरकार के समीकरण बनाने और बिगाड़ने में बसपा मुख्य भूमिका में रहेगी.
अब बड़ा सवाल ये है चुनावों की इस वैतरणी में किसकी नैया पार लगेगी और किसकी डूब जायेगी? इस फैसले में अभी समय बाकी जब तक सभी दल अपने उम्मीदवार घोषित नहीं कर देते, कोई कयास लगना संभव नहीं है. एक मुद्दा जो इस बार काफी अहम हो सकता है वो क्षेत्रवाद का होगा, भाजपा के द्वारा गढ़वाल के विकास पर ज्यादा ध्यान दिया जाना, कुमाऊं की जनता को नागवार गुजर रहा है, भले ही कोई खुल कर इसके लिए सामने ना भी आये तो अन्दरखाने लामबंदी चल रही है. इससे पहले उत्तराखंड में ये देखने में नहीं आता था लेकिन इस बार सरकार की तुष्टिकरण की नीतियों के गलत संयोजन से ये स्थिति पैदा हुयी है. इसके अलावा पिछड़े वर्ग के वोटों का खुला ध्रुवीकरण बसपा की ओर दिख रहा है. उत्तराखंड क्रांतिदल जैसे छोटे दलों को इस बार हाशिये में ही रहना पड़ सकता है.
इनसाईट स्टोरी आपको लगातार जोड़ें रखेगी उत्तराखंड और अन्य राज्यों की चुनावी सरगर्मियों से. हमारी टीम विधानसभा स्तर पर चुनावी समीकरणों का आकलन कर रही है, आकलन के साथ सान्खिकीय विश्लेषण भी आपको मिलेंगें. अन्ना की मुहिम का उत्तराखंड के चुनावों पर क्या असर होगा आप पढेंगें कल...     
(इनसाईट स्टोरी टीम उत्तराखंड)

सोमवार, 10 अक्टूबर 2011

शुक्र ग्रह पर जीवन?

सौरमंडल के ग्रह शुक्र पर ओज़ोन की एक पतली परत है. यूरोपीय स्पेस एजेंसी के वीनस एक्सप्रेस क्राफ़्ट की सहायता से शोधकर्ता इस नतीजे पर पहुंचे हैं. यूरोपीय वैज्ञानिकों का कहना है कि ये ओजोन की परत पृथ्वी के मुक़ाबले सैंकड़ो गुना कम है. ये शोध इकारस नाम की पत्रिका में छपा है. अब तक सिर्फ़ पृथ्वी और मंगल ग्रह के वायुमंडल में ही ओज़ोन परत होने की बात पता थी. इस नई खोज से पृथ्वी के अलावा किसी अन्य ग्रह पर जीवन की संभावना खोज रहे खगोलशास्त्रियों को सहायता मिलेगी. यूरोपीय स्पेसक्राफ़्ट ने शुक्र ग्रह के वायुमंडल पर केंद्रित अध्ययन के दौरान ओज़ोन परत की खोज की है. इकारस पत्रिका में छपी इस रिपोर्ट के प्रमुख लेखक फ़्रांस के लेटमॉस रिसर्च सेंटर के फ़्रांक मॉन्मेसिन के अनुसार शुक्र पर ओज़ोन परत ग्रह की सतह से सौ किलोमीटर ऊपर स्थित है. ये पृथ्वी की तुलना में तीन गुनी दूरी है.


जानिये क्या होती है ओज़ोन परत?
ओज़ोन एक मोलेक्यूल (अणु) होता है जिसमें तीन ऑक्सीजन परमाणु होते हैं. ओजोन का निर्माण तब होता है जब सूर्य की रोशनी ग्रह के वायुमंडल में कार्बन डॉय-ऑक्साइड को तोड़ कर ऑक्सीजन परमाणुओं को जन्म देती है. पृथ्वी पर भी ओज़ोन का निर्माण इसी तरह होता है. ओज़ोन परत सूर्य की हानिकारक अल्ट्रा वायलेट किरणों को पृथ्वी तक पहुंचने से रोकती है. वीनस एक्सप्रेस मिशन के लिए यूरोपीय स्पेस एजेंसी के प्रोजेक्ट वैज्ञानिक हकान स्वेढेम ने बताया, “ओज़ोन परत के बारे में जानकारी से हमें शुक्र के वायुमंडल के विषय में बहुत अधिक जानकारी हासिल हुई है. इसके अलावा ये चट्टान वाले ग्रहों में मौलिक एकरुपता का एक और उदाहरण है.” कुछ वैज्ञानिक ये मानते हैं कि अगर किसी ग्रह के वायुमंडल में ऑक्सीजन, कार्बन और ओज़ोन मौजूद हैं तो ये वहां जीवन होने की संभावना अधिक होती है.
(इनसाईट स्टोरी)

बुधवार, 14 सितंबर 2011

पिता बने, सेक्स की इच्छा में आयी कमी

अमेरिका में किये गये एक शोध के अनुसार एक पुरुष के पिता बनने के बाद उसमें यौन उत्तेजना और आक्रामकता बढ़ाने वाले हार्मोन टेस्टोस्टेरोन में कमी आने लगती है. पाँच साल तक चले शोध में ये नतीजे सामने आए हैं. नॉर्थवेस्ट युनिवर्सिटी टीम के शोधकर्ताओं का कहना है कि पिता बनने के बाद पुरुष पारिवारिक हो जाते है, साथ ही उनका मानसिक भटकाव भी ख़त्म हो जाता है. टेस्टोस्टेरोन ही वो हार्मोन है जो न सिर्फ़ पुरूषों में काम भावना बढ़ाता है और उन्हें सहवास के लायक भी बनाता है. नेशनल ऐकेडमी ऑफ साइंस ने इस शोध के लिए 624 युवा पुरुषों पर परीक्षण किये. इन पर पिता बनने से पहले और पिता बनने के बाद दोनों ही स्थितियों का विश्लेषण किया गया. इसमें पता चला कि जैसे ही ये पिता बने इनके टेस्टोस्टेरोन हार्मोन के स्तर में गिरावट आ गई. इनमें भी विशेष रूप से उन पुरुषों में इस हार्मोन का स्तर ज़्यादा कम पाया गया जिनके पास एक महीने से कम उम्र का या नवजात शिशु था. सोसोइटी फॉर एन्डोक्रॉनोलॉजी के प्रोफ़ेसर एशले ग्रॉसमैन का कहना है कि इस शोध से पुरुषों के यौन व्यवहार और पिता होने के नाते शिशु की देखभाल के व्यवहार में अंतर पता चलता है. पहले में अधिक और दूसरे में कम टेस्टोस्टेरोन हार्मोन की ज़रूरत पड़ती है. फिलीपीन्स में मुख्य शोधकर्ता क्रिस्टोफर कुज़वा कहते हैं कि पितृत्व भाव और नवजात शिशु मनोवैज्ञानिक, शारीरिक और भावनात्मक लगाव की मांग करता है और इसी के चलते पुरुष का शरीर इन माँगों के अनुरूप ख़ुद को ढाल लेता है. शोधकर्ताओं का ये भी मानना है कि टेस्टोस्टेरोन का कम स्तर संभवत: पुरूषों की गंभीर बीमारियों के ख़तरे से भी रक्षा करता है. इसीलिए शादीशुदा पुरुष व पिता की सेहत हमउम्र युवकों की अपेक्षा बेहतर होती है. 

मंगलवार, 13 सितंबर 2011

पीठ के दर्द का होगा इलाज

वैज्ञानिकों ने अब उस जीन की पहचान कर ली है जिसके कारण निरंतर पीठ में दर्द महसूस होता है. उनका कहना है कि अब पीठ दर्द से निजात पाने के लिए दवाएँ बनाई जा सकती हैं, जो लगातार होने वाले पीठ-दर्द का समाधान कर सकती हैं. 'साइंस' में छपे केंब्रिज विश्वविद्यालय के शोध के मुताबिक शोधकर्ताओं ने चूहों में दर्द के प्रति संवेदनशील नसों से एचसीएन-2 जीन को निकाल दिया गया. शोधकर्ताओं के अनुसार इससे ये संभावना पैदा हो गई है कि ऐसी नई दवाओं को विकसित किया जाए जो एचसीएन-2 जीन में बनने वाली प्रोटीन को बंद कर दे क्योंकि उसी से निरंतर उठने वाला दर्द नियंत्रित होता है. ये तो पहले से पता था कि एचसीएन-2 जीन से दर्द के प्रति संवेदनशील नसों के अंत में दर्द उठता है. लेकिन अब तक ये नहीं पता था कि एचसीएन-2 का दर्द नियंत्रित करने में क्या भूमिका है. इस शोध के लिए वैज्ञानिकों ने चूहों में दर्द के प्रति संवेदनशील नसों से एचसीएन-2 जीन को हटाया. फिर उन्होंने उन नसों की कोशिकाओं में बिजली के झटके दिए ताकि ये पता चल सके कि एचसीएन-2 हटाने से क्या बदलाव आए हैं. इसके बाद उन जीन संशोधित चूहों का अध्ययन किया और ये देखा कि बजली की झटका लगने से चूहे कितनी गति से पीछे हटते हैं. इससे उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि एचसीएन-2 जीन निकाल देने से नसों के ज़रिए होने वाला दर्द ख़त्म हो जाता है.लेकिन ये भी पाया गया कि इस जीन को निकालने से आम तीखे दर्द पर कोई असर नहीं होता - यानी वो दर्द जो आपको ग़लती से जीभ काटने पर होता है, उस पर कोई असर नहीं होता.इस अध्ययन का नेतृत्व करने वाले प्रोफ़ेसर पीटर मैक्कनौटन का कहना है, "जो लोग नसों के कारण दर्द से पीड़ित होते हैं, उन्हें दवाओं के अभाव के कारण कोई राहत नहीं मिलती है. हमारे अध्ययन से ये पता चला है कि यदि दवाओं के इस्तेमाल से एचसीएन-2 जीन को ब्लॉक किया जाए यानी रोका जाए तो दर्द निवारण संभव है. "उनका ये भी कहना था कि रोचक बात यह है कि एचसीएन-2 को ब्लॉक करने से नसों का दर्द ख़त्म होता है लेकिन आम दर्द का एहसास ख़त्म नहीं होता जिससे किसी भी दुर्घटना होने के स्थिति में व्यक्ति को उसका एहसास हो जाता है.
(इनसाईट स्टोरी मेडिकल टीम) 

शनिवार, 10 सितंबर 2011

इनसाईट स्टोरी नई साज सज्जा के साथ

इनसाईट स्टोरी को अब एक नये मल्टीमीडिया कलेवर में पेश करने जा रहें हैं. अब आपको मिलेगा दुनिया को जानने का मौक़ा और अधिक आकर्षक रंगों के साथ.  


बुधवार, 7 सितंबर 2011

फैक्ट्री में बनेंगे कृत्रिम अंग

अब वो दिन दूर नहीं जब मानव अंग फैक्ट्रियों में तैयार किये जायेंगें. इस हेतु वैज्ञानिक काफी प्रयास कर रहें हैं और अब इसमें सफलता भी मिलने लगी है. वैज्ञानिकों ने ऐसी तकनीक खोज निकाली है जिसमें बताया गया है कि मानव अंग बनाने के 20 तरीके हैं। वैज्ञानिकों ने अब तक ब्लैडर, यूरीथ्रा और श्वासनली बना कर मानव अंग बनाने की कल्पना को साकार किया है। इन बनाए गए कृत्रिम अंगों को मरीजों में लगाया जा चुका है। अब वैज्ञानिकों का दिल, किडनी, लिवर, पेन्क्रियाज (पाचक तंत्र) और थाइमस जैसे शरीर के सबसे जटिल अंगों को बनाने की कोशिश है। यदि इन अंगों को बनाने में सफलता प्राप्त हो जाती है तो लोगों की उम्र बढ़ाई जा सकती है और ट्रांसप्लांट होने में लगने वाले अधिक समय, और उपलब्धता की कमी से भी बचा जा सकता है। वैज्ञानिकों ने इस कायाकल्प कर देने वाली तकनीक की जानकारी कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में आयोजित होने वाली कांफ्रेंस में दी थी। आयोजक ऑब्रे डी ग्रे ने बताया कि चिकित्सा जगत में यह आने वाला नया युग होगा, जो बीमारियों और उम्र को रोक देगा।
(इनसाईट स्टोरी )

शनिवार, 3 सितंबर 2011

जब आदमी ने सांप को काटा

साँप ने आदमी को काटा, ये ख़बर तो आम तौर पर सुनने में आती है लेकिन आदमी साँप को काट ले ये ख़बर शायद आपने कभी नहीं सुनी होगी. लेकिन अमेरिका में ऐसा हुआ है. कैलिफोर्निया के नज़दीक सैक्रामेंटो शहर में एक आदमी पर अपने पालतू पाइथन सांप को काटने और उसे घायल करने का आरोप लगा है.गुरुवार की शाम इस इलाके में पुलिस को एक फ़ोन मिला जिसमें एक साप पर हमले की सूचना दी गई. पुलिस जब मौके पर पहुंची तो 54 वर्षीय डेविड सेन्क को ज़मीन पर पड़ा हुआ पाया लेकिन पास ही खड़े एक चश्मदीद ने पुलिस को बताया कि इस व्यक्ति ने सांप को दो बार काटा. घटना के बाद पुलिस ने सेन्क को सांप को घायल करने और उसे अपाहिज बनाने की कोशिशों के आरोप में गिरफ़्तार किया. सेन्क ने स्थानीय मीडिया से बात करते हुए कहा कि उन्हें बिलकुल याद नहीं कि उन्होंने क्या किया? क्योंकि नशे में थे. पाइथन को आपात चिकित्सा दिए जाने के बाद उसकी हालत में अब सुधार है. एनिमल केयर सर्विस से जुड़ी जीना नेप्प ने कहा, ''सांप की सेहत अब पूरी तरह ठीक है हमने कल रात उसका आपरेशन किया और उसकी जान बच पाई.'' जांच में पता चला है कि सांप की पसली की कुछ हड्डियां टूट गई हैं. है ना ख़ास ख़बर!
(आशुतोष पाण्डेय)

मंगलवार, 30 अगस्त 2011

अमेरिका ने ली कई जानें:काला चेहरा

अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा 
अमरीका में राष्ट्रपति बराक ओबामा की ओर से हाल ही में नियुक्त एक आयोग ने कहा है कि 1940 के दशक में ग्वाटेमाला में यौन संक्रमित रोगों के साथ शोध के क्रम में कम से कम ८३ लोगों की मौत हुई. इन लोगों को जान-बूझकर सिफ़लिस और गोनोरिया जैसे यौन रोगों से संक्रमित किया गया.ये आयोग ग्वाटेमाला में अमरीकी वैज्ञानिकों के काम और उनके द्वारा १९४६ से १९४८ तक यहाँ के नागरिकों पर किये गए परीक्षणों की जाँच कर रहा है. अमरीका ने इन शोधों के लिए ग्वाटेमाला से पिछले साल ही माफ़ी मांगी थी. आयोग ने कहा है कि इस शोध के क्रम में वैज्ञानिकों ने पेन्सिलिन ड्रग की जाँच के लिए वहाँ की अति संवेदनशील आबादी को जानबूझ कर संक्रमित किया. अभी तक ये पता नहीं चल पाया है कि इस संक्रमण से सीधे तौर पर कितनी मौतें हुईं. ये शोध अमरीकी जन स्वास्थ्य सेवा की ओर से वर्ष 1946 और 1948 के बीच किये गए थे. पेन्सिलिन के प्रभाव की जाँच के लिए अमरीकी वैज्ञानिकों ने ग्वाटेमाला के क़ैदियों, मानसिक रोगियों और अनाथों को इन यौन रोगों से संक्रमित किया गया था. शोध के बारे में इन लोगों से कोई सहमति नहीं ली गई थी और संक्रमण के बाद भी ये बात छिपाई गयी थी. ये काम काफ़ी गोपनीय तरीक़े से हुआ. इस मामले की जाँच कर रहे आयोग के कुछ सदस्यों ने इसे मानवाधिकार का उल्लंघन बताया है. इससे मानवाधिकारों के प्रति अमेरिका का छद्म चेहरा भी सामने आता है. आयोग की पूरी रिपोर्ट सितंबर के शुरू में प्रकाशित होगी.
(आशुतोष पाण्डेय)

शनिवार, 27 अगस्त 2011

हीरे जैसा ग्रह

इस ब्रह्मांड में ना जाने कितने कितने रहस्य छिपे हैं, रोज नए-नए रहस्यों से पर्दा उठने के साथ ब्रह्मांड की गुत्थियां और उलझती जा रहीं हैं. अभी वैज्ञानिकों ने हीरे से बने एक ग्रह को खोज निकाला है. आकशगंगा में हमारे सौर मंडल से थोड़ा ही दूर एक चमकता ग्रह मिला है जिसके बारे में वैज्ञानिक ये मान रहें है कि ये कार्बन के अणुओं के काफी पास आ जाने के कारण भारी दवाब से हीरे में बदल गया है, जहां इसका आकार तो जुपिटर से छोटा बताया जा रहा है, लेकिन द्रव्यमान उससे कही ज्यादा होने की संभावना है. अभी इस ग्रह का नामकरण नहीं किया गया है.
वैज्ञानिक इस पर आक्सीजन और कार्बन गैसों के अस्तित्व को मान रहें हैं, लेकिन हाइड्रोजन जैसे हल्के अणुओं का पाया जाना संदिग्ध माना जा रहा है, पृथ्वी से चार हजार प्रकाश वर्ष की दूरी पर स्थित है. इसकी उत्पत्ति एक तारे से मानी जा रही है, जो टूट कर नष्ट हो गया और ये ग्रह अस्तित्व में आया होगा. काफी दवाब के कारण ही कार्बोन परमाणु हीरे के रूप में संघनित हो गये होंगे, इसी कारण इसका घनत्व अभी तक पाए गए सभी सौर मंडल के ग्रहों और ब्रह्मांडीय पिंडों से ज्यादा है. साइंस नाम के अंतर्राष्ट्रीय जर्नल में ये जानकारिया दी गयी हैं जिसे २५ अगस्त २०११ को आनलाइन प्रकाशित किया गया है.

(इनसाईट स्टोरी टीम)

पढिये विज्ञान के और सच और अजूबे: उलटा चलने वाला एक ग्रह